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अशफाक उल्लाह खां: दुनिया महज इसी बात पर मरती है कि मरने के बाद उसको बुरे अल्फाज से ना याद किया जाए

मैं अप्रूवर हो सकता था, मैं इकबाली बन सकता था, मगर दूसरों की जान फंसाने के लिए और अपनी जिंदगी बचाने के लिए! वह इंसान जो अपनी जिंदगी की खातिर कमीनी हरकत करता है क्या वह आने वाली नस्लों के लिए बाइसे नाज हो सकता है - नहीं, कभी नहीं

अशफाक उल्लाह खां: दुनिया महज इसी बात पर मरती है कि मरने के बाद उसको बुरे अल्फाज से ना याद किया जाए
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आज अवध के लिए खास दिन है। यह दिन भारतमाता के एक सच्चे सपूत और शायर का दिन है।

जनाब वालिदा साहिबा,

मौत और जिंदगी का साथ है - जो दुनिया में आया वह एक रोज जरूर मरेगा। फिर एक ऐसी चीज से जिसका आना लाजमी है, गम करना या खौफ खाना फिजूल व अबस है। मैं अप्रूवर हो सकता था, मैं इकबाली बन सकता था, मगर दूसरों की जान फंसाने के लिए और अपनी जिंदगी बचाने के लिए! वह इंसान जो अपनी जिंदगी की खातिर कमीनी हरकत करता है क्या वह आने वाली नस्लों के लिए बाइसे नाज हो सकता है - नहीं, कभी नहीं।

मुझे इत्मीनान है - मुझे खुशी है कि आने वाली नस्ल मुझको डरपोक और कमीना न कहेगी बल्कि सच्चा और बहादुर कहेगी। दुनिया महज इसी बात पर मरती है कि मरने के बाद उसको बुरे अल्फाज से ना याद किया जाए। आपको फख्र करना चाहिए कि आपका बच्चा बहादुर की मौत मरेगा। अगर मौत से मुकाबला करना पड़ा तो आपको एक बहादुर मां साबित करना होगा। क्या आपकी रगों में खालिस अफगानी खून नहीं है? क्या आप मेरी मां नहीं है? आप पठान हैं, आप मेरी मां हैं। यह आपके ही दूध का असर है जो मैं इंतिहाई खौफ़नाक बातों पर भी हंस देता हूं। आप मुझसे मिलने को आएंगी। बोलो - व भाभी आएंगी, मगर बहादुर बनकर आएँ, जैसी पहले बनकर आईं थीं। मुझको बहादुर बनाकर वापस जाएंगी।

- अशफ़ाक उल्ला खां

(लखनऊ डिस्ट्रिक्ट जेल से मां को लिखे गए पत्र में)

क्रांतिकारी अशफ़ाक उल्ला खां को आज उनकी 120 वीं जयंती पर सादर नमन।

डॉ. शुभनीत कौशिक की वॉल से


Desk Editor
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