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- कुंवर बेचैन की चुनिंदा...

कफन बाँध कर अपने सर से
निकले हैं फिर आँसू घर से
राहों में इस्पाती पहिये
गुज़र गए जब तब ऊपर से
अपने साथ चला है जीवन
शव को बाँधे हुए कमर से
लौटी हैं कुछ बंद फ़ाइलें
हम कब लौटे हैं दफ्तर से
नीला बदन हुआ सपनों का
किसके विष के तेज़ असर से
2)
खुद को नज़र के सामने ला कर ग़ज़ल कहो
इस दिल में कोई दर्द बिठा कर गज़ल कहो
अब तक तो तुमने मैक़दों पै ही ग़ज़ल कही
होंठों से अब यह जाम हटा कर गज़ल कहो
दिन में भी दूर-दूर तलक रोशनी नहीं
अब तुम ही अपने दिल को जला कर गज़ल कहो
पूरी ही ग़ज़ल दिल की इबादत है दोस्तों!
अश्कों में ज़रा तुम भी नहा कर गज़ल कहो
दिल में न अगर आए तुम्हारे कोई 'कुंअर'
तो तुम ही किसी के दिल में समा कर ग़ज़ल कहो
3)
दोनों ही पक्ष आए हैं तैयारियों के साथ
हम गरदनों के साथ है वो आरियों के साथ
बोया न कुछ भी ओर फ़सल ढूँढ़ते हैं लोग
कैसा मज़ाक चल रहा है क्यारियों के साथ
तुम ही कहो कि किस तरह उसको चुराऊँ मैं
पानी की एक बूँद है चिनगारियों के साथ
सेहत हमारी ठीक रहे भी तो किस तरह
आते हैं घर हक़ीम भी बीमारियों के साथ
4)
मत पूछिए कि कैसे सफ़र काट रहे हैं
हर साँस एक सज़ा है मगर काट रहे हैं
ख़ामोश आसमान के साये में बार-बार
हम अपनी तमन्नाओं का सर काट रहे हैं
कमज़ोर छत से आज भी एक ईंट गिरी है
कुछ लोग हैं कि फिर भी गदर काट रहे हैं
आधी हमारी जीभ तो दाँतों ने काट ली
बाकी बची को मौन अधर काट रहे हैं
दो चार हादसों से ही अख़बार भर गए
हम अपनी उदासी की ख़बर काट रहे हैं
हर गाँव पूछता है मुसाफ़िर को रोक कर
हमने सुना है हमको नगर काट रहे हैं
इतनी ज़हर से दोस्ती गहरी हुई कि हम
ओझा के मंत्र का ही असर काट रहे हैं
कुछ इस तरह के हमको मिले हैं बहेलिये
जो हमको उड़ाते हैं न पर काट रहे हैं




