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बाबा नींव करौरी की जयंती पर विशेष: जापर कृपा करहु सोई भाने

बाबा नींव करौरी की जयंती पर विशेष: जापर कृपा करहु सोई भाने
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किसी के लिए वह बाबा नीब करौरी तो किसी के लिए तलैया बाबा तो किसी के लिए नीम करौली, किसी के लिए बाबा लक्ष्मण दास तो किसी के लिए महराज जी। अचरज कि सारे भक्त उनको हनुमान जी का अवतार ही मानते हैं। अति सामान्य वेषभूषा किंतु तेजोमय मुख मंडल, तिस पर छाई मुस्कान लोगों का मन हर ले, मोटा कंबल बारीक भिंतुन साधु सरीखा रहन सहन ऐसे थे बाबा नीब करौरी। उनकी यह मोहक छवि वाली तस्वीर हर भक्त के घर में विराजित दिखेगी।

बाबा जी लिफाफा बगैर खोले ही बता देते थे कि उसके अंदर क्या है? वह दूर बैठे-बैठे भक्त की विपदा टाल दें, नदी के जल को घी बना दें, ट्रेन को रोक दें, लोगों को कष्ट से मुक्ति दिला दें, तो हैरानी की बात क्या? यहां तक कि अंतिम समय में व्यक्ति के पास पंहुच कर उनको दर्शन दे और तो और एक समय में कई स्थानों पर जा पहुंचे। भक्त मानते हैं कि उनकी पहुंच में क्या नहीं शामिल था? अनेकानेक किताबों में छपी कहानियां बाबा जी के विविधरहस्यों के बारे में बता तो सकती हैं पर उन रहस्यों को सुलझा सकने की ताकत न तो तब किसी में थी और न अब है। बाबा नीब करौरी महाराज की व्यापक, विस्तृत क्षमता की कथाओं, द्रष्टांतों का जो मूल तत्व है, वह है उनकी उनकी जन-जन के प्रति करुणा, दया, कृपा, वात्सल्य, भक्त वत्सलता, धर्म एवं मर्यादा की रक्षा आदि की भावनाओं का ही प्रतिबिंब है। महाराज जी की इस कथा को कैसे लिखा जाए क्योकि महराज जी हरभक्त के साथ, हर शरणागत के साथ, सैकड़ों हजारो उन लोगों के साथ रहे लोग उनके बारे में उनकी शक्तियों के बारे में कुछ नही जानते थे यहां तक कि दिन लोगों ने कभी उनके दर्शन नहीं किए उन सभी के साथ उन भक्तों के साथ, उस शरणागत व साथ उसके कर्म, प्रारब्ध, मन की इच्छा के अनुकूल अनेक प्रकार की कल्याणमयी लीलाएं की है और उसी अनुरूप भक्तों ने अपने मन में अपने अंतर में महाराज जी की अलग-अलग मूर्तियां स्थापित करके लीं। किसी के लिए वह राम है तो किसी के लिए कृष्ण, किसी के लिए हनुमान, तो किसी के लिए शिव, किसी के लिए सखा, किसी के गुरु तो किसी के महाराज जी, किसी के अराध्य तो किसी के ईष्ट। यहां तक कि हजारों परिवारों के मुखिया, माई-बाप, किसी के लिए चमत्कारी तो किसी के लिए अवतारी पुरुष, योगीजनं के ऋ षि महर्षि, साधु, मुनि आदि जिसमें जैसी कृपा पाई उस अनुरूप वह महाराज जी की शक्तियों एवं व्यक्तित्व का बखान करता है।

