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सच कहें तो अब फिल्में सुनियोजित तरीके से विवादों के जरिए प्रचार पाने का जरिया बनी, जानिए पूरा का पूरा प्रोपेगण्डा

लीना मणिमेकलाई का विवादों से गहरा नाता रहा है। वह हर क्षण फिल्मों के जरिए जनमानस की संवेनाओं से खेलती नजर आती हैं।

सच कहें तो अब फिल्में सुनियोजित तरीके से विवादों के जरिए प्रचार पाने का जरिया बनी, जानिए पूरा का पूरा प्रोपेगण्डा
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अरविंद जयतिलक

सिनेमा के पर्दे पर चढ़ने से पहले ही फिल्मों का विवादों में आना और उस पर वितंडा खड़ा होना कोई नयी बात नहीं है। फिल्मकारों ने इसे प्रचार पाने और बेशुमार धन कमाने का जरिया बना लिया है। जब तक उनकी फिल्म को लेकर वितंडा खड़ा नहीं होता तब तक उनके प्रचार का कसरत पूरा नहीं होता। तमिल फिल्म निर्माता लीना मणिमेकलाई ने अपनी फिल्म काली के विवादास्पद पोस्टर जारी कर कुछ इसी तरह का प्रचार पाने की कोशिश की है। इस फिल्म के पोस्टर में हिंदू देवी का रुप धरे महिला किरदार को सिगरेट पीते दिखाया गया है। साथ ही इस किरदार के एक हाथ में एलजीबीटीक्यू समुदाय के 6 रंगे झंडे को भी दिखाया गया है। ऐसे में हिंदू संगठनों का भड़कना लाजिमी है।

विडंबना यह कि लीना मणिमेकलाई हिंदू संवेदनाओं को समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा है कि वह जीवित रहने तक निडर होकर अपनी आवाज का इस्तेमाल करती रहेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए वह अपनी जिंदगी भी दांव पर लगाने को तैयार हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि कुछ सेलिब्रेटी राजनीतिक हस्तियां लीना मणिमेकलाई के समर्थन में आवाज बुलंद कर रही हैं। उन्हीं में से एक तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोईत्रा हैं जिन्होंने तर्क गढ़ा है कि जिस तरह हर व्यक्ति को अपने तरीके से देवी-देवताओं का पूजा करने का हक है, उसी तरह बतौर एक व्यक्ति देवी काली की मांस भक्षण करने वाली एवं मदिरा स्वीकार करने वाली देवी के रुप में कल्पना करने का अधिकार है। महुआ मोईत्रा से पूछा जाना चाहिए कि क्या वह किसी अन्य धर्म के देवी-देवताओं के बारे में इसी तरह की कल्पना और टिप्पणी कर सकती हैं? क्या लीना मणिमेकलाई अन्य धर्मों के आराध्यों को अपनी फिल्मों में अमर्यादित ढंग से दिखा सकती हैं? सच तो यह है कि उनमें इस तरह की हिम्मत नहीं है।

गौर करें तो Leena Manimekalai's film Kaali का विवादों से गहरा नाता रहा है। वह हर क्षण फिल्मों के जरिए जनमानस की संवेनाओं से खेलती नजर आती हैं। उन्होंने 2002 में अपनी फिल्म महात्मा के जरिए काम शुरु की। उन्होंने इसके जरिए दिखाने की कोशिश की कि किस तरह मंदिरों को सौंपे जाने के बाद पुजारियों द्वारा नाबालिग लड़कियों का कथित रुप से शोषण किया जाता था। 2004 में उन्होंने दलित महिलाओं पर एक और फिल्म बनायी जो काफी विवादों में रही। 2011 में धनुषकोडि में मछुवारों की दुर्दशा पर सेंगादल नामक एक वृत्तचित्र फिल्म बनाने के बाद एक और विवाद को जन्म दिया था। उनके द्वारा बार-बार ऐसे फिल्मों के निर्माण से एक बात स्पष्ट है कि उनका मकसद विवादों के जरिए फिल्मों को प्रचार में लाना और सुर्खियां बटोरना है। शायद उनका मकसद विवादों के जरिए अपनी फिल्मों के लिए बाजार तलाशना भी है। यह सच्चाई है कि देश में ऐसी अधिकांश फिल्में जो विवादों का हिस्सा बनती है, उन्हें देखने के लिए सिनेमाघरों पर लोग टूट पड़ते हैं।

