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सुधार की राह से वापसी: एसआईआर ने दशकों में हुई प्रगति पर फेरा पानी

एक तरफ सत्ताधारी पार्टी पूरे गाजे-बाजे के साथ देश में “नारी शक्ति” के नाम पर बड़े-बड़े दावे कर रही है, महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है, लेकिन इस बीच क्या आज दुनिया इस बात को भी दर्ज कर पा रही है कि उत्तर प्रदेश में एसआईआर के बाद जो हुआ वह अभूतपूर्व, ऐतिहासिक और विनाशकारी है।
एसआईआर के बाद उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में सुधार के नाम पर 2 करोड़ से ज्यादा नाम काट दिए हैं। 10 अप्रैल को जारी हुई फ़ाइनल वोटर लिस्ट में कुल वोटर की संख्या घटकर 13.39 करोड़ रह गई है। इससे प्रदेश की वोटर लिस्ट का जेंडर रेशियो अब तक के ऐतिहासिक तौर पर सबसे निचले स्तर 834 पर आ गया। एसआईआर से पहले यूपी की वोटर लिस्ट का जेंडर रेशियो 876 था, जो अब 42 अंक गिर गया है (जेंडर रेशियो = हर 1000 पुरुषों पर महिला वोटर की संख्या)। एसआईआर से पहले प्रदेश की वोटर लिस्ट में 1000 पुरुषों पर 876 महिलाएं थीं, जो अब घटकार सिर्फ 834 महिलाएं रह गई हैं। इस पर भविष्य में किताबें लिखीं जाएंगी कि ऐसा भी चुनाव आयोग हमारे देश के इतिहास में हुआ, जिसकी बदौलत वोटर लिस्ट में महिलाओं की भागीदारी में दशकों में हुआ सुधार एक ही झटके में पलट गया।
अगर उत्तर प्रदेश की वोटर लिस्ट के आंकड़ों को ध्यान से देखें, तो तस्वीर और साफ हो जाती है। एसआईआर से पहले राज्य में करीब 7.21 करोड़ महिला मतदाता थीं, जो अब घटकर लगभग 6.09 करोड़ रह गई हैं। गहन पुनरीक्षण की इस प्रक्रिया के दौरान कुल मिलाकर लगभग 13.3% मतदाता कम हुए, लेकिन इसका असर पुरुषों की अपेक्षा महिला वोटर्स पर ज्यादा पड़ा। महिला वोटर्स की संख्या में करीब 15.5% की कमी आई, जबकि पुरुष वोटर्स में यह गिरावट लगभग 11.3% रही।
एसआईआर से पहले पुरुष वोटर्स की संख्या 8.23 करोड़ थी, लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान 93 लाख पुरुषों के नाम कट जाने के बाद उनकी संख्या अब वोटर लिस्ट में करीब 7.3 करोड़ रह गई है। इसी दौरान महिलाओं में से 1.12 करोड़ महिला वोटर्स हटा दी गईं, जिससे महिला मतदाताओं की संख्या केवल 6.09 करोड़ रह गई। यानी पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के 19 लाख ज्यादा नाम कटे।
जेंडर रेशियो में सुधार की दिशा पलटी
महिलाओं की हिस्सेदारी वोटर लिस्ट में पहले 46.7% थी, जो SIR के बाद अब 1.2% गिरकर 45.5% हो गई है। जिससे प्रदेश की वोटर लिस्ट का जेंडर संतुलन गड़बड़ा गया है। यूपी में अगर एसआईआर से पहले वाला जेंडर रेशियो 876 बना रहता, तो फाइनल वोटर लिस्ट में करीब 31 लाख ज्यादा महिला मतदाता होनी चाहिए थीं। यानी वोटर लिस्ट में 6.40 करोड़ महिलाएं दर्ज होनी चाहिए थीं। ऐसे में सवाल उठता है कि पहले से वोटर लिस्ट में दर्ज ये महिलाएं कहां चली गईं ? लेकिन इससे भी आगे, अगर जेंडर रेशियो राज्य की वयस्क आबादी के अनुमान—यानी करीब 941—के आसपास पहुंचता, तो इसे एक आदर्श स्थिति मानी जाती। वोटर लिस्ट में सुधार की दिशा सही होती, तो लक्ष्य इसी के करीब पहुंचने का होना चाहिए था।
