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उस शम्मी कपूर को कितना जानते हैं आप, जो लगातार 17 फिल्मों में फ्लॉप हुए : पुण्यतिथि

50 रुपएं के वेतन पर अपने करियर की शुरुआत जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर की थी

उस शम्मी कपूर को कितना जानते हैं आप, जो लगातार 17 फिल्मों में फ्लॉप हुए : पुण्यतिथि
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बॉलीवुड के ऐलविस प्रेस्ली' शम्मी कपूर की आज पुण्यतिथि है..

शम्मी कपूर हिंदी सिनेमा के 1950-60 के दशक में सदाबहार अभिनेता थे। शम्मी का वास्तविक नाम शमशेर राज कपूर था। अपनी विशिष्ट याहू शैली के कारण बेहद लोकप्रिय रहे हिंदी फिल्मों के पहले सिंगिंग-डांसिग स्टार शम्मी कपूर रंगमंच के जाने-माने अदाकार और फिल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के दूसरे बेटे थे। शमशेर् राज कपूर (असली नाम) ने 1948 में पिता पृथ्वीराज कपूर के 'पृथ्वी थिएटर' में 50 रुपएं के वेतन पर अपने करियर की शुरुआत जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर की थी। शम्मी को शुरू में कई असफल फिल्मों के दौर से गुजरना पड़ा। मधुबाला के साथ 'रेल का डिब्बा', 'नूतन के साथ', 'लैला मजनू', सुरैया के साथ 'शमा प्रवाना' जैसी असफल फिल्में की, मगर असफल रहे।" तुमसा नहीं देखा से पहले शम्मी कपूर 17 फ्लाप फिल्में दे चुके थे और उनके मन में यह ख़याल भी आने लग गया था कि उन्हें रोजी रोटी के लिए किसी और धंधे के बारे में सोचना भी शरू कर देना चाहिए। तुमसे नहीं देखा के लिए भी शम्मी कपूर पहली पसंद नहीं थे, देव आनंद के द्वारा इंकार करने के बाद ही फिल्म शम्मी कपूर को मिली थी। जिसने उनके डगमगाते फिल्मी करियर को एक नई दिशा दे दी।

आर-पार' के लिए भी पहले शम्मी कपूर को लेने की काफी कोशिश की गई थी। तुमसा नहीं देखा का एक गीत "सर पर टोपी, लाल हाथ में रेशम का रुमाल' शुरुआत में केवल फिल्म की नायिका अमिता पर ही फिल्माया गया था, शम्मी कपूर के शुभचिंतकों ने उन्हें समझाया कि इस धुन/गीत में लोकप्रिय होने के सारे गुण मौजूद हैं इसलिए किसी भी तरह कोशिश करो कि यह धुन युगल (duet) गीत में परिवर्तित हो जाए, नहीं तो लोग फिल्म की नायिका को ही ज्यादा याद करते हुए ही सिनेमा हाल से बाहर निकलेंगे।

अब शम्मी कपूर ने फिल्म के निर्माता एस मुखर्जी और तोलानी से जब इस संदर्भ में बात की तो उन लोगों ने शम्मी को कहा कि "उन्हें कोई आपत्ति नहीं, हम लोग फिर से रिकार्डिंग और शूटिंग करने का खर्चा भी उठाने को तैयार हैं,किन्तु गाने की दोबारा रिकॉर्डिंग के लिए नैय्यर को तुमको ही मनाना होगा, यदि नैय्यर इसके लिए तैयार नहीं होता है, तो हम भी तुम्हारी कुछ मदद नहीं कर पायेंगे।"

यह घटना उस दौर में ओ पी के रुतबे के बारे में जानकारी देती है कि एस मुखर्जी जैसी हस्ती भी उन पर अपनी राय थोपने से परहेज ही किया करती थी। खैर शम्मी कपूर ने समझदारी से काम लिया, उन दिनों ओ पी नैय्यर का बेटा आशीष पैदा हुआ था, शम्मी शाम को उनके घर गए, ओ पी और उनके संगीत की खूब तारीफ की और उनके बेटे के हाथ में मुंह दिखाई के शगुन के तौर पर सौ रुपये का नोट भी रखा और उसके बाद चले शराब के दौर में बड़े ही नजाकत से ओ पी को उस एकल गीत को युगल गीत में परिवर्तित करने के लिए मना ही लिया।