महाराज के भक्त, दया पात्र तो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी यहां तक कि सात समंदर पार तक फैले हैं। आश्चर्य की बात कि देश और विश्व के कोने-कोने से लोग बिना किसी प्रचार के केवल महाराज जी की प्रेरणा से आते गए और भगवान और भक्त सजातीय है। इनका संबंध आत्मीय है। बाबा जी ने जिस एक परिवार का निर्माण किया, आज उसमें सभी वर्ग तथा धर्म के लोग शामिल हैं। बाबा जी कहते थे कि संत दूसरों की भलाई के लिए दुख सहते हैं जबकि अभागे दुर्जन दूसरों को दुख देने के लिए स्वयं कष्ट सहते हैं। संत जन भोजपत्र के समान हैं जो दूसरों के कल्याण के लिए नित्य विपत्ति सहते हैं और दुष्टजन पराई संपत्ति नाश करने के लिए स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे ओले खेतों को नाश करके स्वयं नष्ट होते हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी रहे विजय कुमार जोशी बताते हैं कि 1971 मे मेरा मौसेरा भाई आइएएस की तैयारी कर रहा था। वह माता-पिता के साथ अल्मोड़ा से कार से काठगोदाम आ रहा था। उसके हाथ मे एक इंग्लिश लिट्रेचर की मोटी सी किताब थी। बाबा ने उसके हाथ से किताब ले ली और पूछा, क्या कर रहा है? उसने उत्तर दिया-बाबा आइएएस की तैयारी कर रहा हूं। बाबा किताब के पन्ने पलटते रहे। कुछ पन्नों पर उन्होंने पेंसिल से राम-राम लिख दिया। बाद मे पता चला की जिन पन्नों मे राम-राम लिखा था, उन्हीं से प्रश्न पूछे गए थे। मेरा भाई अमिताभ पांडे उसी वर्ष परीक्षा मे पास हुआ और बाद मे भारत सरकार मे सचिव पद से रिटायर हुआ। 1968 मे अमिताभ दिल्ली मे पढ़ रहा था। उसके पिता अंबादत्त पांडे उस समय संयुक्त सचिव गृह थे और खान मार्केट के सामने लोदी एस्टेट मे रहते थे। एक शाम खान मार्केट से घर आते समय सड़क पार करते समय अमिताभ एक एम्बेसी की कार की चपेट मे आ गया और करीब 70 मीटर तक घिसटता चला गया। बदहवास माता पिता उसे लेकर एम्स पहुंचे। वहां उपचार के लिए उसे अंदर ले गए। बाहर जहां प्रतीक्षा मे माता पिता के अलावा अन्य बहुत से लोग बैठे थे। अचानक वहां पब्लिक फोन की घंटी घनघनाई। किसी कर्मचारी ने फोन उठाया तो बाबा जी थे लाइन पर। उन्होने श्रीमती पांडे से बात करने की इच्छा प्रकट की। उस आदमी ने जोर से पूछा-श्रीमती पांडे कौन हैं, आपके लिए फोन है मथुरा से। मौसी से बाबा ने कहा, माई तू चिंता मत कर। उसे एक्सीडेंट के समय हनुमान जी ने उठा लिया था। वो ठीक हो जाएगा। अब बताइए दुर्घटना दिल्ली मे घटी और बाबा को मथुरा मे पता चल गया और यह भी पता चल गया की किस अस्पताल मे किस फोन के निकट वो बैठी हैं!

महाराज जी की कृपा पाने के लिए कोई शर्त व नियम नहीं था कि अमुक व्यक्ति ही कृपा पा सकता है जो गुणवान हो धार्मिक हो या महाराज जी अपनी कृपा दृष्टि के लिए ऐसे व्य1ित की तलाश में रहते हों। महराज जी की कृपा तो दुख के सागर में डुबे हुए लोगों पर या धर्म से भटके हुए लोगो पर होती थी। जब कोई कहता है कि वह व्यक्ति तो ऐसा है तो महाराज जी यही कहते कि क्या करें हमें दया आ जाती है। महाराज जी की दृष्टि में कोई अमीर था न ही गरीब, न कोई धर्म विशेष का अनुयायी न कोई कुलीन न कोई जाति और न ही कोई क्षेत्र, देश या प्रांत। उनकी दृष्टि में सृष्टि की रचना करने वाले की सब संतान हैं। यही वजह थी कि महाराज जी सब पर दया करूणा की समान रूप से वर्षा करते थे, बिना पात्र-कुपात्र, संत-असंत, भक्त-अभक्त का भेद किए। बस महाराज जी हर कृपापात्र से एक ही अपेक्षा रखते थे कि वह अपने धर्म में अडिग रहकर भगवान की भक्ति करें। धर्म व जाति की आड़ में मानव में भेद न करे, मानव सेवा को धर्म समझें।

