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जन्मदिन विशेष : कुंवर बेचैन साहब

जन्मदिन विशेष : कुंवर बेचैन साहब
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वाजश्रवा के बहाने' में उनकी कुछेक पंक्तियाँ इसी सहजता को दर्शाती हैं...

कुँवर नारायण न सिर्फ आम जन के कवि हैं बल्कि उतने ही सहज भी। 'वाजश्रवा के बहाने' में उनकी कुछेक पंक्तियाँ इसी सहजता को दर्शाती हैं-'कुछ इस तरह भी पढ़ी जा सकती हैएक जीवन दृष्टिकि उनमें विनम्र अभिलाषाएँ होंबर्बर महत्वाकांक्षाएँ नहींवाणी में कवित्व होकर्कश तर्क-वितर्क का घमासान नहींकल्पना में इन्द्रधनुषों के रंग होंईर्ष्या देश के बदरंग हादसे नहींनिकट संबंधों के माध्यम से बोलता हो पास-पड़ोसऔर एक...

कुँवर नारायण न सिर्फ आम जन के कवि हैं बल्कि उतने ही सहज भी। 'वाजश्रवा के बहाने' में उनकी कुछेक पंक्तियाँ इसी सहजता को दर्शाती हैं-

"कुछ इस तरह भी पढ़ी जा सकती है

एक जीवन दृष्टि

कि उनमें विनम्र अभिलाषाएँ हों

बर्बर महत्वाकांक्षाएँ नहीं

वाणी में कवित्व हो

कर्कश तर्क-वितर्क का घमासान नहीं

कल्पना में इन्द्रधनुषों के रंग हों

ईर्ष्या देश के बदरंग हादसे नहीं

निकट संबंधों के माध्यम से बोलता हो पास-पड़ोस

और एक सुभाषित, एक श्लोक की तरह

सुगठित और अकाट्य हो

जीवन विवेक..."

प्रत्यक्ष मिश्रा
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