दिल्ली हिंसा पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख, 5 घंटे में 3 बार करनी पड़ी सुनवाई, जानें सुनवाई की पूरी डिटेल

नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के कई इलाकों में बीते तीन दिनों से जारी हिंसा में अब तक 22 लोगों की जान चली गई है, जिसमें एक पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। वहीं रविवार से जारी हिंसा में अब तक करीब 250 से अधिक लोग घायल हो गए हैं,

Update: 2020-02-26 12:44 GMT

नई दिल्ली। नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन करने वाले और विरोध करने वालों ने नॉर्थ ईस्ट दिल्ली को हिंसा की आग में झोंक दिया। नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के कई इलाकों में बीते तीन दिनों से जारी हिंसा में अब तक 22 लोगों की जान चली गई है, जिसमें एक पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। वहीं रविवार से जारी हिंसा में अब तक करीब 250 से अधिक लोग घायल हो गए हैं, जिनमें करीब 56 से अधिक पुलिस के जवान हैं। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर नॉर्थ ईस्ट दिल्ली यानी उत्तर पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद, मौजपुर, बाबरपुर और चांदबाग में रविवार, सोमवार और मंगलवार को लगातार हिंसा हुई, जिसकी वजह से प्रशासन ने धारा 144 लगा दिया है

बतादें कि संशोधित नागरिकता कानून(सीएए) को लेकर उत्तरपूर्वी दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में भड़की हिंसा में शामिल लोगों पर प्राथमिकी दर्ज करने और उन्हें गिरफ्तार करने की मांग करने वाली एक याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय में सुनवाई हुुई। न्यायालय ने कहा कि अगर भड़काऊ भाषण देने पर एफआईआर दर्ज नहीं होगी तो ऐसे भाषण बढ़ते ही जाएंगे। कोर्ट ने पूछा, 15 दिसंबर से 26 फरवरी आ गई और अभी तक कोई एफआईआर दर्ज क्यों नहीं हुई है।

कोर्ट ने सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वो दिल्ली पुलिस कमीशनर को हमारी नाराजगी के बारे में बता दें। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूछा कि पुलिस को आखिर कितनी मौतों और नुकसान का इंतजार है। जनता की सुरक्षा पुलिस की ड्यूटी है। अदालत में इस मामले पर पांच घंटे के अंदर तीन बार सुनवाई हुई।

पहली सुनवाई में क्या हुआ

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि पुलिस को हिंसा के मामलों में अदालत के निर्देश की जरूरत नहीं होती है और उसे स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत ने कहा कि यह बेहद जरूरी है। मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोनसाल्व्जि ने न्यायमूर्ति मुरलीधर की पीठ से इस याचिका पर तत्काल सुनवाई की मांग की।

दूसरी सुनवाई में क्या हुआ

मामले की सुनवाई दोबारा शुरू हुई तो जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि परिस्थिति बहुत ही खराब है। हम सबने वो वीडियो देखे हैं जिसमें कई नेता घृणास्पद भाषण दे रहे हैं। यह सभी न्यूज चैनलों पर देखा गया है। इसके बाद अदालत ने सभी वकीलों और डीसीपी देव और सॉलिसीटर तुषार मेहता की उपस्थिति में भाजपा नेता कपिल मिश्रा का वो वीडियो चलाया। इसके बाद जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि हम पुलिस के रवैये से हैरान हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने एसजी को भी निर्देश दिया कि वो दिल्ली पुलिस कमिश्नर को सलाह दें कि भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करें। मामले की सुनवाई को 2.30 बजे तक के लिए टाल दिया गया है।

अदालत ने पुलिस से बुधवार दोपहर 12:30 बजे तक हिंसा को लेकर जवाब देने को कहा था। न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर और न्यायमूर्ति तलवंत सिंह की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि तथ्यों से वाकिफ वरिष्ठ स्तर का एक पुलिस अधिकारी 12:30 बजे तक उनके समक्ष पेश हो।

