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उत्तर प्रदेश: किसान की हालत और व्यवस्था के दावे!

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लक्ष्मी चंद्र अवस्थी

विगत 14 से 16 सितंबर 2021 के बीच हुई असमय मूसलाधार बारिश ने किसानों की फसलों का बड़ा नुकसान किया हैं. वैसे पूरे उत्तरप्रदेश में बारिश की वजह से फ़सलें चौपट हो गयी हैं, जिसमे धान की लालमती और बासमती प्रजाति, अरहर और उरद पूरी तरह से नष्ट हो चुकी हैं. तराई पट्टी और पूर्वांचल में इस बारिश का असर सबसे ज़्यादा देखने को मिला है। लखीमपुर खीरी, बहराइच, गोण्डा, बाराबंकी, अयोध्या ज़िले ज़्यादा प्रभावित हुए हैं। प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना जो साल 2016 में लांच की गई थी ऐसी आपदा से निपटने के लिये ही बनी थी। लेकिन उसने किसका फ़ायदा किया है उसका अंदाज़ा किसानों को हुए नुकसान और बीमा कंपनी को हुए फ़ायदे के आंकड़ों से लगाया जा सकता है.

वर्तमान में फ़सल बीमा योजना के नाम पर बीमा कम्पनियाँ अपनी झोली भरने में जुटी हुई हैं। 2018-19 तथा 2019-20 के बीच 31905 करोड़ रुपये प्रीमियम के रूप में किसानों से लिया गया जबकि मुआवज़ा मात्र 21937 करोड़ रुपये का दिया गया, बाक़ी 10,000 करोड़ रुपये बीमा कंपनियों की तिजोरी में चले गए। जिसमे सिर्फ़ उत्तर प्रदेश के किसानों को प्रीमियम भुगतान 1,895 करोड़ रुपये के सापेक्ष मात्र 595 करोड़ रुपये मुआवजे के रूप में मिले। 2019-20 तक 2307.4 लाख किसानों ने बीमा कराया, इनमें से मात्र 772.1 लाख यानी 33.4% को ही लाभ मिला। इसी वजह से इस साल आंध्रप्रदेश, झारखंड, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, गुजरात और बिहार जैसे राज्यों ने ख़ुद को फ़सल बीमा योजना से अलग कर लिया, देखने की बात है की इसमें प्रधानमंत्री का गृहराज्य गुजरात तथा बिहार भी शामिल हैं।

फ़सल बीमा में ख़रीफ़ की फ़सल में 2%, जबकि रबी की फ़सल में डेढ़ प्रतिशत प्रीमियम का भुगतान करना पड़ता हैं। ख़रीफ़ की फ़सलें जो जून-जुलाई में बोई जाती हैं- धान, मक्का, कपास, ज्वार, बाजरा, मूँग, मूंगफली, गन्ना, सोयाबीन, अरहर, तिल तथा रबी की फ़सलें जो अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती हैं - जिसमे गेंहू, जौ, जई, लाही, राई, सरसों, चना, मटर, मसूर, आलू , राजमा आदि आती हैं। इसमें से मात्र धान, मक्का, कपास, बाजरा, गेहूँ , चना, जौ, सरसों और सूरजमुखी को ही बीमा योग्य फ़सल की श्रेणी में रखा गया हैं। जबकि बहुत सारी फ़सलें बीमित फ़सलों की श्रेणी में नही आतीं। मेंथा और आलू की पिछली फ़सल पूरी तरह से बारिश की भेंट चढ़ चुकी है, इन फ़सलों का जोखिम किसान ख़ुद उठाने के लिये मजबूर हैं। मेंथा की फ़सल जो कि नग़दी फ़सल मानी जाती हैं का पूरे देश का 80% मेंथा बाराबंकी में उत्पादित होता है, मेंथा को न ही फ़सल का दर्जा प्राप्त है न बीमित-फ़सल की श्रेणी में आती है। कुल मिलाकर किसानों के प्रति सरकारों की उदासीनता और बीमा कंपनियों की संगठित लूट पर कोई नियंत्रण न होने की वजह से किसानो के हित के लिये बनी 'प्रधानमंत्री किसान फ़सल बीमा योजना' बे-मायने साबित हुई हैं क्यूंकि सरकार जो दावे कर रही हैं उसका असर बिल्कुल विपरीत है। भारत सरकार के पास तो 'देश में कितने किसान हैं' इसका कोई आंकड़ा ही नही हैं, एक प्रश्न के जवाब में 'किसानों की कुल संख्या कितनी है?', इसका जवाब कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के पास नही मिला, इसलिए किसानों की योजनाओ का जो ढोल पीटा जा रहा है वो ज़मीनी हक़ीक़त से बिल्कुल उलट है.

