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साईकिल पंचर बनाने से लेकर IAS बनने तक का सफर,कुछ ऐसी ही कहानी IAS वरुण बर्नवाल की

साईकिल पंचर बनाने से लेकर IAS बनने तक का सफर,कुछ ऐसी ही कहानी IAS वरुण बर्नवाल की
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वरुण बर्नवाल इन दिनों गुजरात राज्य में पोस्टेड हैं और एक ईमानदार अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं।

संघर्षों के बल पर ही कोई मुकाम पाया जाता है।हर सफलता के पीछे संघर्ष की एक कहानी होती है, किस्मत भी हमेशा उसी का साथ देती है जो चुनौतियों से संघर्ष करने की हिम्मत रखता है। IAS अधिकारी वरुण बरनवाल की कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो संसाधनों और सुविधाओं की कमी का हवाला देकर अपने लक्ष्य को अधूरा ही छोड़ देते हैं। महाराष्ट्र ते ठाणे के बोइसार इलाके के रहने वाले वरुण ने साल 2013 में सिविल सेवा...

संघर्षों के बल पर ही कोई मुकाम पाया जाता है।हर सफलता के पीछे संघर्ष की एक कहानी होती है, किस्मत भी हमेशा उसी का साथ देती है जो चुनौतियों से संघर्ष करने की हिम्मत रखता है। IAS अधिकारी वरुण बरनवाल की कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो संसाधनों और सुविधाओं की कमी का हवाला देकर अपने लक्ष्य को अधूरा ही छोड़ देते हैं। महाराष्ट्र ते ठाणे के बोइसार इलाके के रहने वाले वरुण ने साल 2013 में सिविल सेवा की परीक्षा में 32वीं रैक हासिल की थी। वरुण की जिंदगी में जब भी कोई परेशानी आई तो उन्होंने हार नहीं मानी बल्कि उसका मुकाबला डट कर किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि हर समस्या का समाधान मिलता चला गया और आज वह अधिकारी पद पर तैनात हैं।

जानिए वरुण की कहानी

वरुण बरनवाल की जिंदगी में पहली चुनौती उनकी 10वीं की परीक्षा खत्म होने के तीन दिनों के बाद आई थी, जब पिता का देहांत हो गया था। वरुण के पिता एक साइकिल रिपेयर की दुकान चलाते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी, थोड़ी बहुत जो जमा पूंजी थी वह पिता के इलाज में खत्म हो गई थी। ऐसे में तय हुआ कि घर चलाने के लिए दुकान को जारी रखा जाएगा, लेकिन इसी के साथ यह प्रश्न भी आ गया कि दुकान पर बैठेगा कौन। एक इंटरव्यू में वरुण ने बताया था कि मैंने तय कर लिया था वह पिता की दुकान पर बैठेंगे और अपने परिवार का ख्याल रखेंगे। इसी दौरान उनकी 10वीं के रिजल्ट आ गए, जहां उन्होंने टॉप किया था।

फीस देने के भी पैसे नहीं थे

वरुण ने बताया टॉप के बाद मां ने पढ़ाई जारी रखने के लिए कहा और खुद दुकान की जिम्मेदारी संभाल ली, लेकिन परेशानी अभी भी खत्म नहीं हुई थी। जब वह 11वीं में दाखिला लेने के लिए गए तो उन्हें पता चला कि एडमिशन के लिए भारी रकम की जरूरत है, जोकि उनके पास नहीं है। वह निराशा में कुछ औऱ सोचते कि उसी वक्त उनकी दुकान के सामने से वह डॉक्टर गुजरे जो पिता का इलाज कर रहे थे। बातों-बातों में जब उन्हें पता चला कि स्कूल की फीस भरने के लिए पैसे नहीं हैं तो उन्होंने तुरंत 10 हजार रुपये पढ़ाई के लिए दी।

वरुण ने बताया कि उनकी जिंदगी में 11वीं और 12वीं की पढ़ाई का समय सबसे कठिन रहा। क्योंकि इन दिनों वह सुबह स्कूल जाते थे। स्कूल से आने के बाद ट्यूशन पढ़ाते थे, फिर रात में दुकान का हिसाब देखने के बाद सोते थे। इस दौरान स्कूल की फीस देना भी मुश्किल हुआ करता था। वह बताते हैं कि स्कूल के टीचरों ने अपनी सैलेरी का कुछ हिस्सा देते हुए उनकी दो साल की फीस भर दी थी। वरुण जब 11वीं की पढ़ाई कर रहे थे तो उनका साथ देने के लिए बहन भी ट्यूशन पढ़ाया करती थीं।

डॉक्टर बनना चाहते थे वरुण

वरुण डॉक्टर बनना चाहते थे लेकिन जब उन्हें पता चला कि इसके लिए बहुत पैसों की जरूरत होती है तो उन्होंने इंजीनिरिंग का रुख किया। एक पुश्तैनी जमीन बेचने के बाद पहले साल की फीस भरी गई, इसके बाद उन्होंने जब फर्स्ट इयर में टॉप किया तो उन्हें स्कॉलरशिप मिल गई। बीच-बीच में आती जरुरतों का ख्याल दोस्तों ने रखा और पढ़ाई पूरी हो गई। यहां पर उन्हें एक एमएनसी में नौकरी मिली। परिवार की इच्छा थी कि नौकरी की जाए लेकिन वरुण ने सिविल सेवा की तैयारी की इच्छा जताई और परिवार ने एक बार उनके फैसले का समर्थन किया।

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए पैसे नहीं थे

जब वरुण प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उतरे तो उनके सामने किताब खरीदने के पैसों की समस्या आ गई। तभी वरुण को एक एनजीओ का सहयोग मिला और किताबों की व्यवस्था हो गई। वरुण ने पूरी शक्ति से तैयारी की और सभी की मदद का मोल चुकाते हुए सिविल सेवा में सफलता अर्जित की। इन दिनों वह गुजरात में अधिकारी पद पर तैनात हैं। उनके इस सफर की कहानी इस्पात मंत्रालय ने भी एक फिल्म के माध्यम से दर्शाई है।

Satyapal Singh Kaushik
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