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गांधी परिवार को किया गहलोत ने मुट्ठी में, कांग्रेसी नेता गहलोत के समक्ष नतमस्तक

गांधी परिवार को किया गहलोत ने मुट्ठी में, कांग्रेसी नेता गहलोत के समक्ष नतमस्तक
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अशोक गहलोत ने समूचे गांधी परिवार को दरकिनार करते हुए यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस नामक पार्टी उनकी जेब मे है । पार्टी के कद्दावर नेता भी गहलोत के चरणों मे शीश नवाने को विवश होगये । हालांकि अहमद पटेल के निधन के बाद से ही पार्टी का संचालन गहलोत की सलाह पर होता था । लेकिन अब गहलोत ने पार्टी का स्टेयरिंग अपने हाथ मे ले लिया है ।

सोनिया गांधी हो या राहुल व प्रियंका, अब तीनो गहलोत के इशारे पर कत्थक करने लगे है । चूंकि जब पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ही गहलोत के समक्ष नत मस्तक है तो ऐसे में और नेताओं की कोई हैसियत नही रह जाती है । चिंतन शिविर के बाद पार्टी की कमान गहलोत के हाथों में चली गई है । आगे के तमाम महत्वपूर्ण फैसले अब गहलोत के निर्देशन में लिए जाएंगे ।

उदयपुर में तीन दिन का नव संकल्प चिंतन शिविर आयोजित करने के पीछे मूल भावना पार्टी को मजबूत करने की थी । कांग्रेस पार्टी तो मजबूत हुई नही, गहलोत पूरी तरह मजबूत होगये । तीन दिनों के शिविर में मल्लिकार्जुन खड़गे, अधीर रंजन चौधरी, गुलाम नबी आजाद, चिदम्बरम, अजय माकन, केसी वेणुगोपाल और सुरजेवाला जैसे नेता दुम दबाते दिखाई दिए ।

बताने की आवश्यकता नही है कि कांग्रेस की हालत आज क्षत-विक्षत लाश जैसी होगई है । इसका दस-बीस साल के दौरान कोई व्यक्ति इलाज कर पाएगा, दूर दूर तक कोई संभावना नजर नही आती । सोनिया अथवा राहुल द्वारा पार्टी की कमान संभालने के बाद कांग्रेस की सेहत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती ही चली गई । इलाज के लिए प्रशांत किशोर जैसे चिकित्सक को बुलाया भी गया । वह कोई इलाज प्रारम्भ करता, उससे पहले ही गहलोत एन्ड कम्पनी ने उसे भागने को विवश कर दिया ।

माना कि अशोक गहलोत राजनीति के मंजे हुए मदारी है । लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद पार्टी की प्रदेश में हमेशा सेहत खराब हो जाती है । पहली बार मुख्यमंत्री बने तो धड़ाम से कांग्रेस की सीट गिरकर 56 और दूसरी बार 21 रह गई । हालात यही रहे तो कांग्रेस 11 सीट पर सिमट जाए तो कोई ताज्जुब नही होना चाहिए । चिंतन शिविर में इस पर मंथन क्यो नही हुआ ? पांच राज्यो में पार्टी की मय्यत निकालने के लिए कौन जिम्मेदार है, क्यो नही हुई इस पर बेखौफ चर्चा ? यूपी में करीब 350 सीट पर जमानत जब्त कराने वाले (क)पूत नेताओं को राज्य मंत्री किसने और क्यों बनाया, क्या यह चर्चा करने योग्य विषय नही था ?

