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मुसलमानो को मारने से कानून व्यवस्था नहीं सुधरेगी डीजीपी साहब

मुसलमानो को मारने से कानून व्यवस्था नहीं सुधरेगी डीजीपी साहब
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माजिद अली खां (राजनीतिक संपादक)

नोएडा में अथार्टी के अस्थायी कर्मचारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई जबकि नोएडा में बहुत काबिल कहे जाने वाले आईपीएस अधिकारी अजयपाल शर्मा ताबड़तोड़ एनकाउंटर में लगे हुए हैं। इसके अलावा सहारनपुर से लेकर उत्तर प्रदेश के आखिरी ज़िले तक पुलिस लोगों को बड़ा अपराधी बता कर मारने में लगी हुई है। कानून व्यवस्था को मजबूत करने तथा योगी सरकार से तमगा हासिल करने के लिए पुलिस अधिकारी एनकाउंटर करने में मशगूल हैं। लेकिन अपराध बिल्कुल भी नहीं रुक रहे हैं बल्कि हर तरह के जघन्य अपराध बढ़ रहे हैं। इसकी खास वजह यह है कि पुलिस विभाग का हर कर्मी सिपाही से लेकर आईपीएस अधिकारियों तक को सांप्रदायिकता का रोग लगा हुआ है। किस किस का रोना रोए पूरी व्यवस्था ही सांप्रदायिकता का शिकार हो चुकी है।

पुलिस विभाग के लोगों के लिए मुसलमान एक आसान टारगेट है जिसे मारकर ये लगता है कि कोई जवाब तलबी नहीं होगी क्योंकि बेसहारा मुसलमानो के गूंगे बहरे और अंधे नेताओं के पास इतना समय नहीं कि वह ऐसे मामलों में हंगामा कर सकें। इसके अलावा मुसलमानो को मारकर हिंदुत्व का सहारा लिया जाता है जिसमें मामला उछल नहीं पाता और पुलिस की सांप्रदायिक भीड़ का समर्थन मिल जाता है जैसे अलीगढ़ एनकाउंटर में देखने को मिला।

ग्रेटर नोएडा में ऑपरेशन क्लीन का असर नहीं दिख रहा है। लगातार हो रहे इनकाउंटर के बावजूद भी बदमाशों के हौसले बुलंद बने हुए। बैखौफ बदमाशों ने प्राधिकरण के सुपरवाइजर को गोलीयो से भून दिया। प्राधिकरण के सुपरवाइजर की मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा। मामले को लेकर पुलिस जांच पड़ताल करने मे जुटी। यह घटना दादरी थाना क्षेत्र के लुहारली गांव के पास की है।

इस तरह पुलिस मुसलमान अपराधियों को मारने या विकलांग बनाने को कानून व्यवस्था मजबूत होने की गारंटी के तौर पर देखती है जिसका नतीजा यह होता है कि असली अपराधी और माफिया खुलेआम अपराध को अंजाम दे रहे हैं। पुलिस विभाग में आईपीएस अधिकारी का रुतबा होता है जबकि सच्चाई यह है कि पुलिस विभाग सिर्फ मुखबिरों के आधार पर चल रहा है जो अक्सर वह लोग होते हैं जो खुद अपराध में लिप्त रहते हैं। मुखबिर किसी के बारे में जो रिपोर्ट देता है उसे सिपाही और दरोगा जी बिल्कुल सच्चा मानने लगते हैं और वही रिपोर्ट आईपीएस अधिकारियों को दी जाती है जिसे आईपीएस अधिकारी ईशवाणी समझकर सही मान लेते हैं जिससे समाज में ज़ुल्म शुरू हो जाता है।


तेज़ तर्रार कहे जाने वाले पुलिस अधिकारी नीचे के लोगों से गुमराह हो जाते जो बड़े अफसोस की बात होती है। आईपीएस सेवा ऐसी बातों से सवालों के घेरे में आ जाती है और बार बार सवाल जहन में आता है कि आखिर जब मुखबिरों से ही विभाग चलवाना है तो फिर बड़े बड़े अधिकारियों को क्यों नौकरी दी जाए। आईपीएस अधिकारियों को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। प्रदेश पुलिस मुखिया को पुलिस द्वारा फर्जी मारे जाने वाले लोगों के बारे में सोचना चाहिए और असली अपराधी जिन्हें खुद अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त रहता है कार्रवाई के घेरे में लाना चाहिए।

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