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कमाल का प्रचार करते हैं अखबार और सच्चाई ढूंढ़े नही मिलती, मंत्री पुत्र की गिरफ्तारी और दैनिक जागरण की रिपोर्टिंग, फॉलोअप जैसा कुछ नहीं!

कमाल का प्रचार करते हैं अखबार और सच्चाई ढूंढ़े नही मिलती, मंत्री पुत्र की गिरफ्तारी और दैनिक जागरण की रिपोर्टिंग, फॉलोअप जैसा कुछ नहीं!
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संजय कुमार सिंह

दैनिक जागरण ने कल मंत्री पुत्र की गिरफ्तारी के साथ खबर दी थी कि उसे कल यानी इतवार को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना था। आज के अखबार में इस संबंध में पहले पन्ने पर कोई खबर नहीं है। दूसरे अखबारों से पता चला कि मंत्री पुत्र को 14 दिन की हिरासत में भेज दिया गया है। दूसरे अखबारों की खबरों से लगता है कि उसे न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया और उन्हीं ने उसे 14 दिन की हिरासत में भेजा है। पर दैनिक जागरण ने जब मूल खबर के साथ बताया गया था कि इतवार को न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा तो 14 दिन की हिरासत में भेजे जाने की खबर क्या कम महत्वपूर्ण है जो पहले पन्ने पर नहीं है?

संयोग से, आज दैनिक जागरण में पहले पन्ने पर एक खबर है, अग्रिम जमानत देने से पहले कोर्ट को अपराध की गंभीरता देखनी चाहिए। वैसे तो इसमें कुछ नया नहीं है और सबको पता है फिर भी दैनिक जागरण ने वारदात के एक हफ्ते बाद मंत्रीपुत्र की गिरफ्तारी और इस बीच राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट की खिंचाई के मद्देनजर आज 14 दिन के लिए हिरासत में भेजे जाने की गंभीरता बतानी चाहिए थी। खासकर इसलिए कि कल ही, अखबार का उप शीर्षक था, कसा शिकंजा - लखीमपुर कांड में पहली गिरफ्तारी, आज मजिस्ट्रेट के सामने पेशी। इस महत्वपूर्ण मामले में पुलिस कैसे काम कर रही है इसपर भी एक विशेष टिप्पणी पहले पन्ने पर हो सकती थी। अंदर तो होनी ही चाहिए थी पर ऐसी कोई सूचना पहले पन्ने पर नहीं है।

यही नहीं, अखबार ने कल पहले पन्ने पर अंदर संपादक मालिक का एक संपादकीय होने की सूचना छापी थी, राजनीतिक दलों के रवैये से साफ है कि न तो लखीमपुर खीरी कांड की जांच का इंतजार करने वाले हैं और न ही उसके नतीजे से संतुष्ट होने वाले हैं। ऐसे में आज अखबार को बताना चाहिए था कि मंत्री पुत्र को 14 दिन हिरासत में भेजे जाने का क्या मतलब है। दैनिक जागरण ने कल यह भी खबर दी थी कि मंत्री जी के संसद कार्यालय पर रहा समर्थकों का जमावड़ा। गिरफ्तारी और हिरासत में रखने के अदालत के आदेश के बाद मंत्री जी के समर्थकों का क्या कहना है, इसे भी तो बताना चाहिए? लेकिन लगता है कि जागरण अब फैसले का इंतजार करेगा जैसा कल के लेख में संपादक जी ने जनता से चाहा है।

कहने की जरूरत नहीं है कि अखबार की सूचनाओं को आप जितना महत्व देना चाहें दीजिए पर यह भी देखिए कि अखबार क्या बताता है और क्या बताने के मौके पर चुप हो जाता है। मंत्री पुत्र की गिरफ्तारी भले कई दिनों बाद और मजबूरी में हुई हो, को बड़ी खबर और बड़ी कार्रवाई के रूप में पेश करने के बाद आज उसका फॉलोअप उस स्तर का नहीं है। क्योंकि मंत्री पुत्र के अपराध में शामिल होने का शक मजबूत हो रहा है। इस बिना पर मंत्री जी को नैतिक रूप से इस्तीफा दे देना चाहिए। पर उसकी भी कोई खबर नहीं है। अखबार ने कल बताया था कि अजय मिश्र के इस्तीफे की मांग को लेकर मौनव्रत रखेंगे कांग्रेसी। लेकिन आज उसका भी फॉलोअप पहले पन्ने पर नहीं है। मैं दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण की बात कर रहा हूं।