इस तरह फिल्म मेकर्स को बड़ा मुनाफा साबित होता है। उन्हें इस बात की तनिक भी चिंता नहीं रहती कि उनके ऐसी विवादित फिल्मों से जनमानस कितना व्यथित होता है। दुखद तथ्य यह कि हिंदू देवी-देवताओं और सनातन संस्कृति को टारगेट कर फिल्में बनायी जा रही हैं। यह पहली बार नहीं है जब फिल्म के जरिए हिंदू संस्कृति और इतिहास से खिलवाड़ किया गया है। अभी गत वर्ष पहले ही देश के जाने-माने फिल्मकार संजय लीला भंसाली ने निर्देशित फिल्म 'पद्मावती' के जरिए रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच प्रेम संबंधों का निरुपण किया गया था, जिसे लेकर देश में भारी बवाल मचा। बेशक एक फिल्मकार को अधिकार है कि वह फिल्मों का निर्माण करे। लेकिन उसका उत्तरदायित्व भी होता है कि वह धर्म, संस्कृति और इतिहास को पढ़े-समझे और उसकी वास्तविकताओं एवं भावनाओं का ख्याल रखे। उसे ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी फिल्मों से समाज के नैसर्गिक स्वभाव पर बुरा असर न पड़े। यह उचित नहीं कि वह चंद पैसे के लालच में या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बहाना बनाकर धर्म, संस्कृति और इतिहास को कलंकित कर दे। यह एक किस्म से विजित की संस्कृति, सभ्यता और गरिमापूर्ण धर्म, संस्कृति और इतिहास के साथ छल है।

सच कहें तो अब फिल्में सुनियोजित तरीके से विवादों के जरिए प्रचार पाने का जरिया बनती जा रही हैं। विश्वरुपम, हैदर, एमएसजी, पीके, मद्रास कैफे, सिंघम, आरक्षण, माई नेम इज खान, जोधा-अकबर, वाटर, जो बोले सो निहाल और फायर इत्यादि फिल्में कुछ इसी तरह का उदाहरण हैं। फिल्मकारों ने यह धारणा पाल रखी है कि फिल्मों पर जितना अधिक बवाल होगा उनकी कमाई में उतना ही इजाफा होगा। लेकिन मधुर भंडारकर द्वारा निर्देशित फिल्म 'इंदू सरकार' विवाद और प्रचार के बावजूद भी बाॅक्स आॅफिस पर कमाल नहीं कर सकी। बेशक एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज में कहने-सुनने, लिखने-पढ़ने और दिखने-दिखाने की आजादी होनी चाहिए। विशेष रुप से कला के क्षेत्र में तो और भी क्योंकि समाज में जो कुछ भी घटित होता है, उसे कला के जरिए पर्दे पर उकेरा जाता है। लेकिन कला और अभिव्यक्ति की आड़ में अरबों कमाने की लालच में अभिव्यक्ति का दुरुपयोग भी नहीं होना चाहिए। एक वक्त था जब फिल्मों का कथानक समाज और राष्ट्र में चेतना का भाव पैदा करता था। गौर करें तो आजादी की लड़ाई को धार देने से लेकर समाज को बदलने व रचने में फिल्मों की अहम भूमिका रही है।