तीसरी सुनवाई में क्या हुआ

तीसरी बार जब अदालत की सुनवाई शुरू हुई तो सॉलिसीटर जनरल(एसजी) ने अदालत को बताया कि जहां तक दूसरे और तीसरे क्लिप की बात है तो वह उनका अब भी परीक्षण चल रहा है। हमें सभी तरफ से सबूत मिले हैं। एसजी ने आगे कहा कि जहां तक कपिल मिश्रा के क्लिप की बात है तो इसमें जो सामग्री है उसका हिंसा की घटनाओं से सीधा कोई संबंध नहीं है।

एसजी ने आगे कहा कि जहां तक बात एफआईआर की है तो यह गंभीर मामला है और हमें इसके लिए समय चाहिए ताकि सभी सामग्रियों को देखा जा सके। हमें समझना होगा कि यह संवेदनशील मामला है। इस पर दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने कहा कि कानून के अनुसार पुलिस अधिकारियों को मुझे रिपोर्ट करना चाहिए। हालांकि ऐसा कुछ नहीं हुआ।

राहुल मेहरा ने आगे कहा कि मैंने कई बार पुलिस कमिश्नर को कोर्टरूम में कहा है कि मैं अदालत के एक अधिकारी की तरह बर्ताव करूंगा। पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट को तभी रिकॉर्ड में रखा जा सकता है जब यह मेरे दफ्तर से भेजा जाए।

सरकारी वकील ने आगे कहा कि मुझे कोई कारण नहीं दिखाई देता एफआईआर रजिस्टर न होने का। यह हर किसी के खिलाफ दायर हो सकता है। अगर वह गलत साबित हों तो उसे रद्द भी किया जा सकता है। एसजी ने अदालत में एक आवेदन डाला कि भारत सरकार को भी इस याचिका में अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए।

हर्ष मंदेर के वकील कोलिन गोंजालविस ने तब अदालत में कहा कि यह अदालत में आए सबसे गंभीर केसों में से एक है। यह हैरत वाली बात है कि राज्य कह रहा है कि उसे एफआईआर रजिस्टर करने के लिए समय चाहिए। वकील कोलिन ने आगे कहा कि वो सिर्फ भाषण देते हैं और उनसे संबंद्ध लोग अन्य लोगों को हमला करते हुए नारे लगाते हैं 'गोली मारो गद्दारों को'।

कोलिन ने कहा कि यह अनुराग ठाकुर की स्पीच है जिसने ये किया। अनुराग ठाकुर एक सार्वजनिक चेहरा हैं, उनके भाषण को हर जगह फैलाया गया। यह वही नारा है जिसने 18 लोगों की जान ले ली। इसके बाद कोलिन ने अनुराग ठाकुर की क्लिप भी कोर्ट में दिखाई। कोलिन ने अदालत में अभय वर्मा और कपिल मिश्रा के भाषणों की क्लिप भी दिखाई और कहा कि यह लोग अपने समर्थकों को हथियार उठाने के लिए उकसा रहे हैं।

इस पर जस्टिस मुरलीधर ने अदालत में मौजूद पुलिस अधिकारी को भी वो वीडियो दिखाया।कोलिन ने प्रवेश वर्मा का भाषण भी अदालत में दिखाया। उन्होंने बताया कि यह चार क्लिप बड़े पैमाने पर फैलाई गई थी। यह लोग सांसद और विधायक हैं। कोलिन ने आगे कहा कि यह तथ्य है कि यह सभी सरकारी अमले में काफी सीनियर पोजिशन पर हैं, यह दिखाता है कि यह नैरेटिव सरकारी नीति के अनुसार ही चलाया गया है। यह लोग अपने गैंग द्वारा लोगों के मारे जाने का के आरोपी हैं। इसके बाद कोलिन ने आईपीसी की उन धाराओं को अदालत में पढ़ा जिसके अनुसार कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा पर कार्रवाई चाहते हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में बेहद तल्‍ख टिप्‍पणी की. सुनवाई के दौरान जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि दिल्‍ली हाईकोर्ट के रहते हुए 1984 के दंगे की घटना को दोहराने नहीं दिया जाएगा. कोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्‍य के उच्‍च पदस्‍थ पदाधिकारियों को हिंसा के पीड़ितों और उनके परिवारों से मुलाकात करनी चाहिए. मामले की सुनवाई के दौरान जज ने कहा कि अब समय आ गया है जब आम नागरिकों को भी 'Z श्रेणी' जैसी सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए.

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