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जीते जी सबको नसीब नहीं वैक्सीन-अस्पताल... तो मरने पर शमशान... !!!

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वैक्सीन लगवाने के लिए उम्र सीमा 45 करने के कारण अभी भी ज्यादातर लोग वैक्सीन से वंचित हैं. इधर, देश के कई और हिस्सों की तरह लखनऊ में भी कोरोना विकराल हो चुका है. रोजाना तकरीबन चार हजार लोगों के कोरोना पॉजिटिव होने की खबरों के साथ - साथ डॉक्टरों, केमिस्ट समेत लगभग सभी क्षेत्र में काम कर रहे प्रफेशनल और बड़े पैमाने पर सामान्य लोगों की मौत की लगातार आती खबरें अब डराने लगी हैं.

खबरें इस तरह की भी आ रही हैं कि शमशान में चिता जलाने के लिए लकड़ियां अब नहीं मिल पा रही हैं या चिता जलाने की जगह तक लोगों को नहीं मिल पा रही है. खबरें ये भी आ ही चुकी हैं कि निजी हो या सरकारी हस्पताल, लगभग सभी के यहां बेड फुल हैं और कोरोना ही नहीं बल्कि किसी भी बीमारी के लिए कहीं किसी को बेड नहीं मिल पा रहा है.

कुल मिलाकर यह कि एक महामारी ने देश की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है. वैक्सीन के मामले में तो एक बार सरकार की यह दलील मानी जा सकती है कि 45 से कम उम्र के लोगों के लिए अभी उसके पास वैक्सीन भले ही उपलब्ध न हो लेकिन इस दिशा में प्रयास हो रहे हैं. लेकिन देश की स्वास्थ्य व्यवस्था इस महामारी के सामने इतनी दयनीय, असहाय और लचर क्यों महसूस हो रही है, इस पर कोई दलील नहीं मानी जा सकती.

आज इस महामारी को भारत में पांव पसारे हुए एक साल से ज्यादा हो चुका है , फिर भी सरकार लोगों के टेस्ट, भर्ती किए जाने आदि के इंतजाम इस तरह नहीं कर पाई कि गंभीर दशा में पहुंच चुके सभी लोगों को तो कम से कम अस्पताल में भर्ती किया जा सके.

मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में है तो लखनऊ में योगी सरकार अपने पहले कार्यकाल को खत्म करने की कगार पर है. शासन के लिए इतना समय मिलने के बावजूद दोनों सरकारें इस महामारी में आम लोगों की ऐसी दुर्दशा होने से रोक नहीं पाईं. चिंता तो इस बात की है कि यह महामारी इसी तरह बढ़ती रही तो स्वास्थ्य सुविधाओं की यह कमी कहीं जनता के बीच हाहाकार न मचा दे....

अश्वनी कुमार श्रीवास्त�
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