शम्मी कपूर एक अख्खड़ नायक थे, जब सफलता उनके चरण चूम रही थी तो अक्सर कह उठते थे कि नासिर हुसैन, भप्पी सोनी, शक्ति सामंत की सफलता में शम्मी कपूर नाम का भी बहुत बड़ा हाथ है, किन्तु ओ पी और शम्मी के संबंधों में इसका बिलकुल उल्टा हुआ करता था। ओ पी अक्सर शम्मी कपूर को मीठी उलाहना दिया करते थे की मेरी वजह से तुम्हें बहुत फायदे हुए हैं, मेरी पिक्चर मिस कोका-कोला के दौरान तुम्हारा गीता बाली के साथ प्यार परवान चढ़ा, "तुमसा नहीं देखा" की कामयाबी ने तुम्हारे कैरियर को बचाने के साथ साथ तुम्हे सुपर स्टार का दर्जा भी दिलवाया। शम्मी कपूर खुद ही बताया करते थे कि कैसे कश्मीर की कली में ('तारीफ करू क्या उसकी' की रिकॉर्डिंग के दौरान) ओ पी ने उनकी सलाह मानने से साफ़ इंकार कर दिया था, हाँ बाद में रफ़ी के कहने पर जरूर शम्मी के सुझाव को स्वीकार कर लिया था।

मिस कोका कोला, तुमसे नहीं देखा, बसंत, कश्मीर की कली, मुजरिम, हम सब चोर हैं, ये वो फिल्में हैं जहाँ संगीत ओ पी ने और नायक की भूमिका शम्मी ने निभाई थी। "तुमसा नहीं देखा" से पहले रफ़ी कि आवाज़ का इस्तेमाल रोने धोने, गंभीर तरह के गानों के लिए ही ज्यादा हो रहा था, किन्तु "तुमसे नहीं देखा" के बाद मस्ती, चंचल वाले गानों के लिए भी रफ़ी की आवाज़ का इस्तेमाल तत्कालीन संगीतकार करने लगे, और रफ़ी शम्मी कपूर के साथ साथ अन्य नायकों की भी पसंदीदा आवाज़ बन गए।

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शम्मी कपूर ने 1955 में लोकप्रिय अभिनेत्री गीता बाली से शादी की और इसे उन्होने अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण मुकाम माना। गीता बाली ने संघर्ष के दौर में उन्हें काफी प्रोत्साहन दिया। उनका वैवाहिक जीवन लंबा नहीं रहा क्योंकि गीताबाली का 1966 में निधन हो गया। बाद में शम्मी ने दूसरा विवाह किया।

एक वह दौर भी आया जब हर नयी हीरोइन उनके साथ काम करने और स्टार बनने को लालायित रहती थीं। कल्पना और आशा पारेख से लेकर सायरा बानो और शर्मिला टैगोर तक उनकी शुक्रगुजार हैं। आशा पारेख, सायरा बानो और शर्मिला टैगोर जैसी महान् अभिनेत्रियों ने अपने अभिनय का आरंभ शम्मी कपूर के साथ हीरोइन की भूमिका निभाकर किया था।

नासिर हुसैन की फिल्म 'तुमसा नहीं देखा' में जहां अभिनेत्री अमिता के साथ काम किया वहीं वर्ष 1959 में आई फिल्म 'दिल दे के देखो' में आशा पारेख के साथ नजर आए। बॉलीवुड के लिहाज से हालांकि वह बहुत सुंदर अभिनेता तो नहीं थे बावजूद इसके शम्मी कपूर अपने अभिनय क्षमता के बल पर सबके चहेते बने। वर्ष 1961 में आई फिल्म 'जंगली' ने शम्मी कपूर को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। इस फिल्म के बाद ही वह सभी प्रकार की फिल्मों में एक नृत्य कलाकार के रूप में अपनी छवि बनाने में कामयाब रहे।

