Top
Begin typing your search...

कितने दिन के योगी?

कितने दिन के योगी?
X
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print

क्या सचमुच भाजपा के 250 विधायकों ने आलाकमान से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बदले जाने की लिखित शिकायत कर डाली है? क्या यह बह सच है कि नेतृत्व परिवर्तन की दशा में मुख्यमंत्री ने आलाकमान के समक्ष विधान सभा को भंग किये जाने की सिफारिश का ऐलान दे डाला है?यदि ऐसा है तो सचमुच यूपी भाजपा का संकट ज़बरदस्त तरीके से गहरा गया है। 'संघ' आलाकमान के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बावजूद स्थितियां नियंत्रण में आने की बजाय बिगड़ती जा रही हैं।

सप्ताह भर से लखनऊ और दिल्ली भाजपा के राजनीतिक गलियारों में यह यह ज़ोरदार चर्चा है कि लखनऊ पहुंचे 'संघ' के राष्ट्रीय उप प्रमुख दत्तात्रेय होसबोले के समक्ष जब विधायकों और मंत्रियों के एक बहुत बड़े समूह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ज़ोरदार तरीके से शिकायत की तो 'संघ' के वरिष्ठ और असरदार नेता ने उलट कर कहा कि इतनी ही नाराज़गी है तो लिख कर दीजिये। लिखित विरोध के इस सिलसिले को शुरूआती 4 दिन में इतनी हवा मिल गयी कि जब पार्टी के सांगठनिक मंत्री बीएल संतोष लखनऊ पहुंचे तो 216 विधायकों ने हस्ताक्षर करके मुख्यमंत्री विरोध का मजमून उन्हें सौंप दिया। श्री संतोष ने सभी से फिलहाल कोई टिपण्णी न करने और अलकमान के हाथों में मामले को छोड़ देने की सलाह दी। पार्टी सूत्र बताते हैं कि बीएल संतोष से हुई चर्चा में मुख्यमंत्री ने उनको हटाए जाने की स्थिति में विधानसभा भांग करने का संकेत दे डाला था जिसके चलते वह चौकन्ने थे और यही वजह है कि ट्यूटर पर उन्होंने कोविड प्रबंधन में योगी सरकार की कार्यक्षमताओं की तारीफ़ करते हुए राज्य सरकार के नेतृत्व में किसी प्रकार के बदलाव से इंकार किया था।

बताया जाता है कि मौजूदा सप्ताह के मध्यान्त तक बाग़ी विधायकों की यह संख्या 250 तक पहुँच गयी है। पार्टी के पास विधान सभा में 320 विधायक हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा तेज़ है कि अपने प्रबल विरोध पर मुख्यमंत्री ने आलाकमान को विधानसभा भंग करने की धमकी दे डाली है जिसके बचाव के लिए पार्टी के प्रदेश प्रभारी राधामोहन सिंह महामंत्री हड़बड़ाए से शनिवार की देर रात लखनऊ पहुंचे और अगले ही दिन राज्यपाल और विधानसभा स्पीकर से मिलकर पार्टी आलाकमान की ओर से दिए गए जिन अलग-अलग लिफ़ाफ़ों को उन दोनों को सौंपा, उससे यही ध्वनि निकलती है कि इसमें मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की 'धौंस' की रोकथाम से जुड़े एहतियात बरतने के दिशा-निर्देश थे।

असम, प० बंगाल, केरल और तमिलनाडु के हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान (हिन्दू-मुस्लिम बराबरी वाले उन विधान सभा क्षेत्रों में जहाँ योगी आदित्यनाथ की सभाएं आयोजित की गयी थीं) यहाँ घूमने वाले यूपी के कतिपय गुप्तचर कर्ताधर्ताओं ने यह सूंघा कि सर्वे कर्ताओं की एक बड़ी टीम बेहद शांति से कट्टर हिन्दू राजनेता के रूप में प्रख्यात किये जाने वाले योगी आदित्यनथ का असर मालूम करने की कोशिश में जुटी है। उनका यह आकलन चुनाव नतीजों के आने तक जारी रहा। तब वे यह न जान सके कि सर्वे कर्ताओं की ये टीमें आख़िर किसी मीडिया समूह की हैं याकि चुनावी नतीजों के प्रपंच से जुड़े पोल स्टार्स 'सेफोलॉजिस्टों' की हैं। आख़िरी दौर में उन्हें इतना ही मालूम चल सका कि ये टीमें दिल्ली से आयी हैं। बाद में जब इन तत्वों को केंद्रीय सरकार के कतिपय सूत्रों से यह जानकारी मिली कि ये टीमें पीएमओ के निर्देश पर रिपोर्ट इकठ्ठा कर रही थीं तो उनके पावों के नीचे से ज़मीन ही खिसक गयी। आखिर क्यों पीएमओ यह जानने का इच्छुक था कि गेरुआधारी मुख्यमंत्री का हिन्दू 'क्लान' सचमुच आज की तारीख में कितना असरदार है? इस खबर को जानने के बाद मुख्यमंत्री को यह भांपते कहाँ देर लगती कि पीएम उन्हें प्रदेश के मुखिया के बतौर नहीं देखना चाहते।

