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हाथरस की निर्भया: इंसाफ की लड़ाई का प्रारम्भ

जिस तरह से कोर्ट इस मुक़दमे को ले रही है, उससे मृतक के परिजनों की उम्मीदें बंधी हैं। अभी लेकिन आगे चलकर यह देखना होगा कि कोर्ट पूरे मामले पर कितनी जल्दी फैसला सुनाने की स्टेज तक पहुँच पाता है।

हाथरस की निर्भया: इंसाफ की लड़ाई का प्रारम्भ
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हाथरस की एससीएसटी अदालत ने गत गुरुवार को कई घंटे चली बहस के बाद हाथरस गैंगरेप-हत्या कांड के चारों अभियुक्तों के विरुद्ध सीबीआई द्वारा दायर सभीआरोप तय कर दिए। न्यायलय ने अगली सुनवाई के लिए 2 मार्च की तिथि निर्धारित की है जिस दिन गवाहियां शुरू होंगी। सुनवाई के समय एडीजे (एससीएसटी) अदालत में सीबीआई की डीएसपी (केस प्रभारी) और मृतक 'निर्भया' के भाई-भाभी के अलावा अभियुक्तों के परिजन तथा बड़ी संख्या में उनके वे 'हमदर्द' मौजूद थे जिन्होंने उक्त कांड के प्रकाश में आने के बाद अभियुक्तों के पक्ष में भारी दौड़-धूप की थी और समूचे मामले को राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया था।


14 सितंबर 2020 को हुए हाथरस काण्ड की अनुगूंज सारे देश में हुई थी। हाथरस का गैंगच केवल क्रूरता की घटना होने के नाते राष्ट्रीय चर्चा में नहीं आया था। इसको कुख्याति मिलने की दूसरी वजह थी अपराधियों के रक्षा कवच बनने की शासन और प्रशासन की कोशिशें। प्रदेश के एडीजी (क़ानून-व्यवस्था) तक ने इसे रेप मानने से शुरू में इंकार किया था।देश भर में उठे विरोध के स्वर और अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेने की चलते इसे सीबीआई को सौंपा गया और तब केंद्रीय एजेंसी ने इसे गैंगरेप-हत्या का मामला मानते हुए कोर्ट में चार्जशीट दायर की थी।


30 सितम्बर 2020 को जबकि देश का मीडिया हाथरस की घटना पर पुलिस-प्रशासन की कारगुज़ारी पर हहकार कर रहा था, विभिन्न विरोधी दलों के नेता इसे शर्मनाक बता रहे थे, तब प्रशासन ने गुपचुप तरीके से मुख्यमंत्री से वीडियो कॉन्फ्रेंस करवाने के बाद 25 लाख रुपये के चेक के आश्वासन के साथ ही मृत लड़की के पिता से एक टाइप्ड कागज़ पर पर हस्ताक्षर ले लिए थे। परिजनों को सख्त हिदायत दे दे गई थी कि चिट्ठी मीडिया को न दिखाएँ। 'क्रूरता प्रबंधन' के मामले में यूपी सरकार और हाथरस के जिला प्रशासन ने देश के सभी हुकूमतों के रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। बावजूद इसके कि पूरे देश में हाथरस पुलिस की थू-थू हो रही थी, प्रशासन चारों तरफ से अपनी आँखें मूँद कर तथ्यों को बरगलाने और समूचे घटनाक्रम को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश में जुटे जुटा रहा।


वस्तुतः 14 सितम्बर को घटना के बाद पूरे मामले की एफआईआर को थाना चंदपा में 'रंजिशन मारपीट' के रूप में दर्ज़ किया गया था। लापरवाही की इस कोशिश के बाद जब परिवार के लोगों और रिश्तेदारों ने शोर करना शुरू कर दिया तो पूरे मामले में हाथरस ज़िला कांग्रेस कूदी। कांग्रेस के घरना-प्रदर्शन और स्थानीय मीडिया में ख़बरें आने के बाद आठवें दिन पूरे मामले को इरादतन हत्या (आईपीसी की धारा 307) में परिवर्तित किया गया।


25 सितम्बर को अलीगढ अस्पताल (जहाँ घायल लड़की भर्ती थी) के डॉक्टरों ने अलीगढ के मीडिया को बताया कि उन्होंने पुलिस को घायल को दिल्ली ले जाने के लिए कहा है लेकिन वे उसे नहीं ले जा रहे हैं। 26 सितम्बर को यह खबर कुछ अखबारों में छपी और कांग्रेस नै शोर किया तो 27 कीसुबह उसे दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल के लिए भेजा गया जहाँ 27 सितंबर की सुबह उसकी मृत्यु हो गयी।


तब हाथरस के गाँव मूलगढ़ी को पुलिस ने छावनी में तब्दील कर दिया था। शुरू में मीडिया को भी रोकने की कोशिशें हुईं लेकिन वे लोग धक्कामुक्की करके घुसपने में कामयाब रहे। लेकिन लम्बे समय तक किसी भी राजनीतिक कार्यकर्ता को गाँव के भीतर नहीं घुसने दिया गया। हाथरस प्रशासन की मदद से पुलिस व्यापक स्तर पर मृत लड़की के परिजनों और रिश्तेदारों को इस बात के लिए मनाने पर तुली रही कि वे किसी भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं से मेल-मुलाक़ात न करें। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लाठी से पीटा गया है। मृतक के घर की आसपास की गलियों को चारों सील कर दिया गया है। मीडिया को 2 सौ मीटर दूर खदेड़ दिया गया है।


कांग्रेस नेता राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी को भी 2 दिन की गहरी मशक़्क़त के बाद ही बूलगढ़ी में दाखिल होने दिया गया था। यूपी सरकार ने मुख्यधारा मीडिया के बड़े हिस्से को मामले को डांवाडोल करवाने की कोशिशों में ख़ूब इस्तेमाल किया था। लेकिन अंततः वह पराजित हुई। जिस तरह से कोर्ट इस मुक़दमे को ले रही है, उससे मृतक के परिजनों की उम्मीदें बंधी हैं। अभी लेकिन आगे चलकर यह देखना होगा कि कोर्ट पूरे मामले पर कितनी जल्दी फैसला सुनाने की स्टेज तक पहुँच पाता है। साथ ही अभियुक्तों को उनके किये की पूरम्पूर सजा मिल पाती है या नहीं।

अनिल शुक्ल
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