अब अगर एसआईआर के बाद जारी फाइनल लिस्ट को देखें और पुरुषों की मौजूदा संख्या को आधार मानते हुए 941 के जेंडर रेशियो से तुलना करें, तो महिला वोटर्स की संख्या करीब 6.88 करोड़ होनी चाहिए थी। जबकि वास्तविक संख्या इससे लगभग 78 लाख कम है। वहीं, पुरानी वोटर लिस्ट (15.44 करोड़) को आधार मानकर जेंडर रेशियो 941 पर महिलाओं की संख्या 7.49 करोड़ होनी चाहिए थी। जोकि इससे महिलाओं की संख्या लगभग 1.39 करोड़ कम दर्ज हुई है।
इस गिरावट को यह कहकर समझाना कि – ‘महिलाएं घर छोड़कर चली जाती हैं इसलिए जेंडर अनुपात गिरा है’ – तथ्यों के बिल्कुल खिलाफ होगा। रिपोर्ट ऑफ द टेक्निकल ग्रुप ऑफ पॉपुलेशन प्रोजेक्शन 2020, जिससे यह वयस्क जेंडर अनुपात का 941 का आंकड़ा मिला है, उसमें अगर कोई राज्य से शिफ्ट कर गया है तो उसका भी पूरा हिसाब लगाया गया है।
ऐसे में सवाल पैदा होता है कि आखिर एसआईआर के बाद ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाई गईं 31 लाख महिलाएं आखिर गईं कहां और क्यों ? इस सवाल का जवाब एसआईआर की उसी प्रक्रिया में छुपा है, जो वोटर बने रहने की पूरी जिम्मेदारी नागरिकों पर डालकर उसे जटिल दस्तावेजी शर्तों में उलझा देती है, जिससे मतदाता स्वतः ही बाहर हो जाते हैं।
एसआईआर की संरचना में ही कमी
एक बात जो बिहार, बंगाल समेत (असम को छोड़कर) राज्यों में हुए एसआईआर के बात तय हो गई है कि एसआईआर महज वोटर लिस्ट का संशोधन नहीं है। यह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की संरचना को पूरी तरह से बदलने की प्रक्रिया है। हां, यह सच है कि मतदाता सूचियों में समस्याएं हैं। यह भी सही है कि नियमित उपाय काफी नहीं हैं। सालाना संक्षिप्त संशोधन भी ठीक से काम नहीं करता। बड़ी संख्या में नाम जो हटाए जाने चाहिए, वे नहीं हटाए जाते। बहुत से नए नाम जिन्हें जुड़ना चाहिए, वे छूट जाते हैं।
इसलिए हां, अगर कोई कहे कि “ठीक है, हमें एक बार गहन संशोधन करना चाहिए जिसमें कोई घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन करे”, तो यह अच्छी बात है। बिल्कुल अच्छी बात है। लेकिन समस्या यह है कि एसआईआर वैसा है ही नहीं। इसमें दो बड़ी खामियां हैं। पहली यह है, इतिहास में पहली बार मतदाता को कहा जा रहा है — “यह रहा फॉर्म, इसे भरिए। अगर आपने सही से नहीं भरा, तो आप स्वतः ही वोटर लिस्ट से बाहर हो जाएंगे।” यह पहले कभी नहीं हुआ।
इतिहास में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां अधिकार सीधे नहीं छीने गए, बल्कि प्रक्रियाओं को जटिल बनाकर सीमित कर दिए गया। रंगभेद के दौरान दक्षिण अफ्रीका में “पास कानून” (अनुमति-पत्र कानून) के तहत अश्वेत नागरिकों को हर समय अपनी पहचान और अनुमति से जुड़े दस्तावेज़ साथ रखने पड़ते थे। इन दस्तावेज़ों के बिना वे न तो कहीं आ-जा सकते थे, न ही काम कर सकते थे। अश्वेत लोगों को हर समय एक पास (कागज़/आईडी) साथ रखना पड़ता था। उस पास में लिखा होता था कि, वे कौन हैं, कहाँ काम करते हैं, किस इलाके में जा सकते हैं। अगर किसी के पास ये कागज़ नहीं होता, उसे गिरफ्तार किया जा सकता था। शहर में रहने या घूमने की इजाज़त नहीं मिलती थी।