यह भी मान लिया कि पार्टी गहलोत की जेब में आ गई है । लेकिन पार्टी मजबूत कैसे होगी, इस पर सारे नेता केवल भाषणबाजी पेलते रहे । कोई समुचित हल किसी ने पेश नही किया । तीन दिन तक अय्याशी करके हर दफा की इस बार भी नेता भाग छूटे । कमेटी बनाने या लम्बे लम्बे भाषण पेलने से कोई भी पार्टी युद्ध नही जीत सकती है । पुख्ता रणनीति, शुद्ध समर्पण, जोश और आवश्यक गोला-बारूद की जरूरत होती है । कार्यकर्ताओ का जोश जवाब दे चुका है और आपसी कलह चरम पर है । चारो ओर अंधेरा ही अंधेरा है । अंधेरे को कैसे दूर भगाया जाए, इस पर मनन करने के बजाय अपनी दुकान जमाने मे लगे हुए है ।

उम्मीद की जा रही थी तीन दिन का चिंतन शिविर पिछली दफा की तरह फ्लॉप साबित नही होगा । इस बार का शिविर फ्लॉप नही, सुपर फ्लॉप साबित हुआ । घिसे-पिटे डायलॉग के अलावा कोई प्रभावी विजन नही था । राहुल का भाषण औसत दर्जे से भी घटिया और दिशाहीन था । चिंतन शिविर के दौरान प्रियंका पूरी तरह उपेक्षित रही ।

सोनिया को खुद नही पता कि वे क्या और क्यो बोल रही है । इस बात के लिए सोनिया की तारीफ अवश्य की जानी चाहिए कि उन्होंने मान तो लिया कि पार्टी संकट में है । वरना कांग्रेसी तो यही मानकर चल रहे है कि जब तक राजस्थान और छत्तीसगढ़ में यूपी स्टाइल में पार्टी की नैया पूरी तरह डूब नही जाती, तब तक सबकुछ ठीक है ।

सोनिया की यह बात बड़ी हास्यस्पद लगी कि पार्टी ने अनेक लोगों को बहुत कुछ दिया है । यह बात सौ फीसदी सच है । सोनिया ने पार्टी के नेताओ का आव्हान किया कि अब वक्त आगया है कर्ज उतारने का । समूची पार्टी आज पूरी तरह फुकरी और कंगाल है । फुकरे कुछ देते नही, लेने की अपेक्षा रखते है । यह मैडम सोनिया को समझना चाहिए ।

कर्ज लौटाने के लिए आज अशोक गहलोत और भूपेश बघेल दो ही सक्षम है । गहलोत पैसे खर्च करने में सक्षम है । लेकिन कुर्सी आसानी से छोड़ दे, ऐसा बिल्कुल सम्भव नही है । वे 2024 में भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के सपने संजोये हुए है । गहलोत की तरह बघेल भी फेविकोल के जरिये कुर्सी से चिपके हुए है । मैडम सोनिया को बताना चाहिए कि आखिर कर्ज चुकाएगा कौन ? जिनसे उम्मीद है वे और कर्ज उठाने का सपना देख रहे है ।

गहलोत की कुर्सी डगमगा रही थी । राजनीति के इस बाजीगर ने ऐसा मजमा लगाया कि गांधी परिवार समेत पूरी पार्टी उनकी मुट्ठी में आ गई । करलो दुनिया मुट्ठी में, नारे को गहलोत ने न केवल बखूबी परिभाषित किया बल्कि उसका छोटा सा नमूना भी दिखा दिया । तीन दिन चले मजमें के जरिये अपनी कुर्सी बचाने में तो कामयाब रहे ही, इसके अलावा अपने सबसे नकारा और निकम्मे दुश्मन को भी अच्छी तरह "निपटा" दिया ।

मुझे माफी दे दो

पिछले दिनों मैंने कुछ पोस्ट डाली थी जिसमे कहा गया था कि गहलोत की मुख्यमंत्री पद से छुट्टी होने वाली है और सचिन पायलट 20 मई से पहले मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते है । मेरी सूचना पुख्ता होने के बाद भी खबर इसलिए पिट गई क्योंकि गहलोत "खेला" खेलने में माहिर है । पूरे सम्मेलन में गहलोत एन्ड कम्पनी पूरी तरह हावी रही । जबकि पायलट और उनके समर्थक दरकिनार किये गए । यहां तक पायलट के पोस्टर और बैनर तक फाड़ दिए । भगवान ऐसी पार्टी की रक्षा करना अन्यथा इतिहास के पन्नो से कांग्रेस का नामोनिशान ही मिट जाएगा ।

महेश झालानी
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