'संघ' के सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री ने चुनिंदा विधानसभा क्षेत्रों में किये गए उस सर्वे की रिपोर्ट से 'संघ' के आलाकमान को अवगत करवा दिया जो वहां योगी के 'बड़े असर' का संकेत नहीं देती थीं। बताया जाता है कि 'संघ' प्रधानमंत्री की इस रिपोर्ट से सहमत नहीं था। इसी के बाद दिल्ली में हुई 'आरएसएस' के नम्बर टू- दत्तात्रेय होसबोले के साथ प्रधानमंत्री, पार्टी अध्यक्ष और गृहमंत्री की मीटिंग और इसके तत्काल बाद ही लखनऊ में होसबोले का आगमन, प्रादेशिक मंत्रियों और काफी सारे विधायकों के साथ उनकी 'वन तो वन' मीटिंगें इससे आगे के परिदृश्य को साफ़ करती चली गयीं।

बताते हैं कि दिल्ली की बैठक में प्रधानमंत्री, पार्टी अध्यक्ष और गृहमंत्री ने योगी आदित्यनाथ शासन से त्राहिमाम करते पार्टी जन प्रतिनिधियों और आम जनता की तस्वीर को अच्छे से पेण्ट किया। प्रधानमंत्री ने खराब 'इमेज' वाली योगी सरकार की 'डेंटिंग-पेन्टिग' में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप की ज़रुरत हेतु अपने चहेते नौकरशाह अरविन्द कुमार शर्मा की ज़रुरत का भी बखान किया। होसबोले जब लखनऊ आये तो यहाँ भी उन्हें तीन दिन तक पार्टी जनों के बीच योगी आदित्यनाथ की 'कुरूप' और असन्तोष से भरी तस्वीर ही देखने को मिली। बताया जाता है कि योगी ने हसबोले से साफ़-साफ़ कहा कि कोरोना दुष्प्रबंधन के लिए मूलतः केंद्र सरकार की नीतियां दोषी हैं और कि लोगों का रोष मूलतः उन नीतियों की बदौलत है, राज्य सरकारें व्यर्थ में इनका शिकार बन रही हैं।

क्या बीजेपी आलाकमान योगी आदित्यनाथ के किसी प्रकार के दबाव में है? इस बात पर विचार करना दरअसल कड़क हिन्दू हृदय सम्राट दिखने वाले योगी को 'ओवर एस्टीमेट' किया जाना होगा। पार्टी आलाकमान भली-भांति सन 2007 में अपनी गिरफ़्तारी के बाद संसद में फूट-फूट कर रोने वाले भीरु प्रवित्ति योगी आदित्यनाथ को भूला नहीं है। तब सवाल यह है कि क्या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति है? क्यों 'संघ' और भाजपा उनकी उस प्रशासनिक प्रबंधन प्रणाली का बार-बार महिमामंडन कर रहे हैं जिनके विरुद्ध भाजपा के अनेक मंत्री और विधायक बग़ावत का झंडा लहरा रहे हैं बताया जाता है कि मौजूदा सप्ताह के मध्यान्त तक बाग़ी विधायकों की यह संख्या 250 तक पहुँच गयी है। पार्टी के पास विधान सभा में 320 विधायक हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा तेज़ है कि अपने प्रबल विरोध पर मुख्यमंत्री ने आलाकमान को विधानसभा भंग करने की धमकी दे डाली है जिसके बचाव के लिए पार्टी के प्रदेश प्रभारी राधामोहन सिंह महामंत्री हड़बड़ाए से शनिवार की देर रात लखनऊ पहुंचे ।

विगत सप्ताह जिस समय बीजेपी के सांगठनिक महासचिव बी एल संतोष लखनऊ में ट्यूटर के सामने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को क्लीन चिट देते हुए कोविड प्रबंधन में उनकी सरकार की प्रशासनिक प्रशंसा का ढिंढोरा पीट रहे थे, प्रदेश की भाजपा राजनीति के जानकार उस समय से ही यह मान कर चल रहे हैं कि योगी जी के 'पंख' काटे जाने की चुनाव पूर्व की 'संघ' की बारीक शैली की शुरुआत हो चुकी है।

बहरहाल, यूपी भाजपा गहरे संकट के भंवरजाल में फंसी है। देखना यह होगा कि क्या योगी को तत्काल रूप से बदला जायेगा या मुख्यमंत्री की कुर्सी गेरुए कपड़े से ढंकी रहेगी और प्रशासन के मामलों को उनके हाथ से लेकर अन्य जगहों पर बांट दिया जायेगा? सिर्फ़ इतना ही नहीं, संभावना यह भी है कि उनकी चाहत के बिना ही उनकी कैबिनेट का विस्तार इस तरह किया जायेगा कि जिन्हें वह नापसंद करते हैं उन्हें भी मज़बूत पद सौंपे जायें। भाजपा राजनीति के विकेन्द्रीकरण का चाहे जितना ढोल पीटे लेकिन भाजपा में नरेंद्र मोदी की नापसंदगी से कोई भी मुख्यमंत्री सुचारु प्रशासन नहीं चला सकता।

अनिल शुक्ल
Next Story
Share it