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सपा सरकार अपने मर्म को भुला सकती है...

साल 2017 जब यूपी में समाजवादी पार्टी सरकार जाने के बाद बीजेपी की सरकार आई थी उन दोनों सरकारों के बीच के अपराध के ग्राफ की बात करें तो साल 2017 तक प्रदेश में अपराध की जो स्थिति थी उसमें कई मायनों में सुधार हुआ है तो कई लिहाज से स्थिति और बदतर भी हुई है।

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कोरोना की दूसरी लहर के बीत जाने के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 करीब आने जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में यदि विपक्षी पार्टी के तौर पर देखा जाए तो समाजवादी पार्टी अहम मानी जा रही है। पिछली बार सपा बसपा का महागठबंधन बीजेपी के सामने धराशायी हो गया था, इसके कई कारण माने जाते हैं जैसे सपा और बसपा की रणनीतियों का साम्य ना होना। सपा पार्टी की तरफ से कुछ नेताओं के बेतुके बयान इसका कारण रहे थे। जयाप्रदा के बारे में आजम खांन का बेतुका बयान आज भी याद किया जाता है। रेप के मामलों में अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव का "लड़कों से गलती हो जाती है" वाला बयान सबके जहन में है।

लेकिन अपराध को रोकने के लिए सत्तासीन पार्टी बीजेपी ने भी कोई खास कोशिश की नहीं है। भले ही चाहें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कई मौकों पर बताया कि इस प्रदेश में अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं है और सरकार ने भी तमाम कोशिशें कीं ताकि अपराध पर अंकुश लग सके। ताबड़तोड़ एनकाउंटर में बड़े-बड़े अपराधियों को मार गिराया गया।एनसीआरबी यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो, जोकि पूरे देश भर के हर राज्य में अपराधों पर पूरा लेखा-जोखा तैयार करता है, के मुताबिक साल 2020 तक उत्तर प्रदेश की स्थिति अपराध के मामले में बहुत बेहतर नहीं हुई है। अगर हम साल 2017 जब यूपी में समाजवादी पार्टी सरकार जाने के बाद बीजेपी की सरकार आई थी उन दोनों सरकारों के बीच के अपराध के ग्राफ की बात करें तो साल 2017 तक प्रदेश में अपराध की जो स्थिति थी उसमें कई मायनों में सुधार हुआ है तो कई लिहाज से स्थिति और बदतर भी हुई है।

कुछ मामलों में अपराध घटे तो कुछ में बढ़े साल 2020 के एनसीआरबी के डाटा के मुताबिक उत्तर प्रदेश में हर 2 घंटे में एक रेप का मामला रिपोर्ट किया जाता है।जबकि बच्चों के खिलाफ रेप का मामला हर 90 मिनट में रिपोर्ट हुआ है। एनसीआरबी के मुताबिक साल 2018 में उत्तर प्रदेश में रेप पर कुल 4322 मामले दर्ज हुए थे। इसका सीधा मतलब है कि हर रोज करीब 12 रेप के मामले हो रहे थे।

महिलाओं के खिलाफ 2018 में 59445 मामले दर्ज किए गए। जिसका अर्थ है कि हर रोज महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध के मामले 162 रिपोर्ट किए गए। जो कि साल 2017 के मुकाबले 7 परसेंट ज्यादा है। साल 2017 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 56011 मामले दर्ज किए गए थे। यानी उस वक्त यह आंकड़ा हर दिन के हिसाब से 153 केस था। साल 2018 में नाबालिग बच्चियों के साथ रेप के कुल 144 मामले दर्ज किए गए। जबकि साल 2017 में यह आंकड़ा 139 था।

साल 2017 अप्रैल में बीजेपी की सरकार आने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहुत से ऐसे कार्यक्रम शुरू किए जिससे कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़े कम हो सकें। एंटी रोमियो स्क्वॉड, मिशन शक्ति जैसे कार्यक्रम इसीलिये शुरू किए गए।

