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साइबर सिक्योरिटी से होगी डिजिटिल इंडिया की सेफ्टी

साइबर सिक्योरिटी से होगी डिजिटिल इंडिया की सेफ्टी
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अरविंद जयतिलक

सइबर सिक्योरिटी फर्म सोपोस की 'द स्टेट आॅफ रैंसमवेयर-2021' की सर्वे रिपोर्ट चिंतित करने वाली है कि भारतीय कंपनियों पर साइबर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय कंपनियों को अपना डाटा वापस पाने के लिए 2021 में अब तक 24.7 करोड़ रुपए फिरौती देने पड़े हैं। जबकि पिछले वर्ष 66 फीसद कंपनियों ने फिरौती के तौर पर 8.03 करोड़ रुपए चुकाए थे। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि साइबर हमले और फिरौती की रकम दोनों में लगातार वृद्धि हो रही है। सर्वे रिपोर्ट पर गौर करें तो भारत उन 30 देशों की सूची में शीर्ष पर है जहां कंपनियों को सबसे अधिक हमले झेलने पड़े हैं और सबसे अधिक फिरौती चुकानी पड़ी है। फिरौती की रकम चुकाने के बाद भी कंपनियों को सिर्फ 75 फीसद डाटा वापस मिला है। सिर्फ 4 फीसद कंपनियां ही अपना पूरा डाटा वापस पाने में सफल हुई हैं।

सर्वे में शामिल 86 फीसद भारतीय कंपनियों ने स्वीकारा है कि साइबर हमलावर नए-नए तरीके ईजाद कर रहे हैं ऐसे में उनकी आइटी सेल के लिए हमले को रोकना कठिन हो गया है। गौर करें तो वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 54 फीसद है जो रेखंाकित करता है कि साइबर हमले का सबसे अधिक शिकार भारतीय कंपनियां हैं। यहां ध्यान देना होगा कि जो भारतीय कंपनियां रैंसमवेयर हमले से बची हुई हैं उन्हें भी डर है कि भविष्य में उनके डाटा चुराए जा सकते हैं। सोफोस इंडिया ने आशंका जाहिर की है कि अगर साइबर हमले रोकने के लिए कारगर तंत्र विकसित नहीं किया गया तो न सिर्फ मूल्यवान डाटा से हाथ धोना पड़ेगा बल्कि कंपनियों का बजट भी बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। चूंकि सइबर सिक्योरिटी फर्म सोपोस का यह सर्वे रिपोर्ट यूरोप, अमेरिका, एशिया-प्रशांत, मध्य एशिया, अफ्रीका समेत 30 देशों के 5400 से अधिक लोगों से बातचीत पर आधारित है जिसमें 300 भारतीय भी शामिल है लिहाजा इस पर अविश्वास नहीं किया जा सकता। याद होगा पिछले वर्ष भी एक आईटी एनालिस्ट फर्म ने खुलासा किया था कि देश के 61 प्रतिशत कारोबारी व अन्य श्रेणी के संस्थान साइबर हमले से बुरी तरह प्रभावित हुए और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

गौर करें तो साइबर हमले की शिकार सिर्फ कंपनियां ही नहीं हैं। बैंकों द्वारा साइबर अपराध रोकने के तमाम उपाय गढ़ने के बावजूद भी साइबर हमलावर उसे भेदने में कामयाब हो रहे है। नतीजा साइबर हमले के मामले हर वर्ष तेजी से बढ़ रहे हैं। आए दिन साइबर हमलावर बैंकों में जमा लोगों की गाढ़ी कमाई उड़ाने में सफल हो रहे हैं। लेकिन बिडंबना है कि बैंक अपनी सुरक्षा खामी को मानने को तैयार नहीं हैं। जबकि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा बैंकों को ताकीद किया जा चुका है कि वे मौजूदा सुरक्षा खामी को दुरुस्त कर उसे अभेद्य बनाने की दिशा में ठोस पहल करें। गौर करें तो विगत वर्षों में साइबर हमले में काफी तेजी आयी है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में ही साइबर हमले में 10 फीसद का इजाफा हुआ है। 2018 के नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पिछले दो साल के दरम्यान साइबर अपराध में 33.3 फीसद की बढ़ोत्तरी हुई है। देश के अन्य राज्यों की भी स्थिति कमोवेश ऐसी ही है।

एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि विगत एक दशक में देश में साइबर अपराध के मामले में तकरीबन 88 गुना की वृद्धि हुई है। एनसीआरबी के आंकडों के मुताबिक वर्ष 2015 में साइबर हमले के ग्यारह हजार से अधिक मामले दर्ज हुए जबकि 2017 में बढ़कर इक्कीस हजार के पार पहुंच गया। इसके विपरित साइबर हमले संबंधी गिरफ्तारी में सिर्फ 10 गुना की ही बढ़ोत्तरी हुई है। इन आंकड़ों से समझना कठिन नहीं रह जाता कि साइबर हमलावरों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो साइबर हमले के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरे पायदान पर है। विगत पांच वर्षों में भारत में डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा मिला है। सरकार द्वारा इसे लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। उसी का प्रभाव है कि आज भारत की बड़ी आबादी चाहे शहरी हो अथवा ग्रामीण डिजिटल इंडिया में जी रही है। देश के अधिकांश नागरिक बैंक खाते से लेकर निजी गोपनीय जानकारी तक अपने मोबाइल फोन और कंप्यूटर में सुरक्षित कर रखे हैं। इंटरनेट के जरिए इसे अपडेट करते रहते हैं। यानी कह सकते हैं कि लोगों की इंटरनेट पर तेजी से निर्भरता बढ़ी है। लेकिन ध्यान देना होगा कि उतना ही तेजी से खतरे भी बढ़े हैं। यहीं वजह है कि साइबर हमलावरों द्वारा लगातार हैंकिंग की वारदातों को अंजाम दिया जा रहा है। जो सबसे खतरनाक बात है वह यह कि देश में सक्रिय ठगों के अलावा विदेशी साइबर हमलावर भी लोगों की गाढ़ी कमाई को चूना लगा रहे हैं। साइबर विशेषज्ञों की मानें तो साइबर हमलावर सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए लोगों की रकम तक पहुंच रहे हैं। इन साइबर हमलावरों की नजर देश के प्रमुख औद्योगिक शहरों के बैंक खातारधारकों पर है। दरअसल बैंकों का सर्विलांस सिस्टम बेहद कमजोर है जिसके कारण साइबर हमलावरों का हौसला बुलंद है। जबकि साइबर हमले से निपटने के लिए रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने बैंकों को सख्त निर्देश दिए हैं। मसलन बैंकों को एटीएम से ट्रांजेक्शन हो अथवा आॅनलाइन से उसे 24 घंटे निगरानी में रखना चाहिए। लेकिन बैंक इसमें बुरी तरह नाकाम हैं।

रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया के निर्देशों के मुताबिक बैंकों को दिए गए दिशा निर्देश को ग्राहकों तक पहुंचाना आवश्यक है। लेकिन देखा जाता है कि बैंक यह जानकारी गा्रहकों तक पहुंचाने में सिर्फ खानापूर्ति भर करते हैं। रिजर्व बैंक ने यह तय कर रखा है कि अगर बैंकों की लापरवाही के कारण किसी खाताधारक का नुकसान होता है तो बैंकों को जुर्माना देना होगा। लेकिन इसके बावजूद भी बैंकों का रवैया बेहद निराशाजनक है। हालांकि कुछ बैंक सुरक्षा और जागरुकता के निमित्त ठोस कदम उठाने शुरु कर दिए हैं जिसके सकारात्मक परिणाम मिलने शुरु हो गए हैं। अगर देश के सभी बैंक साइबर सुरक्षा को लेकर समग्रता के साथ काम करें तो साइबर हमलावरों से निपटा जा सकता है। सरकार के आंकड़ें बताते हैं कि पिछले तीन वर्ष के दरम्यान बैंकों से जुड़े साइबर हमले के चालीस हजार से अधिक मामले सामने आए हैं जिसमें हमलावरों ने तकरीबन दो सौ पैंतीस करोड़ रुपए का चूना लगाया है। दरअसल बैंकों ने साइबर सुरक्षा का खाका कागजों पर तो खींच लिया है लेकिन उसे अमलीजामा पहनाने में कामयाब नहीं हुए हैं।

देश में सरकारी व निजी क्षेत्र के तकरीबन ढाई दर्जन बैंक हैं। लेकिन ध्यान दें तो इनमें से अधिकांश बैंकों में अलग से साइबर सुरक्षा डिपार्टमेंट नहीं है। जब भी किसी खाताधारक की गाढ़ी कमाई साइबर हमलावरों की भेंट चढ़ती है बैंक जिम्मेदारी लेने से भाग खड़ा होते हैं। बैंक के जिम्मेदार अधिकारी तमाम जानकारी के बाद भी खाताधारक की मदद के बजाए उसे पुलिस के पास एफआइआर दर्ज कराने के लिए सलाह देते हैं। जबकि ग्राहकों के जुड़े मामलों में बैंकों की सीधे तौर पर जवाबदेही बनती है। बैंकों की बेरुखी के कारण खाताधारकों का नाराज होना लाजिमी है। याद होगा गत वर्ष अमेरिकी कंपनी एफआईएस द्वारा वैश्विक स्तर पर किए गए एक सर्वेक्षण से खुलासा हुआ था कि देश के 18 से 36 वर्ष के आयु वर्ग के युवा उपभोक्ता बैंकों की कार्यप्रणाली से बेहद नाखुश हैं। उसका कारण यह है कि भारतीय बैंक अपने ग्राहकों की अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहे हैं। यह स्थिति ठीक नहीं है। साइबर विशेषज्ञों की मानें तो अगर साइबर हमले पर नियंत्रण नहीं लगा तो आने वाले वर्षों में सिर्फ करोबारी कंपनियां और बैंक ही नहीं बल्कि देश के महत्वपूर्ण संस्थान मसलन रेलवे, अस्पताल, सेना, परमाणु सेंटर इत्यादि पर भी संकट की जद में होंगे।




Shiv Kumar Mishra
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