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आज मजदूर दिवस है, क्या झारखंड सिमडेगा की कोयलादेवी याद है...?

आज मजदूर दिवस है, क्या झारखंड सिमडेगा की कोयलादेवी याद है...?
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विनय मौर्या

आज "मजबूर" दिवस है...ओह माफ़ी आज मजदूर दिवस है। वैसे माफ़ी क्यों..? मजबूर भले ही मजदूर का पर्याय न हो,मगर मजदूर मजबूर का पर्याय तो है ही। क्योंकि हर मजदूर मजबूर होता है,मगर हर मजबूर मजदूर नहीं होता।

झारखंड सिमडेगा की कोयलादेवी याद है...? शायद नहीं होगा। याद भी कैसे होगा वह कोई सेलिब्रिटी थोड़े है। अरे याद करिये,भात...भात...भात...याद आया...अब भी नहीं..?

अच्छा बता देता हूँ, आज से तीन साल पहले मजदूर कोयलादेवी की बिटिया भूख से तड़प तड़प कर भात, भात,भात,करके मर गयी थी। उसकी मां का कहना था कि उसने आठ दिन से खाना नहीं खाया था।

खैर छोड़िये कोयलादेवी और उसकी बिटिया को वह बीती बात हो गयी। वर्तमान में आईये अपनी निगाह मोबाईल टीवी से हटाइये। लॉक डाऊन में ही सही कम से कम देखिए महसूस करिये हजारों कोयलादेवी जैसे मजदूर,किस तरह मजबूर हैं।

कोई भूख से तो कोई भय से इधर उधर भाग रहा है,मगर मेनस्ट्रीम मीडिया इस वक्त सिर्फ "दूसरा विषय" लिए जाग रहा है। उसके डिक्शनरी में मजदूरों का पलायन,उसका दर्द उसकी समस्या,उसकी व्यथा है ही नहीं। क्योंकि उसके नजर में मजदूर तो यह सब झेलने के लिए बना ही है।

फिर उसे मजदूरों की मजबूरी क्यों दिखाई देगी। उसके लिए तो करीना कपूर की डायटिंग उसके बच्चे तैमूर का गिला डायपर,तबलीगी जमात,धर्मांधों की बात ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसका कारण है कि मेनस्ट्रीम मीडिया खुद मजदूर हो चुकी है। वह व्यस्त है सत्ता की मजदूरी में । उसे ढोना है उस खबरों को जिससे उसे चार पैसे की आमदनी हो,उसे उठा उठाकर रखना है सरकार के उस पक्ष को जिससे सत्ता शीर्ष व्यवस्थित रह सके। उसे पसीना बहाना है उनके लिए जो सोने की छड़ी कुर्सी पर बैठा है।

ताकि हर शाम को वह उनके आगे मालिक,मालिक कर दण्डवत हो मजदूरी ले पाए। ताकि उनका पेट चल सके।

वैसे उनकी यह मजदूरी इस सरकार से नहीं पूर्व से चलती आ रही है,और चलती जाएगी। इसलिए उन्हें वास्तविक मजदूर मजबूर नहीं दिखाई दे रहे हैं।

बल्कि उन्हें हजारों कोसों भूखे प्यासे पैदल सफर करते मजदूर उन्हें प्रतिस्पर्धी लग रहे हैं। इसलिए प्रतिस्पर्धी की पीड़ा से उन्हें क्या मतलब,वह गिरे मरें अपनी बला से।

खैर छोड़िये मुख्यधारा की मीडिया( Mainstream media)को आप और हम ही कितना मजदूरों को समझ रहे हैं। आज उनकी दशा को समझने मदद करने की बजाय सोशल मीडिया पर एक दूसरे को तंज कसते हुए तबलीगी जमात गिन रहे हैं।

जबकि जरुरत है "मजदूरी जमात" को देखने उनकी दशा को दिखाने की।

की वह कितने बेहाल है, परेशान है,उसकी क्या ज़रूरते हैं,क्या समाधान है।

वरना यह दिवस यह उस मजबूर का मजाक है जिसे लोग मजदूर कहते हैं।

और हां,यकीन करिये मैं भी एक मजदूर हूँ, एक ऐसा मजदूर जो अपनी मजबूरी सबसे कह भी नहीं सकता।

Shiv Kumar Mishra
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