किसान क्रेडिट कार्ड जो किसानों को साहूकारों के चुंगल से बचाने के लिये था, लम्बी काग़ज़ी कार्यवाही, बैंक के अनगिनत चक्कर, (दलालों के माध्यम से बैंक अधिकारी अपना 10% कमीशन लेने के बाद तो लोन स्वीकृत करते हैं) इसमें सबसे बड़ा छल जो किसानों के साथ सरकार और बीमा कंपनियां मिलकर कर रही हैं वह है फ़सल बीमा योजना। बैंक से लोन लेने के साथ ही फ़सल का बीमा कर दिया जाता है, प्रीमियम भी काट लिया जाता है, लेकिन जब फ़सल की क्षतिपूर्ति की बात आती है तो बीमा कंपनियों को भुगतान न करना पड़े इसके लिये वह मोटी रिश्वत एस डी एम् को दे देती हैं। किसी भी में प्राकृतिक तबाही का विश्लेषण का अधिकार सिर्फ एस डी एम् को ही होता है, अगर वो माने की नुक़सान हुआ है तब ही नुक़सान हुआ है, उसी की रिपोर्ट के आधार पर बीमा कंपनिया किसानों का हक़ हड़प जाती हैं और फ़ायदे में रहती हैं। दूसरी तरफ फ़सल के अवशेष जलाने तक पर किसान पर मुक़दमा कर दिया जाता है सो अलग।

लघु या नाम मात्र भूमि वाले किसान जो बटाई जोत के किसान हैं उनकी पीड़ा असहनीय है, पहले बैंक या साहूकार से क़र्ज़ के लिये दर-दर भटकना, फिर बीज और रासायनिक उर्वरकों की काला-बाज़ारी के परिणाम स्वरूप लम्बी-लम्बी कतारों में यूरिया और डाया के लिये खड़े होना, ऊपर से पुलिस की लाठियां खाना, तब जा कर कहीं खेत के लिये उर्वरक मिलती है, फिर फ़सल की सिंचाई को लेकर प्रकृति के ऊपर आश्रित रहना, क्योंकि सिंचाई का माध्यम प्रकृति के अलावा निजी नलकूप हैं जो अब आसमान छू रहे महंगी क़ीमत के डीज़ल की वजह से घाटे का सौदा हैं। जिन किसानों की सींच नहर से है उनकी फ़सलें समय से नहर में पानी न आने कि वजह से असिंचित रहती हैं।

इसी के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में छुट्टा जानवरों की समस्या सबसे ज़्यादा है. किसान रात भर जग कर अपनी फ़सल की रखवाली करता है. और तमाम दुश्वारियों के बाद जब फ़सल तैयार होती हैं तब उसकी सही क़ीमत नहीं मिल पाती, क्योंकि मात्र 10 प्रतिशत ही जागरूक और बड़े जोत के सम्पन्न किसानो की ही फ़सल मण्डियों में पहुँच पाती हैं बाकी किसानों की फ़सल औने-पौने दामों पर बनिये और साहूकार ही ख़रीदते हैं.

कुल मिला कर व्यवस्था द्वारा किसानों की आय दोगुनी का जुमला हो, किसान सम्मान निधि हो, क्रेडिट कार्ड हो, क़र्ज़ माफ़ी हो, फ़सल बीमा योजना हो - ये सिर्फ़ राजनीति के छलावे और जुमले हैं। जब तक राजनीति से ऊपर उठ कर ईमानदार क़दम, किसानों के हित को नियत में रखकर न उठाये जाएं तब तक उत्तर प्रदेश के मजबूर किसानों के लिए कोई आस नहीं है.

(लक्ष्मी चंद्र अवस्थी उत्तर प्रदेश बाराबंकी के युवा जन-पत्रकार हैं, लेख में उन्होंने अपने जनपद और आसपास का आँखों देखा ब्यौरा दिया है.)


Shiv Kumar Mishra
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