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बीमा कर्मचारी सोच रहे थे कि चार में से एक कम्पनी बिकेगी बाकी तीन तो बच जाएगी लेकिन लोकसभा में....

वो कहते हैं न ......जलते घर को देखने वालों, फूस का छप्पर आपका है,

बीमा कर्मचारी सोच रहे थे कि चार में से एक कम्पनी बिकेगी बाकी तीन तो बच जाएगी लेकिन लोकसभा में....
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बीमा कर्मचारी सोच रहे थे कि चार में से एक कम्पनी बिकेगी बाकी तीन तो बच जाएगी लेकिन जब विधेयक पेश हुआ तो पता चला कि एक नही बल्कि चारो ही बिकेगी...... उन्हें लगा था कि इस पर सदन में व्यापक बहस होगी ओर जनता को उसके लाभ हानि की जानकारी दी जाएगी लेकिन बिना किसी चर्चा के सरकार ने साधारण बीमा व्यवसाय राष्ट्रीयकरण संशोधन विधेयक पारित कर यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी सहित साधारण बीमा क्षेत्र की राष्ट्रीयकृत कंपनियों के निजीकरण का एलान कर दिया .......तब उनके हाथों से तोते उड़ गए.......

सरकार द्वारा लाए गए सामान्य बीमा व्यापार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम 1972' में जिन संशोधनों को मंजूर किया गया है उनमें एक यह भी है कि 51 प्रतिशत सरकारी स्वामित्व की शर्त को खत्म कर दिया जाएगा. अब सभी बीमा कर्मचारी हड़ताल प्रदर्शन कर रहे हैं, 1972 में जनरल इंश्‍योरेंस इंडस्‍ट्री का राष्‍ट्रीयकरण हुआ था और उस दौरान 107 इंश्‍योरेंस कंपनियों का विलय कर 4 इंश्‍योरेंस कंपनियां बनाई गईं थी।

इस प्रकार कुल 4 कम्पनिया अस्तित्व में आई ये है नेशनल इंश्‍योरेंस कंपनी लिमिटेड, न्‍यू इंड‍िया एश्‍योरेंस कंपनी लिमिटेड, ओरिएंटल इंश्‍योरेंस कंपनी लिमिटेड और यूनाइेडट इंडिया इंश्‍योरेंस कंपनी लिमिटेड..........ये सब जनरल इनश्योरेंस कॉर्पोरेशन (जीआईसी) के पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनियां थीं. 2003 में इन चार कंपनियों का स्वामित्व सरकार को दे दिया गया......लेकिन अब नया संशोधन लाकर इसमे सरकार के स्वामित्व को समाप्त किया जा रहा है।

कर्मचारी नेता कह रहे कि यह देश की संपत्ति की खुली लूट है. इन कंपनियों की 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति आधार है. उसमें भी 1 लाख 78 हजार करोड़ रुपए की राशि इन्होंने सरकारी क्षेत्र में निवेश की है. केवल 12 रुपए के प्रीमियम पर 2 लाख रुपए का प्रधानमंत्री बीमा सुरक्षा योजना यही कंपनी उपलब्ध करा रही है.आयुष्मान स्वास्थ्य बीमा योजना का भार भी यही कंपनिया उठा रही है. निजी क्षेत्र की आम बीमा कंपनी तो यह काम करने से रही, घाटे के इन योजनाओं को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ही घाटा सहकर चला रही है. लेकिन इसके लिए उन्हें इनाम के बदले सजा दी जा रही है।

सरकार की ओर से मुआवजा देना चाहिए इसके बजाय सरकार इन्हीं कंपनियों को नीलाम कर रही है, इस देश की दिक्कत यही है कि इस देश की जनता पड़ोसी को पिटता हुआ देख कर बड़ी खुश होती है, लेकिन वह यह भूल जाती है कि अगली बारी उसकी है, जब बिजली कर्मचारियों ने निजीकरण के खिलाफ आवाज उठाई तो बीमा कर्मचारियों ने तमाशा देखा जब रेलवे कर्मचारियों ने निजीकरण को लेकर हड़ताल की तो बैंक कर्मचारी चुपचाप रहे बाद में जब बैंक कर्मचारियों और बीमा कर्मचारियों का आंदोलन हुआ तो उनके साथ भी कोई खड़ा नही हो रहा .....

वो कहते हैं न ......

जलते घर को देखने वालों, फूस का छप्पर आपका है,

आपके पीछे तेज़ हवा है, आगे मुकद्दर आपका है !

उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नम्बर अब आया,

मेरे क़त्ल पे आप भी चुप है, अगला नम्बर 'आपका' है

बस यही कहानी बार बार दोहराई जाती है

सुजीत गुप्ता
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