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पायलट को भरोसा है कि करण-अर्जुन अवश्य आएंगे, मैं नही पहनूंगा अध्यक्ष की टोपी : गहलोत

पायलट को भरोसा है कि करण-अर्जुन अवश्य आएंगे,  मैं नही पहनूंगा अध्यक्ष की टोपी : गहलोत
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हालांकि अभी यह तय नही है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन बनेगा, लेकिन इतना निश्चित है कि अशोक गहलोत आखिरी वक्त तक अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने के लिए इनकार करते रहेंगे । वे जानते है कि अध्यक्ष बनने का मतलब सीएम की कुर्सी छोड़ना । जबकि गहलोत किसी भी हालत में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के मूड में नही है । वे यह भी जानते है कि उन्होंने सीएम की कुर्सी छोड़ी नही, सचिन पायलट इस पर कब्जा कर लेंगे । ऐसे में गहलोत का राजनीतिक भविष्य चौपट होने की संभावना है ।

कांग्रेस आलाकमान के पास अध्यक्ष पद के लिए गहलोत से बेहतर और वफादार व्यक्ति नही है । सोनिया गांधी बखूबी जानती है कि गहलोत ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति है जो संगठन का सही तरीके से संचालन कर सकते है । उन्हें संगठन का लंबा तजुर्बा हासिल है । इसके अलावा कांग्रेस के अधिकांश नेता गहलोत के नाम पर सहमत है । दिक्कत यही है कि स्वयं गहलोत इस पद को हासिल करने के बिल्कुल इच्छुक नही है । क्योंकि मुख्यमंत्री के मुकाबले इस पद की कोई अहमियत नही है ।

खबर मिली है कि विदेश रवाना होने से पूर्व सोनिया ने गहलोत को अध्यक्ष पद संभालने के लिए राजी करने का प्रयास किया । लेकिन उन्होंने बड़ी चतुराई से अध्यक्ष पद के मुद्दे को डाइवर्ट कर दिया । बताया जाता है कि गहलोत की ओर से तर्क दिया गया कि वे हर आदेश को सहर्ष मानने को तैयार है । लेकिन.......राजस्थान में किसी तरह का बदलाव किया गया तो यह बहुत बड़ा आत्मघाती कदम होगा । जो हालत पंजाब में हुए थे, राजस्थान भी इससे अछूता नही रहेगा ।

दरअसल इन दिनों गांधी परिवार मोदी और शाह की ईडी से बहुत घबराए हुए है । समूचा गांधी परिवार यह भी बखूबी जानता है कि कांग्रेस या विपक्ष की सरकार को गिराकर बीजेपी की सरकार बनाने में दोनों को महारत हासिल है । पता नही इस बात में कितनी सच्चाई है, लेकिन चर्चा है कि गहलोत की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि यदि राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन किया गया तो कांग्रेस की सरकार तीन महीने से पहले गिर जाएगी और अगले चुनाव में कांग्रेस को भारी खामियाजा उठाना पड़ेगा । गहलोत की इस बात का केसी वेणुगोपाल ने भी समर्थन किया ।

उधर सचिन पायलट गुट का यह प्रयास है कि गहलोत को अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जाए ताकि उनके लिए सीएम की सीट खाली हो जाए । लेकिन गहलोत को ऐसे ही राजनीति का जादूगर नही कहा जाता है । वे किसी भी हालत में अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी नही संभालेंगे । आखिरी बाल में छक्का मारकर बाजी पलटने की कूवत गहलोत में है । वे बखूबी जानते है कि उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया तो देर-सवेर नेतृत्व परिवर्तन भी हो सकता है । इन हालातों में गहलोत के साथ साथ उनके समर्थकों के राजनीतिक जीवन पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है ।

अभी तक मिली खबरों के अनुसार गहलोत ने बहुत ही चतुराई से अध्यक्ष पद संभालने से इनकार कर दिया है । गहलोत की योजना है कि राहुल को इस बात के लिए मनाया जाए कि वे अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाले । स्वयं गहलोत कह चुके है कि राहुल को आखिरी क्षणों तक मनाने का प्रयास करेंगे । यदि राहुल नही मानते है तो गहलोत अध्यक्ष की टोपी मुकुल वासनिक या भूपेश बघेल को पहना सकते है । इस पर भी बात नही बनी तो गहलोत की शर्त होगी कि वे अध्यक्ष या कार्यकारी अध्यक्ष बनने को तो तैयार है, लेकिन मुख्यमंत्री का पद नही छोड़ेंगे । ऐसे में वे सीएम के साथ साथ संगठन पर भी काबिज हो जाएंगे ।

अगरचे ऐसा होता है तो फिर सचिन पायलट का क्या होगा ? पहले दोनों के बीच समझौते की उम्मीद थी, लेकिन अब तो दोनों ओर से तलवार खिंच चुकी है । पायलट को राजनीतिक रूप से नेस्तनाबूद करना ही गहलोत का एकमात्र उद्देश्य है । राजनीति में गहलोत को अनेक बार चुनोतियाँ मिली । इन्होंने सबको "निपटा" दिया । पायलट एकमात्र ऐसे व्यक्ति है जिसने राजनीति के जादूगर को होटल और रिसोर्ट में कैद होने के लिए विवश कर दिया । गहलोत इस बात को भूले नही है । यदि वे दिल्ली चले भी जाते है, तब भी उनका मुख्य उद्देश्य पायलट को निपटाने का रहेगा ।

पिछले दो साल से पायलट आलाकमान के भरोसे उम्मीद लगाए बैठे है । जैसे फ़िल्म "करण-अर्जुन" में राखी को पूरी उम्मीद थी कि उसके करण और अर्जुन अवश्य आएंगे, वहीं आस पायलट को अभी तक है । उनके समर्थकों का कहना है कि अंततः परिणाम उनके अनुकूल ही रहेगा । पायलट को सोनिया पर भरोसा है कि देर-सवेर वे उनके साथ न्याय करेगी ।

पायलट यह नही भूलना चाहिए कि उनके सामने राजनीति का बहुत बड़ा जादूगर अशोक गहलोत है । गिली...गिली...गप्पा करके वह आलाकमान तक को मुट्ठी में करने की क्षमता रखता है । अगर गहलोत कांग्रेस के बजाय बीजेपी में होते तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नही, गहलोत होते । मोदी और शाह की हालत वहीं होती जो दो साल से पायलट की है । देखना दिलचस्प होगा कि गहलोत मरा सांप से छुटकारा पाते है या नही । उनके लिए वर्तमान में अध्यक्ष मरे सांप से कम नही है ।

महेश झालानी
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