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एक औरत अपने अकेलेपन में खुदको तबाह कर लेती है, जबकि एक आदमी अपने अकेलेपन में खुदको छोड़ सबकुछ तबाह कर देता है..

एक औरत अपने अकेलेपन में खुदको तबाह कर लेती है, जबकि एक आदमी अपने अकेलेपन में खुदको छोड़ सबकुछ तबाह कर देता है..
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एक आदमी का अकेलापन एक औरत के अकेलेपन से अलग होता है ..एक आदमी अपने अकेलेपन में कभी भी अकेला नहीं होता। वह अपने अकेलेपन में दारू, सिगरेट और दूसरी औरत तक की जगह रखता है। एक औरत अपने अकेलेपन में इस कदर कसी, ठुसी और भरी होती है कि उसके अकेलेपन में किसी अन्य चीज के लिए कोई जगह ही नहीं बचती। ऐसा नहीं कि एक औरत की जिन्दगी में दारू, सिगरेट और दूसरे पुरुष नहीं होते। पर इन सबको औरतों ने अभी भी अपनी खुशी के...

एक आदमी का अकेलापन एक औरत के अकेलेपन से अलग होता है ..

एक आदमी अपने अकेलेपन में कभी भी अकेला नहीं होता। वह अपने अकेलेपन में दारू, सिगरेट और दूसरी औरत तक की जगह रखता है।

एक औरत अपने अकेलेपन में इस कदर कसी, ठुसी और भरी होती है कि उसके अकेलेपन में किसी अन्य चीज के लिए कोई जगह ही नहीं बचती।

ऐसा नहीं कि एक औरत की जिन्दगी में दारू, सिगरेट और दूसरे पुरुष नहीं होते। पर इन सबको औरतों ने अभी भी अपनी खुशी के दिनों के लिए बचा रखा है।

औरतों को मरकर जीना आता है।

पुरुषों को एक उम्र में बस एक ही उम्र नसीब होती है।

औरतें कभी नहीं मरती फिर भी घर के अलग अलग हिस्सों में इस कदर दफना दी जाती हैं कि एक पुरुष का बनाया घर एक औरत का हो जाता है।

भारतीय घरों में औरतों की देहगंध इस कदर हावी होती है कि पुरुष का अस्तित्व नगण्य हो जाता है।

पुरुष कभी भी समर्पित होना नहीं जानता। वह घर में खुदको खर्च कर देने की बजाय हर रोज़ एक टुकड़ा खुदको बाहर किसी और के पास छोड़ आता है। इसलिए एक औरत जब अपने ही घर में मर और खप रही होती है तो एक पुरुष अपनी एक नई दुनिया का निर्माण कर रहा होता है।

औरतों की अंतिम दुनिया पति और बच्चे होते हैं।

पुरुषों की दुनिया में ऐसा नहीं है। औरत मरी नहीं कि वह दूसरी औरत जो हर रोज जेहन में पलती है घर में कदम रख देती है।

अगर उसकी जिन्दगी में आयी 100 औरतें मर जाएं तो वह किसी ना किसी बहाने से अपनी 101वीं शादी के लिए खुदको तैयार कर लेगा।

सचमुच, एक पुरुष बहुत अलग होता है।

एक औरत अपने अकेलेपन में खुदको तबाह कर लेती है।

एक आदमी अपने अकेलेपन में खुदको छोड़ सबकुछ तबाह कर देता है।

कोख की जिम्मेदारी इसीलिए प्रकृति ने औरतों को सौंपी है।

बच्चे जनने का सारा अधिकार अभी भी एक स्त्री के पास है।

दुनिया इसीलिए ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि स्त्री सृजक है, पुरुष सृजन। पर विध्वंश के खेल में दोनों बराबर के भागीदार।

आखिर दोनों रहते तो एक ही घर, एक ही देह, एक ही खोल में हैं।

सभ्यता का इतिहास जब लिखा जायेगा दोनों को बराबर का भागीदार बना दिया जायेगा।

सच और झूठ को एक ही पलड़े पर तौला जायेगा।

स्त्रियों के हिस्से में कभी प्रेम नहीं आयेगा।

सिर्फ और सिर्फ गुलामी आयेगी।

उसका अपना अकेलापन आज की ही तरह 200 साल बाद भी उस पर भारी पड़ जायेगा।

सचमुच, एक औरत अपने अकेलेपन में नितांत अकेली होती है।

तुम चाहो तो अपने क़यामत के दिन मुझे अपना गवाह बना लेना।

- संजय शेफर्ड (मणिका मोहिनी की वॉल से)

प्रत्यक्ष मिश्रा
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