मिलिंद खांडेकर
लाइसेंस परमिट राज के बारे में आपने सुना होगा. 1991 से पहले तक देश समाजवादी अर्थव्यवस्था के रास्ते पर चलता था. कोई सामान बनाना हो या विदेश से मँगवाना हो तो सरकार से लाइसेंस या परमिट लेना पड़ता था. सरकार तय करती थी कि कितना सामान आएगा? सरकार मतलब कोई बाबू फ़ाइल पास ना करें तब तक आप कोई सामान ना बना सकते थे ना ही मँगवा सकते थे. 1991 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की सरकार ने सब बदल डाला. लाइसेंस परमिट के दायरे से ज़्यादातर चीजों को बाहर कर दिया. अर्थव्यवस्था में तेज़ी आयी .देश में ख़ुशहाली बढ़ी. अब 32 साल बाद लाइसेंस परमिट राज लौटने की चर्चा हो रही है क्योंकि केंद्र सरकार ने बिना लाइसेंस लैपटॉप, टेबलेट के विदेश से मँगवाने पर रोक लगा दी है. अब कंपनियों को लाइसेंस लेना पड़ेगा तभी वो भारत में एप्पल के मैकबुक जैसे लैपटॉप बेच सकेंगे. इस हफ़्ते हिसाब किताब लैपटॉप के लाइसेंस का.
देश आज़ाद होने के क़रीब 45 साल तक देश लाइसेंस परमिट राज पर चला . इसके पीछे दो तर्क दिए जाते हैं. हम अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ाद हुए थे, इस कारण विदेशी सामान पर निर्भरता नहीं रखना चाहते थे. दूसरा कारण था विदेशी मुद्रा बचाना . विदेश से सामान मँगवाने पर विदेशी मुद्रा देनी पड़ती थी. सरकार विदेशी मुद्रा भंडार को बचा कर रखना चाहती थी. 1991 में बाज़ार खोलने की मजबूरी विदेशी मुद्रा भंडार ख़ाली होना भी था. बाज़ार खुलते ही विदेशी कंपनियों ने डॉलर की बाढ़ लगा दी. शेयर बाज़ार में विदेशी मुद्रा आ गई तब से अब तक एक दो अवसर छोड़कर भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भरा हुआ है.
अब आते हैं लैपटॉप के लाइसेंस पर . सरकार ने इस हफ़्ते नोटिस निकाला कि लैपटॉप विदेश से लाने से पहले लाइसेंस लेना पड़ेगा. अब तक एप्पल, डेल,सैमसंग जैसी कंपनियाँ विदेश में लैपटॉप बनाती है और भारत में लाकर बेच देती है. सरकार से पूछना नहीं पड़ता है. इंपोर्ट ड्यूटी चुका दीजिए और लैपटॉप बेच दीजिए. अब ऐसा नहीं होगा . सरकार लाइसेंस देगी तभी कंपनी लैपटॉप या टेबलेट बेचने के लिए ला सकेंगी. ये व्यवस्था तुरंत लागू होनी थी, अब एक नवंबर से लागू होगी.
सरकार ने ऐसा क्यों किया?
सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने एक अगस्त को जियो बुक लाँच की. ये लैपटॉप है, इसकी क़ीमत 16 हज़ार रुपये है. दो दिन बाद सरकार ने विदेशी लैपटॉप मँगवाने पर रोक लगा दी. हालाँकि इस चर्चा के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है. इतना पक्का है कि इससे देशी कंपनियों को फ़ायदा होगा. सरकार की मंशा है कि लैपटॉप भारत में बनें . मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिले
2020 में कोरोनावायरस के बाद दुनिया भर में लॉक डाउन लग गया था. इलेक्ट्रॉनिक सामान की क़िल्लत हो गई थी. ज़्यादातर सामान चीन में बनता है. चीन में सामान बनाने वाली कंपनियों को भारत में लाने के लिए सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इनसेंटिव ( PLI) स्कीम लायी. कंपनियों को 14 अलग अलग सेक्टर में सामान बनाकर बेचने पर सरकार पाँच साल तक सब्सिडी देती है. ये सब्सिडी सामान की क़ीमत का 3-5 प्रतिशत तक है. इसका फ़ायदा मोबाइल फ़ोन में देखने मिला. दस साल पहले तक फ़ोन भारत से ना के बराबर एक्सपोर्ट होते थे, पिछले वित्त वर्ष में 90 हज़ार करोड़ रुपये के फ़ोन भारत से विदेश भेजे गए, इसमें से आधे एप्पल फ़ोन थे.
लैपटॉप टैबलेट को लेकर सरकार 2021 में PLI स्कीम लायीं. ये फेल हो गई. इस साल मई में इनसेंटिव की राशि बढ़ाकर 17 हज़ार करोड़ रुपये कर दी गई. फिर भी एप्पल जैसी कंपनी भारत में लैपटॉप बनाने के लिए राज़ी नहीं हो रही है. सरकार ने लैपटॉप कंपनियों को भारत में फ़ैक्ट्री लगाने के लिए मजबूर करने के लिए लाइसेंस परमिट नीति लायी है. बड़ी कंपनियों को भारत में लैपटॉप टेबलेट बेचने के लिए एक बाधा खड़ी की गई है. संभव है कि कंपनियाँ मजबूरी में भारत में लैपटॉप बनाने लगें. हालाँकि डंडे का फ़ायदा हो ये ज़रूरी नहीं है. कंपनियाँ लाइसेंस लेकर भी अपना काम जारी रख सकती है. नतीजा आने वाले समय में ही पता चलेगा, इतना ज़रूर है कि लाइसेंस परमिट राज की यादें सरकार ने फिर ताज़ा कर दी है.