दूसरे अखबारों में द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में बताया है कि मंत्री का बेटा जेल गया, पुलिस हिरासत की मांग करेगी। द हिन्दू की खबर के अनुसार इस संबंध में सोमवार को (आज) पुलिस की याचिका पर सुनवाई होगी। जब केंद्रीय (गृह राज्य) मंत्री का बेटा हत्या जैसे आरोप में बंद है तो पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत का अंतर आम लोगों को बताया जाना चाहिए। खासकर तब जब मरने वालों में एक पत्रकार भी है और हिन्दी पट्टी की पूरी राजनीति उसपर केंद्रित हो गई लग रही है। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की एक खबर है, :"लखीमपुर : पुलिस ने आशीष के मित्रों का पता लगाने के लिए छापे मारे"। कहने की जरूरत नहीं है कि इस मामले में अभी तक ना सिर्फ मंत्री पुत्र आजाद घूम रहा था बल्कि दूसरे भी फरार हैं। अखबारों को खबर देना चाहिए कि कुल 14 नामजद में अभी तक कितने गिरफ्तार किए गए हैं।

हिन्दुस्तान टाइम्स ने बताया है कि मंत्री पुत्र को जेल में क्वारंटीन कर दिया गया है। निश्चित रूप से ऐसा उसे कोविड संक्रमण से बचाने के लिए किया गया है और मुमकिन है यह मंत्री पुत्र के लिए विशेष सुविधा हो वरना यह सावधानी शुरू से बरती जाती तो जेलों में कोविड पहुंचने से रोका जा सकता था। पर अभी वह मुद्दा नहीं है। निश्चित रूप से खबर का हिस्सा है जिसे हिन्दुस्तान टाइम्स ने महत्व दिया है। अखबार ने लिखा है कि उसे शनिवार को ही स्थानीय अदालत में पेश किया गया था।

अखबार ने यह भी बताया है कि आशीष का फोन जब्त कर लिया गया है। अखबारों की खबरों से लग रहा है कि आशीष ने वारदात के वक्त मौके से कहीं और होना साबित करने की कोशिश की है पर संबंधित सवालों के जवाब नहीं दे पाया। आम मामला होता तो पुलिस सबूत नष्ट करने से लेकर घुमराह करने तक की कई धाराएं लगा देतीं और अखबार विश्वस्त सूत्रों की पुलिसिया लीक से भरे होते लेकिन अभी जागरण जैसे अखबार उन तथ्यों को भी नहीं बता रहे हैं जिनसे मंत्री पुत्र यानी मंत्री और सरकार का अपमान होता हो। बेशक यह अपराधियों की सरकार का सम्मान करने जैसी देशभक्ति है।

इन खबरों के बीच आज यह खबर सबसे दिलचस्प है, "मोदी तानाशाह नहीं हैं, सबके विचार सुनते हैं : शाह"। अब इसमें कौन किसकी तारीफ कर रहा है और किसलिए कर रहा होगा जानते हुए द हिन्दू ने इसे लीड बनाया है जबकि दैनिक जागरण में यह सिंगल कॉलम में है। द हिन्दू ने हाईलाइट कर बताया है कि अमितशाह के अनुसार मोदी जी ने क्या कमाल किए हैं। दैनिक हिन्दुस्तान ने ऐसी ही कमाल की खबरों में से एक को लीड बनाया है जो किसी और अखबार में नहीं है। दैनिक जागरण की लीड का शीर्षक है, आतंकियों से गठजोड़ में 670 हिरासत में, चार गिरफ्तार (हिरासत में और गिफ्तार का अंतर आ समझते ही होंगे)। उपशीर्षक है, साजिश बेनकाब - कश्मीर में हिन्दुओं और सिखों की हत्या के बाद पुलिस की बड़ी कार्रवाई। कश्मीर के हालात पर निष्पक्ष रिपोर्टिंग का हाल यही है कि जागरण ने राज्य ब्यूरो की खबर श्रीनगर से छापी है जबकि दो साल से भी ज्यादा हो गए कश्मीर राज्य नहीं रहा, केंद्र शासित प्रदेश हो गया है। इसपर नया इंडिया में श्रुति व्यास की रिपोर्ट पढ़ने लायक है, लिंक कमेंट बॉक्स में।

Shiv Kumar Mishra
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