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बच्‍चों की आस कैलाश

कैलाश सत्यार्थी को नोबेल शांति पुरस्कार घोषणा की सातवीं वर्षगांठ पर विशेष आलेख

बच्‍चों की आस कैलाश
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आशुतोष नेमा

भारत को शांति और सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। अपने हजारों साल के इतिहास में उसने यह साबित किया है कि वह किसी के लिए आक्रामक रवैया नहीं रखता। वह एक शांतिप्रिय देश है और दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए सदैव अग्रसर रहा है। विश्व में ऐसे कई लोग हुए जिन्‍होंने लोगों के जीवन को बदला है। जिन्‍होंने करुणा, खुशी, अधिकार, प्रेम और सौहार्द को एक जीवित सत्य बनाया है और जिनके नाम विश्व पटल पर एक पुरस्‍कार के माध्यम से अंकित हैं। उस पुरस्‍कार का नाम नोबेल शांति पुरस्‍कार है। यह नोबेल पुरस्‍कारों में सबसे बड़ा पुरस्‍कार है। दुनिया में हर साल 10 अक्‍टूबर को इसकी घोषणा होती है। मदर टेरेसा, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, थियोडोर रूजवेल्ट, जिमी कार्टर, नेल्सन मंडेला, दलाई लामा, कॉफी अन्नान, बराक ओबामा, कैलाश सत्यार्थी आदि ऐसे नाम हैं जिन्‍हें मानवता के नए आयामों को छूने के कारण इस प्रतिष्ठित सम्‍मान से सम्‍मानित किया गया है।


नोबेल पुरस्‍कार की स्थापना 1901 में हुई थी और तब से 2020 तक विश्व में 962 नोबेल लॉरियेट्स हुए। भारत या भारतवंशियों या भारत में काम करने के कारण कुल 12 लोगों को विभिन्‍न क्षेत्रों में इस सम्‍मान से सम्‍मानित किया गया है। जिसमें तीन शांति पुरस्‍कार प्राप्‍तकर्ता हैं। बाकी के 9 पुरस्‍कार साहित्‍य, विज्ञान और अर्थशास्‍त्र के पारंगत लोगों को मिले हैं। नोबल शांति पुरस्‍कार भारत से संबंधित जिन तीन व्‍यक्त्वि को मिला है, वे हैं-मदर टेरेसा, दलाई लामा और कैलाश सत्‍यार्थी। मदर टेरेसा को 1979 में इस सम्‍मान से नवाजा गया। मदर मूलत: अल्‍बानियाई थीं। बाद में वे भारतीय बनीं। उन्‍हें पीड़ित मानवता की सेवा करने के लिए सम्‍मानित किया गया। दूसरा शांति पुरस्‍कार 1989 में दलाई लामा के नाम रहा। उन्‍हें आजादी में अहिंसा के प्रयोग के कारण नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया। दलाई लामा तिब्‍बत में पैदा हुए लेकिन भारत मे शरण ली। अब यहीं उनका घर है।


भारत में तीसरा नोबेल शांति पुरस्‍कार कैलाश सत्‍यार्थी को मिला। सत्‍यार्थी एक खांटी भारतीय हैं। मसलन जिनका जन्म भारत मे हुआ। जिनका कार्यक्षेत्र भारत और पूरी दुनिया है लेकिन जिन्‍होंने भारत की नागरिकता नहीं छोड़ी। इसलिए अगर देखा जाए तो सत्‍यार्थी ही पहले ऐसे खांटी भारतीय हैं जिन्‍हें नोबेल शांति पुरस्‍कार मिला। इससे पहले गांधी जी भी दुनिया के इस सर्वोच्च पुरस्कार के लिए कई नामांकित हुए थे। लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें यह पुरस्कार हासिल नहीं हो पाया। कैलाश सत्यार्थी ने यह पुरस्कार हासिल कर गांधी जी की सत्य और अंहिसा की ही परंपरा को आगे बढ़ाया है। आखिर कैलाश सत्यार्थी तो हमारे समय के गांधी ही हैं। हम नौजवानों ने गांधी जी को तो नहीं देखा, लेकिन सत्यार्थी जी को हम उन्हें इसे रूप में देखते हैं। उनका बाल श्रम के खिलाफ पूरा वैश्विक आंदोलन अहिंसक आंदोलन ही रहा है। वे गांधी जी का तरह ही खादी पहनते हैं और सादगी का जीवन जीते हैं।


एक भारतीय होने के नाते हमें यह जानना चाहिए कि श्री सत्यार्थी ने ऐसा क्‍या किया जिससे कि वे एक वैश्विक नेता के रूप में उभरकर हमारे सामने आते हैं? अभी हाल ही में सत्यार्थी को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपना एसडीजी एडवोकेट बनाया है। एसडीजी एडवोकेट के रूप में सत्यार्थी संयुक्त राष्ट्र संघ के सतत् विकास लक्ष्य को सन् 2030 तक हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यह भारत के लिए गर्व की बात है।

