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यह आकर्षक धरती: सब से पहले हिन्द के रहने वालों को हिन्दू के नाम से किसने पुकारा?

यह आकर्षक धरती: सब से पहले हिन्द के रहने वालों को हिन्दू के नाम से किसने पुकारा?
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उपमहाद्वीप (हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, बंग्लादेश) इतिहास के शरू दौर से ही हिन्द के नाम से जाना जाता है। पुराने ज़माने में जब भी कोई क़ौम यहां बाहर से आकर आबाद हुई तो पश्चिम ही के रास्ते आई, या तो अरब सागर से या उत्तर पश्चिम के पहाड़ी रास्तों से होते हुए। चाहे जिधर से भी वह लोग आये इस ज़मीन पर आते ही उन्हों ने सिंध नदी के चोड़े चकले बहाव को अपने सामने मौजूद पाया। उत्तर से दक्खिन पश्चिम की ओर बहते हुऐ अरब सागर में मिल कर इस दरया ने नऐ आने वाले और संस्कृत बोलने वाले आर्याओं को हैरानगी और डर से पुकारने पर मजबूर कर दिया ''सिंधू''! वो केवल संस्कृत भाशा में शब्द "नदी" बोले थे मगर उस क्षेत्र का नाम ही 'सिंध' पड़ गया।

बाद में यूनानियों ने उसके चारों ओर के बडे इलाक़े को इण्डोस, रोमनों ने इण्डस, अरबों और इरानियों ने हिन्द, और यूरोप वालों ने इन्दे या इण्डिया कहा। और यह अरब ही थे जिन्हों ने सब से पहले हिन्द के रहने वालों को हिन्दू के नाम से पुकारा, और बाद में उसी कार​ण उनके धर्म के अस्पशट नाम 'ब्रहमणी' को हिन्दू-मत कहा गया। सिंध नदी के आस पास की ज़मीन अकेले ही पुराने हिन्दुस्तान का पूरा इलाक़ा नहीं थी। वह तो एक बहुत ही वड़े इलाक़े का सिर्फ़ एक छोटा सा टुकड़ा थी। ऐसा अक्सर हुआ है कि एक बडे़ इलाक़े का नाम उस के किसी ख़सूसी छोटे से टुकड़े के नाम पर पड़ गया हो। और यहां भी ऐसा ही हुआ। फिर जब 1947 में मुल्क हिन्दुस्तान को बांट दिया गया तो कि़स्मत का खेल ही है कि उस को नाम देने वाला क्षेत्र एक नया नाम 'पाकिस्तान' ले कर सामने आया, और जहां सिंध दरया मौजूद नहीं वह 'हिन्द' ही रहा।

अनजाने प्राचीन समय से ही यहां बाहर से आने वालों का एक सिलसिला लगा हुआ हैः बिला मक़सद आने वाले, आक्र्म्णकारी, सौदागर, यात्री, बस जाने वाले, फ़ातेह, और उस को अपनी कालोनी बनाने वाले। इन में आर्याई, यूनानी, साका (तूरानी), पहलवा (परशियन), कुशन, हन, अरब, तुर्क, अफ़ग़ान, पुर्तगाली, डच, फ़रान्सीसी और अगज़्रें, सब ही शामिल हैं। यह भी एक ख़ूबी की बात है कि हर आने वाला अपने साथ नये रंग और नस्ल, तहज़ीब और सभ्यता, रस्म और रवायात, भाशा और धर्म की दौलत भी लाया।

फिर यह कोई हैरत की बात नहीं है कि उस की तस्वीर के बडे पर्दे पर मुख़तलिफ़ रंगों के छोटे छोटे बेशुमार नज़ारे फैले हुये नज़र आते हैं, और उन में हर एक अपनी सुंदरता में डूबा हुआ है। इस सिलसिले में दो कैफि़यतें काम करती रही हैं: ख़ुद अपनी कशिश और मोहकता, और बाहर से अन्दर की ओर ढकेलना। हर ज़माने में इस ज़मीन की ज़रखेज़ी, घने जंगलात, कम आबादी, उबलती नदियां, दूध देने वाली गायें और भैंसें, और बोझ उठाने वाले जानवरों की बहुतायत, धातों की फ़रावानी, तिजारती रास्तों की सहूलतें, और सोने और जवाहिरात के ढेर के बारे में कहानियां लोगों को अपनी ओर बुलाती रहीं हैं। दूसरी तरफ़ हिन्दुस्तान से मिले हुए इलाक़ों में ज़राए से ज़्यादा अबादी और ख़ुश्क और बंजर ज़मीनों ने लोगों को उसकी हरयाली और ज़रख़ेज़ी की ओर ढकेला है। जैसे कि यह एक मोहक दुनिया है जो हर तरह के लोंगों को अपनी ओर खींचती चली आ रही है।

उस्मान शेर

Shiv Kumar Mishra
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