बेशक आज की फिल्में भी सामाजिक सरोकारों को उकेरती हैं लेकिन उतना ही वास्तविकताओं से दूर अतिरंजित और फूहड़पन से लैस भी होती है। यहीं वजह है कि वह विवादों का विषय बन रही हैं। दो राय नहीं कि फिल्म का शीर्षक क्या हो अथवा उसका कथानक कैसा हो यह तय करने का अधिकार फिल्म के प्रोड्यूसर और निर्देशक को है। एक फिल्मकार को अधिकार और आजादी है कि वह ऐतिहासिक कथानकों को फिल्मों के जरिए दुनिया के सामने लाए। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह ऐतिहासिकता के साथ छेड़छाड़ करे। अगर फिल्म के शीर्षक, कथानक या डायलाग से समाज का कोई वर्ग आहत होता है तो उसमें सुधार की गुंजाइश होनी चाहिए। याद होगा दिसंबर 2015 में 'क्या कूल हैं हम' और 'मस्तीजादे' पर सेंसर बोर्ड ने कैंची चलायी। इन फिल्मों पर अश्लीलता परोसने के आरोप लगे थे। 'क्या कूल हैं हम' में 107 सीन प्रोड्यूसर ने, जबकि 32 सीन सेंसर बोर्ड ने काटे थे। इसी तरह 'मस्तीजादे' में 349 सीन प्रोड्यूसर ने जबकि 32 सीन सेंसर बोर्ड ने काटे थे। इसके बाद भी इन फिल्मों को 'ए' सर्टिफिकेट के साथ रिलीज की अनुमति दी गयी। नवंबर 2015 में जेम्स बांड की सीरिज की 24 वीं फिल्म 'स्पेक्टर' के एक दृश्य पर भी सेंसर बोर्ड ने कैंची चलायी।

जनवरी 2015 में अभिनेता अक्षय कुमार द्वारा अभिनीत फिल्म 'बेबी' को पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड ने रिलीज की अनुमति देने से इंकार कर दिया। अप्रैल 2015 में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और परेश रावल की फिल्म 'धर्मसंकट' रिलीज होने से पहले ही विवादों में घिर गयी। विवाद का कारण वह पोस्टर था जिसमें अन्नू कपूर ने एक टोपी पहन रखी थी जो कि मुस्लिम कम्युनिटी से मिलती-जुलती दिख रही थी। मार्च 2015 में फिल्म 'डर्टी पाॅलिटिक्स' भी विवादों से घिरी जब फिल्म का फस्र्टलुक जारी हुआ। इस पोस्टर में अभिनेत्री मल्लिका तीन रंगों वाले राष्ट्रीय ध्वजों में लिपटी नजर आयी। हैदराबाद उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर मल्लिका और सरकार को नोटिस भी जारी किया। जनवरी 2016 में हंसल मेहता की फिल्म 'अलीगढ़' में समलैंगिक शब्द के इस्तेमाल पर सेंसर बोर्ड ने ऐतराज जताया।

उल्लेखनीय है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सीरस के जीवन से जुड़ी सत्य घटना पर आधारित इस फिल्म में मनोज वाजपेयी और राजकुमार राव ने प्रमुख भूमिका निभायी थी। अभी गत वर्ष ही अनुराग कश्यप निर्देशित फिल्म 'उड़ता पंजाब' विवादों के केंद्र में रहा। इस फिल्म का कथानक पंजाब में नशाखोरी के इर्द-गिर्द गढ़ा-बुना गया था जिसके कुछ दृश्यों और डाॅयलाग को लेकर बवाल मचा था। उचित होगा कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड अथवा भारतीय सेंसर बोर्ड जो कि भारत में फिल्मों, टीवी धारावाहिकों, टीवी विज्ञापनों और विभिन्न दृश्य सामग्री की समीक्षा करने संबंधी विनियामक निकाय है वह फिल्मों के ऐसे दृश्यों पर कैंची चलाए जो विषयवस्तु और सच्चाई से कोसों दूर है।

Shiv Kumar Mishra
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