श्री सत्‍यार्थी की बाल दासता को समाप्‍त करने और बच्‍चों के गुणवत्‍तापूर्ण शिक्षा के अधिकारों के लिए वैश्विक आंदोलन के निर्माण में अग्रणी भूमिका रही है। उन्होंने बच्चों के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने और एक ऐसी दुनिया के निर्माण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है, जहां हर बच्‍चे को स्‍वतंत्र, स्‍वस्‍थ, शिक्षित और सुरक्षित जीवन जीने का प्राकृतिक अधिकार हासिल हो सके। इस खांटी भारतीय के प्रयास से ही बाल श्रम के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानून यानी आईएलओ कन्वेंशन-182 पारित हुआ।


लोग कहते हैं कि एक पागल इंजीनियर दुनिया में कुछ भी बदलने का साहस और माद्दा रखता है। यह कथन सच भी है। मध्य प्रदेश के विदिशा के एक साधारण परिवार में जन्‍में सत्यार्थी की पढ़ाई इंजीनियरिंग में हुई। पढ़ाई के बाद कुछ समय तक प्रोफेसर की नौकरी करने के बाद जब समाज मे फैले बच्चों के प्रति अन्याय और शोषण को देखते हुए कुछ करने की इच्‍छा ने नौकरी के मोह को खत्‍म कर दिया, तो अपनी नौकरी त्याग कर दिल्ली आ गए। सत्यार्थी ने 1980 में बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) की स्थापना की और अपने संगठन के माध्यम से पिछले 40 साल में 1 लाख से ज्‍यादा बच्चों को शोषण के विभिन्‍न रूपों से बाहर निकालकर उन्‍हें पुनर्वासित किया है। उन्‍होंने आजाद भारत में बंधुआ मजदूरी और गुलामी के शिकार बच्‍चों और वयस्‍कों को छुड़ाने की पहली लिखित व दस्तावेजी कार्यवाही 1981 में ही कर दी थी।


देश और दुनिया में बच्चों के मुद्दों को समाज, राजनेताओं, सरकारों और सामाजिक संगठनों के प्राथमिक व प्रमुख मुद्दों में लाने का काम भी श्री सत्‍यार्थी ने किया। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि 1998 में एक ऐसी जन-जागरुकता यात्रा निकलती है जो बाल मजदूरी को समाप्त करने के लिए अंतरराष्‍ट्रीय कानून की मांग को लेकर आईएलओ के दरवाजे पर जेनेवा पहुचती है? जेनेवा मे सभी देश के प्रतिनिधि खुले हाथों इस यात्रा का स्वागत करते हैं और एक अंतरराष्‍ट्रीय कानून की मांग का समर्थन करते हैं? यह सब भारत की मिट्टी के एक लाल ने कर दिखाया और आईएलओ कन्‍वेंशन-182 को पारित करवाया। आप कल्पना कर सकते हैं कि भारत में कोई शिक्षा यात्रा निकालकर देश के संविधान में बच्चों की शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिलवा सकता है? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्‍यापार (ट्रैफिकिंग) को रोकने के लिए 12 हजार किलोमीटर "भारत यात्रा" निकालकर एक पूरा आंदोलन ही खड़ा कर देने की? लेकिन श्री सत्यार्थी ने इसे कर दिया और उनके साथ 14 लाख लोग सड़क पर उतर यात्रा में शामिल हुए और उन्हों अपना समर्थन दिया।

कोरोनाकाल में जब स्वास्थ्य और आर्थिक संकट पैदा हुआ तो बच्चे ही उससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। ऐसे में कैलाश सत्‍यार्थी बच्चों की आवाज बन कर अंतरराष्‍ट्रीय मंचों पर उनके अधिकारों की मांग बुलंद की। बाल श्रम, बाल दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग), डिजिटल चाइल्‍ड पोर्नोग्राफी को समाप्‍त करने के सिलसिले में उन्‍होंने "लॉरियेट्स एंड लीडर्स फॉर चिल्‍ड्रेन", "फेयर शेयर टू एंड चाइल्‍ड लेबर" और "100 मिलियन फॉर 100 मिलियन" जैसे संगठनों और अभियानों के माध्‍यम से वे दुनिया की अमीर सरकारों से गरीब देशों के बच्‍चों के लिए अनुदानों को बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। सत्यार्थी बाल दासता को सम्‍पूर्ण रूप से समाप्‍त करने के लिए सामाजिक सुरक्षा कोष भी बनाने की मांग भी कर रहे हैं।


यह सब करने की सामर्थ्‍य भारत माता के आंचल तले पले-बढ़े उस यौद्धा में रही है जिनका नाम श्री कैलाश सत्‍यार्थी है। श्री कैलाश सत्‍यार्थी बच्चों के हक-हकूक की बात करने वाले विश्व की एक प्रमुख और प्रखर आवाज़ बन चुके हैं। वे हर बच्चे का बचपन सुरक्षित और शिक्षित बनाने के लिए जी जान से जुटे हुए हैं। बच्‍चों की आस कैलाश वैसे ही हमारे हीरो नहीं हैं।

(पेशे से इंजीनियर आशुतोष नीमा युवा कवि हैं।)

Shiv Kumar Mishra
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