शम्मी कपूर के जीवन का एक अन्य महत्वपूर्ण वर्ष 1961 रहा जब, फिल्म 'जंगली' रिलीज हुई। उनकी यह पहली रंगीन फिल्म थी। फिल्म में उनकी 'याहू' शैली और 'चाहे मुझे कोई जंगली कहे' गाने ने उन्हें रातोंरात स्टार का दरजा दिला दिया। इस गाने की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। कई फिल्म समीक्षक शम्मी कपूर की सफलता का श्रेय मोहम्मद रफी द्वारा गाए गए गानों और शंकर जयकिशन के संगीत को देते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि उनकी फिल्मों के जरिए दर्शकों ने तेज धुन पर आधारित गानों को काफी पसंद किया।

'जंगली' फिल्म का गीत याहू दर्शकों को खूब पसंद आया। उन्होंने चार फिल्मों में आशा पारेख के साथ काम किया जिसमें सबसे सफल फिल्म वर्ष 1966 में बनी 'तीसरी आंख' रही। वर्ष 1960 के दशक के मध्य तक शम्मी कपूर 'प्रोफेसर', 'चार दिल चार राहे', 'रात के राही', 'चाइना टाउन', 'दिल तेरा दीवाना', 'कश्मीर की कली' और 'ब्लफमास्टर' जैसी सफल फिल्मों में दिखाई दिए। फिल्म 'ब्रह्मचारी' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला था।

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पारेख ने उनके साथ अपने फिल्मी जीवन की शुरुआत की थी। उन्होंने 'मनोरंजन' और 'बंडलबाज' नामक दो फिल्मों का निर्देशन भी किया, लेकिन यह फिल्में नहीं चलीं। 'प्रेम रोग', 'विधाता' और 'हीरो' जैसी फिल्मों में चरित्र भूमिकाओं के बाद अस्वस्थता ने जब उनकी रफ्तार धीमी कर दी, तो कंप्यूटर के रूप में घर पर उन्हें एक नया दोस्त मिला।

50 से 60 का दौर शम्मी कपूर का सफल दौर माना जाता है। उस दौर की फिल्मों में रोमांस को शम्मी कपूर ने नई परिभाषा दी, बिलकुल पश्चिमी अंदाज में, जो हिंदी फिल्मों के लिए बिलकुल नया था। शम्मी कपूर युवा उमंग से भरे हुए एक कलाकार के रूप में उभरे, जो फिल्म के निर्जीव परदे को अपनी ऊर्जा से भर देते थे। शम्मी कपूर की जिंदादिली और उनपर मोहम्मद रफी की दिलकश आवाज का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोला और शम्मी की फिल्में लगातार सफल होती चली गईं और इस सफलता का सेहरा उनके मधुर गीतों के कारण काफी हद तक मोहम्मद रफी के सिर बाँधा जा सकता है।

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शम्मी कपूर की मदमस्त अदाओं के कारण ही उन्हें 'भारत का ऐलविस प्रेस्ली' कहा जाता था। चरित्र अभिनेता के रूप में शम्मी कपूर को 1982 में विधाता' फिल्म के लिए श्रेष्ठ सहायक अभिनेता' का पुरस्कार मिला।

आज से 10 साल पहले दोनों किडनी फेल, बार- बार डायलिसिस की पीड़ा और थकान की वजह से निधन हो गया मगर होंठों पर वही चिर-परिचित मुस्कन और वही मनमौजी अदा, जिसने सिने-प्रेमियों को दीवाना बना रखा था अंत तक बनी रही।

शम्मी कपूर का नाम इंटरनेट के सर्वाधिक उपयोग करने वालों में आता है। वह 'इंटरनेट यूजर्स कम्युनिटी ऑफ इंडिया' (आई.यू.सी.आई.) के संस्थापक और अध्यक्ष तथा 'इथिकल हैकर्स एसोसिएशन' जैसे इंटरनेट संस्था बनाने में सहायक भी रहे थे। आज वास्तविक जीवन के हीरो शम्मी कपूर को गुजरे 10 साल हो चुके हैं, आज उनकी पुण्यतिथि है।

सादर श्रद्धांजलि !!

- संपादित अंश

संदर्भ पुस्तक - The Facets of Indian Cinema, हिंदी सिनेमा के डेढ़ सौ सितारे, (दुनिया से निराला हूँ, जादूगर मतवाला हूँ)

Sent from vivo smartphone

प्रत्यक्ष मिश्रा
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