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मध्यप्रदेश उपचुनाव: चार "संस्कारवान" प्रत्याशी नही खोज पायी भाजपा!

मध्यप्रदेश उपचुनाव: चार संस्कारवान प्रत्याशी नही खोज पायी भाजपा!
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अरुण दीक्षित

भोपाल।भाजपा ने उपचुनाव के लिए अपने चारों प्रत्याशी गुरुवार सुबह घोषित कर दिए।मजे की बात यह है कि मध्यप्रदेश को अपनी नर्सरी कहने वाली भाजपा अपने कार्यकर्ताओं में चार मजबूत प्रत्याशी नही खोज पायी है।चार में से दो प्रत्याशी उसने बाहर से "आयात" किये हैं।

भाजपा नेतृत्व ने यह कोशिश जरूर की है कि वह पार्टी में वंशवाद को खत्म करने की दिशा में बढ़े।लेकिन उसने यह प्रयोग उन नेताओं पर किया है जो अब इस दुनियां में नही हैं।

भाजपा ने खण्डवा लोकसभा क्षेत्र के लिए नए चेहरे ज्ञानेश्वर पाटिल को चुना है।जबकि जोबट विधानसभा पर सुलोचना रावत को उतारा है।रैगांव क्षेत्र से युवा प्रतिमा बागरी को मैदान में उतारा गया है।जबकि पृथ्वीपुर से शिशुपाल यादव प्रत्याशी बनाये गए हैं।

उल्लेखनीय यह है कि सुलोचना रावत पिछले दिनों ही कांग्रेस छोड़ भाजपा में आई थीं।वह कांग्रेस से विधायक भी रही हैं और दिग्विजय मंत्रिमंडल की सदस्य भी।

पृथ्वीपुर से प्रत्याशी बनाये गए शिशुपाल यादव ने पिछला विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के रूप में लड़ा था।अब वे सायकिल छोड़ भाजपा के रथ पर सवार हो गए हैं।

रैगांव से प्रतिमा बागरी को मैदान में उतारा है।वह स्वर्गीय जुगलकिशोर बागरी के परिवार से तो हैं।लेकिन उनके बड़े भाई की नातिन हैं।जबकि जुगलकिशोर के दोनों बेटे देवराज बागरी और पुष्पराज बागरी टिकट मांग रहे थे।पर नेतृत्व ने उन्हें टिकट के लायक नही समझा।

खण्डवा में भी इसी तरह का प्रयोग किया गया है।कोरोना की बजह से जान गवाने वाले वरिष्ठ नेता और सांसद नंद कुमार सिंह चौहान के बेटे हर्ष चौहान की बजाय नए चेहरे ज्ञानेश्वर पाटिल को मैदान में उतारा है।पाटिल खण्डवा जिला पंचायत के अध्यक्ष रहे हैं।उनकी कोई बड़ी राजनीतिक पृष्ठभूमि नही रही है।

माना जा रहा है कि इस क्षेत्र के दो बड़े रसूख वाले परिवारों को किनारे करने के लिए भाजपा ने यह फैसला किया है।इस क्षेत्र से नंद कुमार चौहान के बेटे के अलाबा पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस भी दावेदारी कर रही थीं।अर्चना के पिता भी इस क्षेत्र के नामचीन नेता रहे थे।अर्चना पिछला विधानसभा चुनाव हार गईं थीं।हालांकि उनका दावा है कि पार्टी के ही कुछ नेताओं ने भितरघात करके उन्हें हराया था।

भाजपा ने पहली बार इस क्षेत्र में प्रयोग किया है।इस सीट पर राजपूत समाज के नेता ही ज्यादा जीते हैं।कांग्रेस ने राजपूत नेता को ही टिकट दिया है।ऐसे में पाटिल को टिकट देकर पार्टी ने ओबीसी कार्ड खेला है।शिवराज सिंह चौहान और विष्णुदत्त शर्मा ने खुद खण्डवा जाकर उनका नामांकन कराया है।देखना होगा कि यह कार्ड कितना कारगर सावित होता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2003 से मध्यप्रदेश में राज कर रही भाजपा आज तक आदिवासियों में अपनी पैठ क्यों नही बना पाई है।जिस झाबुआ के इलाके में संघ और भाजपा दशकों से सेवा कार्य कर रहे हैं उसमें कांग्रेस से प्रत्याशी उधार लेना पड़ा है।

यही हाल उत्तरप्रदेश की सीमा से लगे पृथ्वीपुर विधान सभा क्षेत्र का है।वहां उसने सपा से आये व्यक्ति को अपना प्रत्याशी बनाया है।जबकि इसी इलाके में उसके कद्दावर नेता सुनील नायक ने चुनावी लड़ाई में अपनी जान गंवाई थी।

कुल मिलाकर स्थिति यह है कि भाजपा को चारों क्षेत्रों में आंतरिक कलह से गुजरना होगा।चूंकि नेतृत्व की लाठी मजबूत है इसलिए सड़क पर बगावत होने की उम्मीद नही है।पर इतना तय है कि दमोह का असर जरूर दिखेगा।

उल्लेखनीय है कि दमोह उपचुनाव में भाजपा ने कांग्रेस से आये राहुल लोधी को प्रत्याशी बनाया था।प्रतिष्ठा के इस चुनाव में भाजपा कार्यकर्ताओं ने पार्टी प्रत्याशी को बड़े अंतर से हरा दिया था।तब यह कहा गया था कि पार्टी को बचाने के लिए पार्टी प्रत्याशी को हराया गया है।

फिलहाल जोबट और पृथ्वीपुर में ऐसी ही स्थिति बन सकती है।खण्डवा और रैगांव में भी उलटफेर भाजपा कार्यकर्ता ही कर सकते हैं।क्योंकि दोनों ही जगह लंबे अरसे से सक्रिय परिवारों की राजनीति दांव पर लगी है।अगर पार्टी द्वारा चुने गए प्रत्याशी जीत गए तो इन परिवारों का राजनीतिक भविष्य खत्म हो जाएगा।

अरुण दीक्षित
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