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Prostitution: उत्तर प्रदेश का एक ऐसा गांव जहां पूरा गांव करता है जिस्मफरोशी का धंधा, जिस्मफरोशी है आय का एकमात्र साधन

जीविका चलाने के लिए आदमी क्या-क्या नहीं करता। कहीं कड़ी धूप में पसीना बहाता है तो कहीं मेहनत, मजदूरी करके पेट पालता है। लेकिन पेट पालने के लिए अगर जिस्मफरोशी का धंधा करना पड़े तो वह फिर जुर्म हो जाता है।
आज हम आपको एक ऐसे गांव के बारे में बताएंगे जहां पूरा का पूरा गांव जिस्मफरोशी का धंधा करता है और अपनी बहन, बेटियों के जिस्म का बोली लगाता है। यह गांव है उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर हरदोई जिले में और इस गांव का नाम है 'नटपुरवा'
'नट' पहले भीख मांगते थे बाद में देह व्यापार करने लगे
'नट' नामक जाति के बसने के कारण इस गांव का नाम नटपुरवा पड़ा। इस गांव में दशकों से देह व्यापार का धंधा चला आ रहा है। लेकिन पहले से यहां देह व्यापार का धंधा नहीं था। पहले यहां रहने वाले नटों का टोला घूम-घूमकर भीख मांगता था। वेश्यावृत्ति जैसी बात नहीं थी इनमें। यहां आकर जब उनका टोला रुका, तो यहां के जमींदार ने उन्हें गांव के आखिरी छोर पर बसने की इजाज़त दे दी। पहले तो भीख मांगकर गुजारा करते थे। बाद में लोगों के घर नाचने-गाने भी जाने लगे। लोग पैसा देकर अपने आयोजनों में बुलाने लगे। इसी दौरान यहां यह सब कुछ शुरू हो गया और लड़कियां देह व्यापार करने लगीं।
पत्नी और बहुओं से नहीं करवाया जाता देह व्यापार
नटपुरवा टोले की एक ख़ास परंपरा है कि यहां घर की बेटियों को ही धंधे में उतारा जाता है। ब्याह कर लाई गई पत्नी या बहुओं को जिस्मफरोशी की इजाज़त नहीं है, वे केवल अपने पतियों के साथ ही रहती हैं। वहीं, घर के पुरुषों का एक काम है कि वे अपनी बेटियों या बहनों के लिए ग्राहक तलाश कर लाएं।
नटपुरवा में चारों तरफ दूर कुछ लोग खड़े मिल जाएंगे। ये झुंड में नहीं होते, लेकिन अपनी पैनी नज़र से देख लेते हैं कि सामने वाला व्यक्ति आसपास के इलाक़े का तो नहीं। आसपास के इलाके़ वाले तो ख़ुद अपनी मर्जी से आते-जाते रहते हैं, लेकिन बाहर वालों पर इनकी पूरी नज़र होती है। जैसे ही इन्हें अंदाज़ा हो जाता है कि ये अपने घर के लिए ग्राहक के तौर पर उस व्यक्ति को ले जा सकते हैं, तो वे करीब आकर धीरे से बोलते हैं कि, ' यहां सब इंतज़ाम है, आप चलेंगे क्या?' धंधा करने वाली लड़की की उम्र बताकर ये ग्राहकों को रिझाते हैं।
ज्यादातर इस टोले के लड़के या लड़कियों की शादी गांव में ही दूसरे परिवारों में हो जाया करती है। यहां के लोग बताते हैं कि, जब तक लड़की जवान रहती है तब तक ही हम उसके लिए ग्राहक तलासते हैं। जब वह थोड़ी उम्र दराज हो जाती है तब हम उसकी शादी कर देते हैं और फिर उसको इस धंधे से मुक्ति मिल जाती है।
केवल ऊंची जाति को ही जिस्म सौंपती हैं
यहां धंधा करने वाली लड़की के बच्चे की पहचान मां के नाम से होती। हालांकि बच्चे के बाप का नाम रजिस्टर में लिखा जाता है। भले ही जिस्मफरोशी इस गांव का पेशा है, लेकिन इसके भी कुछ अपने नियम हैं। यहां लड़कियां अपना जिस्म केवल उन्हीं को बेचती हैं, जो ऊंची जाति के हैं। ओबीसी, एससी या एसटी के लोगों को ग्राहक के तौर पर लाने की मनाही है। अगर किसी परिवार ने प्रतिबंधित वर्ग के किसी शख़्स को सेवाएं दीं तो उस परिवार को समुदाय से बाहर करने का फरमान सुना दिया जाता है।
इस गांव में आज भी जारी है जिस्मफरोशी
इस गांव में जिस्मफरोशी अब भी जारी है जिसकी वजह है इसे मिला संरक्षण। पुलिस, प्रशासन और राजनीतिक संरक्षण हासिल है इन लोगों को। एक समय पुलिस इनका मुखबिर के तौर पर भी इस्तेमाल करती थी। जिसकी वजह से इनकी मनबढ़ई शुरू हुई, जो बाद में गुंडई में बदल गई। कई तो यहां हिस्ट्रीशीटर हैं। कुछ उम्रकैद की सजा काटकर भी आए हैं। हालांकि अभी भी यहां यह धंधा खुलेआम जारी है।
Satyapal Singh Kaushik
न्यूज लेखन, कंटेंट लेखन, स्क्रिप्ट और आर्टिकल लेखन में लंबा अनुभव है। दैनिक जागरण, अवधनामा, तरुणमित्र जैसे देश के कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में लेख प्रकाशित होते रहते हैं। वर्तमान में Special Coverage News में बतौर कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हूं।




