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विश्व कविता दिवस (2021) - प्रवीण राय, ऐसी स्त्री जिसके सौन्दर्य का बखान सीमाओं में बंधा नहीं था...

विश्व कविता दिवस (2021) - प्रवीण राय, ऐसी स्त्री जिसके सौन्दर्य का बखान सीमाओं में बंधा नहीं था...
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प्रवीण राय ऐसी स्त्री थी जिसके सौन्दर्य का बखान सीमाओं में बंधा नहीं था...

एक अद्भुत स्त्री थीं प्रवीण राय! प्रवीण राय ओरछा की एक नर्तकी का नाम था। वह नर्तकी राजा इन्द्रजीत के लिए और राजा इन्द्रजीत उस नर्तकी के लिए समर्पित थे। क्या नर्तकी में चेतना थी? यदि ऐसा था तो उस विमर्श का क्या जिसने यह कहा कि स्त्रियों में चेतना ही नहीं थी. प्रवीण राय ऐसी स्त्री थी जिसके सौन्दर्य का बखान सीमाओं में बंधा नहीं था. वह हवाओं पर सवार होकर पहुंच ही जाता था, हर दरबार में. पर साथ ही...

एक अद्भुत स्त्री थीं प्रवीण राय! प्रवीण राय ओरछा की एक नर्तकी का नाम था। वह नर्तकी राजा इन्द्रजीत के लिए और राजा इन्द्रजीत उस नर्तकी के लिए समर्पित थे। क्या नर्तकी में चेतना थी? यदि ऐसा था तो उस विमर्श का क्या जिसने यह कहा कि स्त्रियों में चेतना ही नहीं थी. प्रवीण राय ऐसी स्त्री थी जिसके सौन्दर्य का बखान सीमाओं में बंधा नहीं था. वह हवाओं पर सवार होकर पहुंच ही जाता था, हर दरबार में. पर साथ ही प्रेम की कहानी भी पहुँच जाती थी. प्रवीण राय तो प्रेम का ही नाम था.

वह ऐसी नर्तकी थीं, जिनके रूप की कहानियों पर अकबर मोहित हो गया था और उसने महाराजा इन्द्रजीत के दरबार से प्रवीनराय को बुलवा भेजा। ऐसा नहीं था कि प्रवीण राय को यह नहीं पता था कि अकबर ने उसे क्यों बुलाया है। जब राजा इन्द्रजीत सिंह ने उसे जाने की अनुमति नहीं दी तो अकबर ने उस पर एक करोड़ रूपए का जुर्माना लगा दिया था। प्रवीण राय अकबर के दरबार गयी और फिर अपनी वाक्पटुता और काव्यकला के चलते अकबर को परास्त करके वापस आ गए।

प्रवीणराय ने अकबर के सम्मुख एक दोहा गाया

"विनती राय प्रवीन की सुनिए साह सुजान,

जूठी पतरी भखत हैं, बारी बायस स्वान!"

प्रवीण राय ने श्रृंगार की कविताएँ भी की हैं, मिलन की कविता में वह लिखती हैं

कूर कुक्कुर कोटि कोठरी किवारी राखों,

चुनि वै चिरेयन को मूँदी राखौ जलियौ,

सारंग में सारंग सुनाई के प्रवीण बीना,

सारंग के सारंग की जीति करौ थलियौ

बैठी पर्यक पे निसंक हये के अंक भरो,

करौंगी अधर पान मैन मत्त मिलियो,

मोहिं मिले इन्द्रजीत धीरज नरिंदरराय,

एहों चंद आज नेकु मंद गति चलियौ!

यह भारत था, जहाँ पर एक नर्तकी में भी चेतना थी, प्रेम था, इतना साहस था कि अपने प्रेम के लिए वाकपटुता का प्रयोग किया और प्रेम को जिता लाई.

फिर यह वामपंथी नैरेटिव कैसे बन गया कि भारत में स्त्रियों में और विशेषकर हिन्दू स्त्रियों में चेतना नहीं थी?

सोनाली मिश्र

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Editor of Special Coverage News
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