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एक तरफ आजादी का अमृत महोत्सव तो दूसरी तरफ आत्महत्या को मजबूर अनुदेशक

देश भर में आजादी का अमृत महोत्सव धूमधाम से मनाया गया। चारों तरफ़ अमृत महोत्सव की ही गूंज सुनाई दे रही थी। आजादी के 75 वीं वर्षगांठ पर मनाए गए इस उत्सव की तैयारी पिछले एक साल से चल रही थी, जिसमें सरकार के करोड़ों रुपए खर्च हुए। एक तरफ जहां सरकार किसी उत्सव के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही थी तो वहीं दूसरी ओर एक ऐसा तबका भी था जो भूख से अपनी जान दे रहा था। हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के जूनियर हाईस्कूल में पढ़ाने वाले उन अनुदेशको की जो मात्र 9 हजार के अल्प मानदेय पर अपना गुजारा कर रहा है, भूखे पेट सो रहा है,अपना और अपने परिवार की जीविका चलाने के लिए रिक्शा चला रहा है, ऑटो चला रहा है, मनरेगा में मजदूरी कर रहा है, पकौड़े का ठेला लगा रहा है। हम किस आजादी की बात करते हैं। ऐसी आजादी का क्या मतलब जहां दो जून की रोटी भी मुश्किल से मिलती हो। एक ही स्थान पर कार्य करने वाले और एक ही तरह का कार्य करने वाले लोगों के बीच इतनी असमानता कि एक को 60 हजार तनख्वाह तो दूसरे को मात्र 9 हजार, यह कहां का न्याय है ? क्या हमारा देश इसी तरह के न्याय के लिए जाना जाता है,पहचाना जाता है। वसुधैव कुटुंबकम् और समानता की बात करने वाली सरकारों से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी।
"भूखे भजन न होई गोपाला" अर्थात भूखे पेट भजन नहीं हो सकता। लेकिन उत्तर प्रदेश के अनुदेशक इस दोहे को भी गलत साबित कर दिए वे भूखे भी हैं और मन लगाकर अपना काम भी कर रहे हैं। प्रदेश के लाखों नौनिहालों को शिक्षित करने का जिम्मा जो उसने उठा रखा है उसको बखूबी निभा भी रहा है।
जानिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एपी सिंह इन अनुदेशकों के बारे में क्या कहते हैं
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एपी सिंह इन अनुदेशकों के बारे में बड़ी मार्मिक बात कहते हैं, वे कहते हैं कि उत्तर प्रदेश का अनुदेशक एक आज्ञाकारी शिक्षक की तरह आज्ञाकारी नागरिक भी है जो न्यायालय की तरफ टकटकी लगाकर न्याय की आस में बैठा है। अनुदेशक चाहता है कि जो न्यायालय उसे 17 हजार रूपए का आदेश किया अब उस आदेश को सरकार मान ले और अनुदेशको का 17 हजार रूपए मानदेय दे दे। सरकार जो इतना समय अनुदेशकों के खिलाफ केस लड़ने में लगा रही है वही समय आतंकवादियों के विरुद्ध करती, कानून-व्यवस्था सुधारने में करती, सबका साथ सबका विकास करने में करती तो अच्छा रहता। लेकिन सरकार तो अपने आदेश के विरुद्ध ही कानून की लड़ाई लड़ रही है । सरकार को चाहिए कि कम से कम इन अनुदेशकों को इतना तो दे दें जिससे कि वो अपना भरण पोषण कर सकें अपना जीवन चला सकें। एक तरफ हम आजादी के 75 साल पूरे होने पर अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर अनुदेशक जहर की गोलियां खा रहा है। जिंदगी कितनी कठिनाई से मिलती है लेकिन अनुदेशक जिंदगी खत्म कर रहा है। अनुदेशक शिक्षा से जुड़ा व्यक्ति है वो अपराध कर नहीं सकता, वो ऐसा नहीं कर सकता कि दिन में पढ़ाए और रात में डाका डाले। वो तो अपने हक की लड़ाई कानूनी तरीके से लड़ रहा है। अब मोदी जी को ,योगी जी को शिक्षा मंत्री जी को चाहिए की वे अनुदेशकों की करुण पुकार सुन लें और उनका घोषित मानदेय उन्हें दे दें।
Satyapal Singh Kaushik
न्यूज लेखन, कंटेंट लेखन, स्क्रिप्ट और आर्टिकल लेखन में लंबा अनुभव है। दैनिक जागरण, अवधनामा, तरुणमित्र जैसे देश के कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में लेख प्रकाशित होते रहते हैं। वर्तमान में Special Coverage News में बतौर कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हूं।




