सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने हाल ही में कई मामलों की सुनवाई स्वयं की

सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने हाल ही में कई मामलों की सुनवाई स्वयं की

Update: 2023-08-02 11:36 GMT

देश के सर्वोच्च न्यायालय में रोजाना सैकड़ों मामलें सुनवाई के लिए याचिका के रूप में दाखिल किए जातें हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट के अलग अलग जजों की बेंच में हजारों मामलें पहले से ही पेंडिंग पड़े रहतें हैं। लेकिन हाल के दिनों में सीजेआई डीवाई चंद्रचुड़ ने कुछ चुनिंदा मामलों को अपनी प्राथमिकता में रखते हुए उनकी सुनवाई की और अपना फैसला भी दिया। हालांकि यह सुनकर अच्छा भी लगता है कि, कुछ गंभीर याचिकाओं और महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई सीजेआई स्वयं कर रहें हैं। लेकिन यहां पर एक सवाल यह भी उठना स्वाभाविक है कि, आखिरकार सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ज्यादातर उन्ही मुद्दों को लेकर क्यों सुनवाई करतें हैं, जो केंद्र सरकार यानि सत्ता पक्ष और विपक्ष को प्रभावित करने वाले मुददें होते हैं। दरअसल इस बात को समझने के लिए हमें यहां पर सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ के द्वारा आने वाले दिनों में सुने जाने वाली कुछ महत्वपूर्ण याचिकाओं पर गौर करना चाहिए । डबल झीनी याचिकाओं को मुख्य न्यायाधीश डी वाई चन्द्रचूड़ सुनने वाले हैं, उसमें दिल्ली सरकार का आर्डिनेंस मामला, महाराष्ट्र की शिवसेना पार्टी को लेकर एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे विवाद, और मनीष सिसोदिया का मामला भी शामिल है। ऐसे में यहां पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि, आखिर क्यों सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ अपनी प्राथमिकता में ऐसे ही मामलों को चुनतें हैं, जो सत्तापक्ष और विपक्ष से जुड़े हुए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में नहीं है, याचिकाओं के विभिन्न बेंचों पर स्थानांतरण का प्रावधान

सुप्रीम कोर्ट में रोजाना अलग अलग जजों की बेंचों में विभिन्न मामलें सुनवाई के लिए स्थानांतरित किए जाते हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़े इन्ही मामलों की सुनवाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय के मौजूदा मुख्य न्यायधीश डीवाई चंद्रचूड़ के द्वारा अलग अलग बेंचों को स्थानांतरित किया जाता है। लेकिन इसमें एक तथ्य यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायधीश जब चाहे, वह किसी भी मामलें की सुनवाई स्वयं भी कर सकता है। इसके अलावा कोई मामला यदि किसी अन्य जज की बेंच में भी चल रहा है तो, यदि सुप्रीम कोर्ट का जज चाहे तो उसे अपनी बेंच में यानी अपने पास स्थानांतरित कर सकता है। इतना ही नहीं कई बार सुप्रीम कोर्ट या फिर हाईकोर्ट में मामलों की गंभीरता को देखते हुए एक बेंच से दूसरे बेंच में भी स्थानांतरण की प्रक्रिया होती है। इस दौरान विभिन्न मामलों के एक बेंच से दूसरे बेंच पर स्थानांतरण करने में पुरानी बेेंच के सभी जज भी बदल जातें हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकार्ट तक यह प्रावधान लागू है कि, विभिन्न याचिकाओं की सुनवाई की बेंचें बदली जा सकती है।

क्या सीजेआई को सुनवाई के लिए स्थानांतरित याचिकाओं के लिए प्रावधान बनना चाहिए ?

