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शेरनी की तरह रहने वाली मायावती अस्तित्व बचाने के लिए कर रही है संघर्ष!

यूपी में एक वक्त मजबूत ताकत बनकर उभरी बहुजन समाज पार्टी आज नेतृत्व संकट का सामना कर रही है. कांशीराम और मायावती की इस पार्टी की ऐसी हालत आखिर क्यों हो गई?

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दलित-बहुजन आंदोलन से उभरी बहुजन समाज पार्टी (BSP) की ताकत ढलान पर है. पार्टी ज़मीनी और राजनीतिक दोनों स्तर पर कमजोर पड़ती दिख रही है. राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा अलग-अलगअनुमानों के बावजूद, कोई भी उत्तर प्रदेश में दलित-बहुजन आंदोलन के भविष्य की साफ भविष्यवाणी करने की हालत में नहीं है. बसपा के पतन के बाद भी, जब तक गरीबी और भेदभाव है, तब तक दलित-बहुजन आंदोलन जारी रहेगा. लेकिन सवाल ये है कि भारत में इस आंदोलन का नेतृत्व कौन करेगा, खासकर उत्तर प्रदेश में मायावती (Mayawati) के उत्तराधिकारी के रूप में कौन सामने आएगा.

कांशी राम और मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने भारतीय लोकतंत्र में भारी बदलाव किए. पार्टी ने दलित-बहुजन प्रतिनिधित्व के लिए जगह बनाई है. बसपा ने दलित समुदाय से 'डीएम और सीएम' बनाने के लिए शर्तें रखीं और उन्हें विश्वास दिलाया. इसने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संसाधनों को उत्पन्न करने की कोशिश की. जिससे इस समुदाय को कुछ हद तक सम्मान और आत्म-सम्मान मिला. लेकिन, धीरे-धीरे, बीएसपी राजनीतिक रूप से कमजोर हो रही है. ऐसा लग रहा है कि पार्टी समुदाय की बदलती आकांक्षाओं को प्रभावी ढंग से जवाब देने में असमर्थ है.

पार्टी नेतृत्व संकट का सामना कर रही है. मायावती के समकालीन कांशीराम द्वारा लाए गए नेताओं ने या तो पार्टी छोड़ दी या फिर उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया. इसलिए बीएसपी का भविष्य धीरे-धीरे चरमरा रहा है. इसकी एकमात्र उम्मीद ये है कि जाटवों और कुछ अन्य वंचित समुदायों का एक मजबूत वोट आधार काफी हद तक उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में बसपा के पास है.

क्या सतीश चंद्र मिश्रा को मिल सकती है कमान?

मायावती ने हाल ही में अपना 65वां जन्मदिन जनकल्याणकारी दिवस के रूप में मनाया. सवाल उठता है कि मायावती का उत्तराधिकारी कौन होगा? ये सच है कि मायावती ने न तो अपना उत्तराधिकारी घोषित किया है और न ही पार्टी के भीतर किसी को सत्ता और अधिकार दिए हैं. उन्होंने सर्वोच्च कमान अपने हाथ में रखी है. कभी-कभी ऐसा लगता है कि सतीश चंद्र मिश्रा पार्टी के फैसले मायावती की तरह लेते हैं. बीएसपी में मिश्रा के प्रभाव को मापना मुश्किल है. लेकिन लगता नहीं है कि मायावती का दलित आधार उन्हें स्वाभाविक नेता के रूप में स्वीकार करेगा.

मायावती के चचेरे भाई आकाश भी रेस में

अटकलें लगाई जा रही हैं कि 2019 में संसदीय चुनावों में सक्रिय हुई मायावती के भतीजे आकाश (भाई आनंद कुमार के बेटे) उनके उत्तराधिकारी के रूप में उभर सकते हैं. ये संभव है, लेकिन मायावती ने इस बारे में पार्टी के भीतर कोई संकेत नहीं दिया है. अगर ऐसा कुछ है भी तो बहनजी से आकाश को सत्ता का हस्तांतरण करना आसान नहीं होगा. ये बसपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच बहुत अधिक असंतोष पैदा कर सकता है.

चंद्रशेखर आज़ाद की चुनौती

दलित युवा नेता चंद्रशेखर आज़ाद पहले से ही उत्तर प्रदेश में दलित-बहुजन आंदोलन के भावी नेता होने का दावा कर रहे हैं. वो बसपा के दलित आधार में सेंध लगाने के लिए जोर लगा रहे हैं. उन्होंने आजाद समाज पार्टी (एएसपी) का गठन कर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का प्रदर्शन किया है. वो दलित समुदाय के सामने ये साबित करने के लिए हर मौके का उपयोग करने की कोशिश कर रहे हैं कि वो उनके अपने नेता हैं जो उनके मुद्दों को जोरदार तरीके से उठा रहे हैं.

मायावती बनाम चंद्रशेखर

कई बार ऐसा लगता है कि मायावती दलितों के मुद्दों से दूर जा रही है. जबकि चंद्रशेखर लगातार हर मुद्दे के साथ खड़े रहते हैं. ऐसे में चंद्रशेखर दलितों के बीच काफी लोकप्रिय होते जा रहे हैं. हालांकि मायावती का प्रभाव दलितों के हर वर्ग पर है. ऐसे में चंद्रशेखर को युवा दलितों को ही नहीं बल्कि बुजुर्गों पर भी प्रभाव छोड़ना होगा. चंद्रशेखर के लिए रास्ते आसान नहीं है. अगर मायावती का कोई विकल्प दलित-बहुजन राजनीति के भीतर नहीं आता है, तो बसपा का वोट आधार कांग्रेस, भाजपा और समाजवादी पार्टी जैसे अलग-अलग मुख्यधारा के राजनीतिक दलों द्वारा खंडित और बेकार हो सकता है. अगर ऐसा होता है, तो दलित समुदाय लोकतांत्रिक ताकत खो सकता है.

(लेखक जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान प्रयागराज के प्रोफेसर और निदेशक हैं, ये उनके निजी विचार हैं साभार न्यूज 18)

Shiv Kumar Mishra
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