एक बार महाराज जी मुकुंदा के साथ प्रयाग में गंगा नदी के किनारे बसे सुप्रसिद्ध ज्ञानी प्रभुदत ब्रह्मचारी जी से मिलने गये थे। कार से उतर कर उन्होंने उनके शिष्यों से पूछा-ब्रह्मचारी जी कहां हैं? पता चला कि ब्रह्मचारी जी दोपहर का प्रसाद पाने की तैयारी में है। (ब्रह्मचारी जी श्री कृष्ण के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित थे। खास तौर पर उनके वासुदेव रूप के परमनिष्ठ पुजारी थे।) तभी एक दरवाजे से ब्रह्मचारी जी निकल आये। वे महाराज जी को देखकर दौड़ते हुए उनके पास आये। महाराज जी ने न जाने उन्हें अपने में ही अपना कौन सा रूप दृष्टिगोचर करा दिया कि (श्री चरणों को प्रणाम करने की जगह) ब्रह्मचारी जी महाराज जी से लिपट गये-कहते हुए 'ऊं नमो भगवते बासुदेवायÓ, औऱ लिपटे रहे, अनेकों बार अश्रुपल्लवित हुए। वास्तव में साक्षात वासुदेव कृष्ण दिखाये दे रहे थे उन्हें महाराज जी के रूप मे।

महाराज जी वायु के समान थे। न उन्हें पकड़ा जा सकता था और न ही बांधा जा सकता था। उनका विराटस्वरूप कभी भी दृष्टिगोचर हो सकता था। न किसी में दैवी शक्ति अथवा तप साधना आदि की शक्ति थी कि उस विराट का दर्शन पा सके, अनंत रूप में हजारों व्यक्तियों के साथ भिन्न-भिन्न स्थानों पर दिखने, अनेक प्रकार की लीलाएं, उनका विराट स्वरूप जान पाना, देख पाना यहां तक कि पूर्ण रूप से महसूस कर पाना असंभव है।

अनंत कथामृत में उल्लेख है कि कानपुर में ओंकार सिंह एसएसपी, और किशनचंद्र कलेक्टर थे। गंगा जी में भीषण बाढ़ आई हुई थी। दोनों अफसर मातहतो के साथ नाव में बैठकर मुआयना करने निकल पड़े। तभी बीच धार में जाने पर पता चला कि नाव में छेद हो गया और पानी भरना शुरू हो गया। सब घबरा गये। मृत्यु निश्चित रूप से सामने थी। तभी ओंकार सिंह चिल्ला उठे-बचाओ महाराज जी। तभी एक बड़े तने और जड़ वाला पेड़ उनके निकट आ गया। आनन फानन दोनों में अफसर और बाकी कर्मचारी कूदकर शाखाओं को पकड़ते पेड़ पर चढ़ गये। देखते ही देखते नाव पानी में गुडप हो गयी। ऊंची लहरों से और तेज हवा से अब पेड़ कभी उन्नाव की तरफ जाये तो कभी कानपुर की तरफ, लेकिन बाबा की कृपा से तेज हवा और ऊंची लहरों से भी पेड़ न डगमगाया, न करवट ली और न ही उलटा। ओंकार सिंह बराबर बाबा को याद करते रहे। बाबा की कृपा से कुछ ही देर में पेड़ कानपुर के निकट बालू पर आकर अटक सा गया। सब के सब किनारे पर कूद गये। वस्तुत: बाबा जी ने भक्तों की पुकार सुनकर मृत्यु को टाल दिया था, एक भक्त की पुकार ने सबको बचा लिया।

तुम्हारो रूप लोग नहिं जाने,

जापर कृपा करहु सोई भानें॥

Shiv Kumar Mishra
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