दरअसल अभी मौजूदा समय में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने वाली किसी भी याचिका को सीजेआई की ओर से किसी भी जज को स्थानांतरित किया जाता है। इसके अलावा कुछ मामलों को खुद सीजेआई भी देख लेतें हैं। क्योंकि अभी तक कौन सी याचिका किसी जज की बेंच पर सुनवाई के लिए जाएगी इसका कोई भी प्रावधान नहीं है। ऐसे में अक्सर याचिकाओं को एक बेंच से दूसरे बेंच पर भी स्थानांतरित कर दिया जाता है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट में इसी पुरानी परंपरा के चलते बीते कुछ वर्षों में सीजेआई खुद ही ऐसे मामलों को देख रहें हैं ,जो काफी ज्यादा चर्चित है। दरसअल मौजूदा सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने भी हाल ही में कुछ ऐसे मामलों की सुनवाई की है, जिसमें उन्होंने कहीं ना कहीं केंद्र सरकार और सत्ता पक्ष के प्रतिकूल अपने निर्णय दिए है। ऐसे में कहीं ना कहीं सीजेआई के निर्णय से विधायिका और न्यायपालिका में टकराव की स्थिति भी हाल के वर्षों में देखने को मिली है। इस लिहाज से यहां पर सबसे बड़ा सवाल है कि, जब सीजेआई की ओर से सरकार से जुड़े सभी मुद्दों पर निर्णय दिया जाएगा, और यदि वह निर्णय केंद्र सरकार के प्रतिकूल हुआ, तो केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट में प्रतिकूल स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसे में क्या कोई ऐसा नियम या प्रावधान नहीं होना चाहिए कि, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट में भी विभिन्न याचिकाओं और मामलों की सुनवाई के स्थानांतरण का एक नियम हो, या फिर एक रोस्टर प्रणाली हो, जिसके तहत ही उसे विभिन्न जजों और सीजेआई के पास सुनवाई के लिए भेजा जा सकें। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत चाहे वह सीजेआई हो या फिर कोई अन्य सीनियर जज केवल उसी मामले को निष्पक्षतापूर्वक देखेगा जो उसको सुप्रीम कोर्ट के प्रावधानों के तहत स्थानांतरित किया जाएगा। ऐेेसे में सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि कोई भी जज बिना पूर्वाग्रह के किसी भी मामले की सुनवाई निष्पक्षतापूर्वक करेगा।

हाल के वर्षों में सीजेआई के फैसलों से केंद्र सरकार ओर न्यायपालिका में बढ़ा टकराव

दरअसल देश में यदि हाल के कुछ वर्षो में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर नजर डाले तो, सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों ने ऐसे फैसले भी दिए हैं, जिसपर कमोबेश विवाद की स्थिति पैदा हुई। जिस तरह से भाजपा नेता नुपुर शर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने अपनी टिपण्णी की थी, उसके बाद काफी हंगामा मचा हुआ था। ऐसे में इसी महीने में जब सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ दो ऐसे गंभीर मामलों पर सुनवाई करने जा रहें हैं, जिसका निर्णय केंद्र सरकार और देश के दो राज्यों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। दरअसल इसी महीने की 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश डीवाई चंद्रचूड़ दिल्ली की आप सरकार की ओर से आ्डिनेंस के मुददें पर दायर याचिका पर सुनवाई करेंगें। वहीं दूसरी ओर इसी महीने की 31 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश डीवाई चंद्रचुड़ ही महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के बीच शिवसेना पार्टी के अधिकार को लेकर दाखिल याचिका पर भी सुनवाई करेंगें। दरअसल इन दोनों मामलों को सीजेआई के सुनवाई के खुद ही चुना है। ऐसे में इन दोनों मामलों पर क्या निर्णय आता है उसपर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी। इस लिहाज से यदि सीजेआई का निर्णय किसी भी पक्ष के विरोध में आता है तो वह सीधे तौर पर उसके निशाने पर रहेंगें, फिर चाहे वह सत्तापक्ष हो या फिर विपक्ष हो। लेकिन जो भी हो जिस तरह से हाल के वर्षों में भारत के मुख्य न्यायाधीश विभिन्न मामलों की सुनवाई में खुद ही तत्परता दिखा रहें हैं, इससे उनकी निष्पक्षता पर तो कोई सवाल नहीं उठता है। लेकिन कहीं ना कहीं सीजेआई के सीधे मामलों की सुनवाई से देश में तनाव की स्थिति जरुर पैदा हो रही है, जिसको रोकने के लिए गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

तीस्ता सीतलवाड़ के मामले में तेजी, फिर अन्य मामलों में देरी क्यों ?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जिस तरह से सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ के मामले में सुनवाई के लिए रात के 12:00 बजे तक भी कोर्ट की प्रक्रिया को पूरा किया, वह काफी सराहनीय है। लेकिन जिस तरह की तेजी सुप्रीम कोर्ट ने तीस्ता सीतलवाड़ के केस में दिखाई है, शायद वही तेजी यदि सर्वोच्च न्यायालय ने हजारों लंबित मामलों की सुनवाई में दिखाई होती तो, आज हजारों लोगों को न्याय के लिए सालों का इंतजार नहीं करना पड़ता। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि, हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था में कहीं ना कहीं खामियां तो जरूर हैं। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की ओर से ज्यादातर मामलों में यदि उदासीनता नहीं दिखाई गई होती तो, आज देश में हजारों मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित न पड़े होते।

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