सोनभद्र नरसंहार के बाद हजारों हेक्टेयर जमीन कराई गई कब्जा मुक्त सोनभद्र जिले के नरसंहार के बाद, जिसमें 11 लोग मारे गए थे, योगी सरकार ने सुनियोजित तरीके से संगठित जमीन कब्जा करने वाले नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए राजस्व विभाग और जिला प्रशासन की एक कमेटी भी गठित की। जिसमें पूरे प्रदेश में हजारों हेक्टेयर जमीन कब्जा मुक्त कराई गई। अपराध को कम करने के लिए रासुका के तहत अपराधियों के खिलाफ मुकदमे किए गए जिससे कि संगठित अपराध करने वाले जल्दी जेल से बाहर ना आ सकें।

मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे बड़े अपराधियों ने अपना तबादला दूसरे राज्यों की जेलों में करा लिया, लेकिन अगर आंकड़ों की बात करें तो NCRB के डेटा के मुताबिक यूपी में साल 2016 में जहां कुल अपराध के 4,94,025 मामले दर्ज किए गए वहीं साल 2018 में 5,85,157 मामले दर्ज किए गए यानि की अपराधों में करीब 11 प्रतिशत का उछाल दर्ज हुआ।

यूपी सरकार एनसीआरबी के इन आंकड़ों को नकारती है। सरकार के मुताबिक यूपी में अपराध पर नियंत्रण हुआ है और अगर आंकड़ों की बात की जाए तो ये प्रदेश की जनसंख्या के लिहाज से पूरे देश की तुलना में कम है। यूपी सरकार हाल के दिनों में अपराध पर नियंत्रण के लिए ताबड़तोड़ एनकाउंटर और रासुका जैसे कड़े कानून का इस्तेमाल अपराधियों पर लगाम लगाने के लिए कर रही है। सरकार अपनी इसी कोशिश के हवाले से प्रदेश में अपराध पर नियंत्रण का दावा भी कर रही है।

लेकिन अब वह समय आ गया है, शायद जनता का रोष भी है कि वह सरकार को पलटने की बात करें। यह जो उन्माद है सरकार के प्रति, यह कुछ दिन का ही परिणाम नहीं है, जहां तक प्रदेश सरकार ने शुरुआत में गुंडागर्दी रोकने की कोशिश की, वही आज उसके विपरीत परिणाम सामने आ रहे हैं शासन और प्रशासन भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जा रहा है। भ्रष्टाचार घटने की बजाय बड़ा ही है यह बात और है कि आम जन में कितना प्रभावी है? लेखपाल की वैकेंसी 2019 से लटकी हुई है। कोरोना काल के समय वैक्सीन की किल्लत, जमाखोरी , ब्लैक मेलिंग, इंजेक्शन की मारामारी जनता ने आखिर क्या नहीं देखा ? उत्तर प्रदेश के लोग इस मर्म को कैसे भुला सकते हैं?

समाजवादी पार्टी को चाहिए कि वह एक ऐसी रणनीति अपनाएं जिसे वह न केवल 2022 के लिए बल्कि आगे के लिए भी जारी रखें। कुछ दिन पहले, अखिलेश यादव ने कहा , कि सपा चुनाव में किसी बड़े दल से गठबंधन नहीं करेगी। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बसपा की तरफ इशारा करते हुए ऐसा कहा था। अखिलेश को लगता है कि पिछली बार बसपा की वजह से वह सफल नहीं हो पाए या कम सीटें मिली। यदि अखिलेश को ऐसा लगता भी है तो अखिलेश के पास अबकी बार ऐसा मौका है जिसे अखिलेश भुना सकते हैं।

-- प्रत्यक्ष मिश्रा (स्वतंत्र पत्रकार और राइटर) सम्पादकीय

संपर्क करें - prataykshmishra@gmail.com

सुजीत गुप्ता
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