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आखिर ओरछा क्यों आए थे कैलाश सत्यार्थी

आखिर ओरछा क्यों आए थे कैलाश सत्यार्थी
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नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी वैसे तो मूलतः मध्य प्रदेश के विदिशा के हैं, लेकिन वे हाल ही में ओरछा प्रवास पर थे। बताते हैं, वे यहां अपनी बेटी के निकाह में शामिल होने आए हैं। कैलाश सत्यार्थी की बेटी और निकाह! आप के मन में भी यही सवाल पैदा हो रहा होगा। यह सवाल कौतूहल बढ़ाने वाला था।

दरअसल, इमामी खान श्री कैलाश सत्यार्थी के ड्राइवर हैं और इमामी की बेटी नसरीन के निकाह समारोह में शामिल होने के लिए वे अपना विदेशी दौरा रद्द कर जेरोन गांव पहुंचे थे। श्री सत्यार्थी ने अपने ओरछा प्रवास के बारे में बताया, "सत्रह सालों से हमारी कार चला रहे इमामी से मैंने वायदा लिया था कि अगर वह बेटी को खूब पढ़ाएंगे, तो हम उसकी शादी में जरूर पहुंचेंगे। मध्य प्रदेश के जेरोन गांव में पत्नी सुमेधाजी के साथ उन्हीं ख़ुशगवार लम्हों में बिटिया-दामाद को आशीर्वाद देने आया था।"

श्री सत्यार्थी वर्षों पुराना अपना वादा निभाने ओरछा से करीब 60 किलोमीटर दूर जेरोन गांव पहुंचे तो अपनी सांस्कृतिक समरसता के लिए "बुंदेलखंड की काशी" के रूप में प्रसिद्ध पूरा जेरोन गांव उनकी अगवानी कर रहा था। किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि कैलाश सत्यार्थी जैसा अंतरराष्ट्रीय ख्याति का व्यक्ति उनकी खुशियों में शरीक होकर उनका मान बढ़ाने आ सकता है। जेरोन मूलतः ब्राह्मण बहुल गांव है और संस्कृत तथा धर्मशास्त्र के अनेक विद्वानों के कारण इसे "छोटी काशी" भी भी कहा जाता है।

निकाह समारोह के दिन न सिर्फ जेरोन बल्कि आसापास के गांव के भी सैकड़ों लोग वहां मौजूद थे। इमामी के परिवार के लिए तो यह किसी सपने के सच होने जैसा था। इमामी खान ने जब अपने गांव और परिवार के लोगों को बताया कि नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाले दुनिया के महान व्यक्तियों में शुमार श्री कैलाश सत्यार्थी उनकी बेटी के निकाह में शामिल होने गांव आएंगे तो लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था। लेकिन श्री सत्यार्थी को साक्षात देखकर कर गांव के लोग दांतों तले उंगली दबाने लगे। उनके साथ फोटो खिंचाने, सेल्फी और ऑटोग्राफ लेने की ऐसी होड़ दिखी कि प्रशासन और उनके सहयोगियों के लिए स्थिति को संभालना भी मुश्किल होने लगा। हर कोई उनके साथ बात करने, उनके साथ समय बिताने को आतुर था। श्री सत्यार्थी ने भी किसी को निराश नहीं किया। बाद में वे प्रबुद्धजनों के साथ चर्चाओं में भी मशगूल दिखे।

निवाड़ी जिले के जेरोन गांव के निवासी इमामी खान श्री सत्यार्थी के ड्राइवर हैं। 22 नवंबर को उनकी बिटिया का निकाह था। इमामी खान टैक्सी चलाया करते थे। सत्यार्थी से उनकी मुलाकात 17 साल से पहले हुई थी और तब से वे उनके साथ हैं। खान की बेटी जब छोटी थी तो वे एक दिन उसे लेकर श्री सत्यार्थी के घर आए। उन्होंने अल्प शिक्षित इमामी खान से एक वादा लिया कि अगर तुम इसे खूब पढ़ाओ-लिखाओ तो मैं वादा करता हूं कि दुनिया के चाहे जिस कोने में रहूं, बिटिया की शादी में जरूर शामिल होऊंगा। खान ने अपना वादा निभाया। उनकी बेटी बारहवीं की पढ़ाई कर चुकी है और आगे की पढ़ाई जारी रखे हुए है।

सत्यार्थी भी अपना वादा निभाने के लिए पिता की तरह हर रस्म के दौरान मौजूद रहे। शादी के निणंत्रण कार्ड पर भी श्री कैलाश सत्यार्थी और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुमेधा कैलाश का नाम अंकित था। निकाह के दौरान एक और बात अनूठी रही। आमतौर पर निकाह के दौरान महिलाएं पर्दे में रहती हैं। लेकिन बेटियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले श्री सत्यार्थी की मौजूदगी का असर रहा कि महिलाएं भी निकाह पढ़े जाने के दौरान पुरुषों के साथ बराबर शरीक रहीं।

श्री सत्यार्थी के साथियों से एक और बात पता चली जो बेटियों के लिए उनके स्नेह और अपना वचन निभाने की उनकी भावना का परिचय देती है। बाल अधिकारों के लिए पिछले 40 दशकों से अधिक समय से संघर्षरत सत्यार्थी को इटली के वेटिकन सिटी में एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल होना था, जहां ईसाइयों के सबसे बड़े धर्म गुरु पोप ने उन्हें 'बाल श्रम की समाप्तिः बेहतर भविष्य का निर्माण' विषय पर दुनियाभर के प्रसिद्ध और गणमाण्य लोगों के साथ अपने विचार साझा करने के लिए प्रमुख वक्ता के तौर पर आमंत्रित किया था।

लेकिन वर्षों पूर्व किए अपने वादे को निभाने के लिए उन्होंने वेटिकन दफ्तर में अनुरोध भेजा कि वे अपनी बात एक पूर्व रिकॉर्डेड वीडियो मैसेज के माध्यम से देना चाहेंगे, क्योंकि बेटी की शादी के कारण उनके लिए वेटिकन में उपस्थित होना संभव नहीं हो पाएगा। पोप के दफ्तर ने बेटी की शादी के कारण उनके अनुरोध को स्वीकार लिया। लेकिन, शायद पोप को भी यह न पता हो कि उन्होंने अपनी नहीं, ड्राइवर की बेटी के निकाह में शामिल होने के लिए यह कदम उठाया था!!!

सुजीत गुप्ता
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