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भगवान परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं
अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु: । इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।
अमरेश मिश्र की कलम से
"चारो वेदों का मौखिक एवं पंढ़न्त ज्ञान रखने वाले; धनुष (हाथियार) से लैस; जिनमे ब्रह्म (wisdom) और छात्र (chivalry) मूल्यों का समागम है; और जो श्राप (verbal assault) और शस्त्र (physical aggression)--दोनो से--अन्याय के खिलाफ लड़ते हैं"! भारतीय संस्कृति का मूल चरित्र नस्ली (racial) नही है। आर्य या अनार्य या द्रविड़ जैसी किसी एक नस्ल ने 'भारतीय संस्कृति' को नही संवारा।
लेकिन ऐसा भी नही है कि भारतीय संस्कृति कोई अधपकी खिचड़ी है। भारतीय उपमहाद्वीप मे सभ्यता के शुरुआती 1000 सालों मे, कई नस्लों ने अपने-अपने मिथकों, प्रतीकों और विचारों का समागम किया। और एक नई विचार एवं प्रतीक शृंखला का निर्माण हुआ। बाद के 1500 सालों में जो और प्रजातियां भारत मे आयी, उन्होने ने शुरु के 1000 सालों वाली विचार एवं प्रतीक शृंखला को आत्मसात किया।
जातियों का निर्माण भी भारत मे नस्ली या प्रजाति आधार पर नही हुआ। हर जाती मे आप हर रंग के लोग पायेंगे। चेहरों और नाक-नक्शों को देख कर यह कहना मुश्किल होगा कि कौन किस जाती का है।
मुसलमान भी यहां कई प्रजातियों, मसलन अरब, ईरानी, तुरानी, तुर्क, मंगोल, अफगानी, ताजिक, उज़बेकी इत्यादी, से आये; यहां पहले से मौजूद प्रजातियों से घुल-मिल कर नाक-नक्शों मे समान हो गये। मुसलमानो ने कुछ नये प्रतीक और विचार दिये, जो भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन गये।
'साझा संस्कृति' प्रतीत होते हुए भी, भारतीय संस्कृति किसी आमूर्त मिश्रण की उत्पत्ति नही है। यह संकरक (eclectic) नही रही है। इसके मूलभूत कूछ सिद्धान्त रहे हैं। जिनको, अंग्रेज़ी लूटेरों और साम्राज्यवादियों को छोड़ कर, सबने या तो अपनाया या इज़्ज़त दी।
भगवान परशुराम ऐसे ही 'विचार और प्रतीक हैं'। जो अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देते हैं। लेकिन वो सिर्फ एक वीर नही, बल्कि ज्ञान के भी सागर हैं।
भगवान परशुराम प्रचीन समय के organic intellectual-warrior (जैविक-वीर बुद्धिजीवी) कहे जा सकते हैं। भगवान परशुराम प्रतीक हैं बौद्धिक एवं सरकश-हथियारबंद गुणो के मेल का।
भारतीय परम्परा मे ऋषि-मुनियों को ज्ञान एवं राजाओं को शौर्य का प्रतीक माना गया है। ब्राहमण एवं छात्रिय गुणो को अलग-अलग बांटा गया। पर भगवान परशुराम एक ऐसे उदाहरण हैं जो ऋषि भी हैं, योद्धा भी--जितने शास्त्र विद्या मे उतने ही शस्त्र विद्या मे निपुण।
RSS को भारतीय संस्कृति की समझ नही है। RSS के 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' मे भगवान परुशराम की multi-dimensional personality यानी विविध, बहुआयामी व्यक्तित्व की कोई जगह नही है। RSS नस्ली एकरसता के सिद्धान्त पर चलता है। जैसा ऊपर कहा गया है, यह सच है की भारतीय संस्कृति को 'साझा संस्कृति' तक सीमित नही किया जा सकता। पर RSS का विकल्प कि भारतीय संस्कृति बिल्कुल 'अमिश्रित', नस्ली एवं एकांगी है, भी गलत है।
खुद भगवान परशुराम का व्यक्तित्व RSS की भारतीय संस्कृति की फासीवादी अवधारणा के खिलाफ है। इसीलिये, उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी ने परशुराम जयन्ती पर अवकाश समाप्त कर दिया।
योगी जानता है, कि भगवान परशुराम का फरसा, जनता का फरसा है, जो उन्नाव, कठुआ, किसी के खिलाफ अन्याय, को बर्दाश्त नही करेगा।
उत्तर प्रदेश के नव युवकों से अपील है कि भगवान परशुराम को समझो। आज अन्याय, फरेब और धोखे की राजनीती को तिलान्दजली दे कर, शास्त्र और शस्त्र विद्या के बल पर, भारत को फिर से गुलाम करने आयी विदेशी ताक़तों और उनके देसी चट्टो-बट्टो से लोहा लो! RSS के निकर (half-pant) और भगवान परशुराम के फरसे मे कोई मेल नही है। RSS हिंदू-विरोधी और विदेशी ताक़तों की एजेंट है।
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