इसी तरह जिम क्रो लॉज़ के समय दक्षिण अमेरिका में अश्वेत लोगों को सीधे वोट देने से नहीं रोका गया, बल्कि “लिटरेसी टेस्ट” और“पोल टैक्स” लागू किए गए। जिन्होंने लाखों लोगों को मतदान के अधिकार से बाहर कर दिया। इनका मकसद था काले (अफ्रीकी-अमेरिकी) और गोरे लोगों को अलग रखना और इस अलगाव को कानून का रूप देना।
धीरे-धीरे यह सिर्फ अलगाव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक पूरी व्यवस्था बन गई जिसमें काले लोगों को हर स्तर पर पीछे रखा गया। खासकर वोट के अधिकार में—उन्हें सीधे मना नहीं किया गया, बल्कि ऐसे नियम बनाए गए जैसे कठिन फॉर्म, लिटरेसी टेस्ट और पोल टैक्स। ये सब कानून इस तरह बनाए गए थे कि आम आदमी, खासकर गरीब और अशिक्षित लोग, उन्हें पूरा ही न कर पाएं। नतीजा यह हुआ कि लाखों लोग बिना सीधे “मना” किए ही वोट देने के अधिकार से बाहर हो गए।
अब यह इतना अहम क्यों है? इसलिए क्योंकि वोटर लिस्ट में नाम बने रहने की ज़िम्मेदारी पहली बार मतदाता पर डाली जा रही है। और यह इतना बड़ा फैसला क्यों है? क्योंकि पूरी दुनिया में दो तरह की प्रणालियाँ हैं: एक है राज्य द्वारा शुरू की गई रजिस्ट्रेशन प्रणाली , जिससे लगभग पूरी आबादी (95–99%) वोटर लिस्ट में दर्ज हो जाती है। भारत में यह 99% तक पहुँच चुकी थी।
दूसरी है व्यक्ति-प्रेरित रजिस्ट्रेशन प्रणाली , जैसे अमेरिका में। वहाँ वोटर रजिस्ट्रेशन 70–75% पर ही रुक जाता है। पिछले चुनाव में यह सिर्फ़ 74% था। तो यह पहला बड़ा और अभूतपूर्व बदलाव है, अवैध भी। यह पहली बार हर किसी से कहा जा रहा है “मुझे नहीं पता कि आप भारतीय नागरिक हैं या नहीं। जब तक आप प्रमाणपत्र नहीं दिखाते, मैं आपको वोटर नहीं मानूँगा।”
यह चुनाव आयोग ने पहले कभी नहीं किया। 1980 के दशक में एक बार कोशिश की थी। सुप्रीम कोर्ट ने उस पर सख़्ती से रोक लगाई थी। वही मशहूर लालन बाबुआन हुसैन केस था। तब से लेकर अब तक चुनाव आयोग ने हमेशा कहा:"नागरिकता तय करना हमारा काम नहीं है।" इस पर चुनाव आयोग ने विस्तृत दिशानिर्देश भी जारी किए थे कि इस काम से दूर रहना है।
लेकिन अब पहली बार बिना किसी क़ानून बदले, बिना किसी नियम बदले, बिना सुप्रीम कोर्ट के अपना मत बदले, चुनाव आयोग ने एकतरफ़ा अपना रुख़ बदल लिया है। और कह दिया है कि हर किसी को दस्तावेज़ पेश करने होंगे। यही वो चीज़ें हैं जो एसआईआर को इतना ‘स्पेशल’ ही नहीं बल्कि खतरनाक और असंवैधानिक बना देती हैं। और यही कारण है कि एसआईआर कोई समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि खुद समस्या है।
~ प्रत्यक्ष मिश्रा
(लेखक पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं)




