प्रेमचंद जयंती 31 जुलाई पर : प्रेमचंद क्यों एक असुविधाजनक जगह है?
प्रेमचंद ने चर्चिल से असहमति व्यक्त की;
चर्चिल ने कहा, ‘भारत की जनता कोई परिवर्तन नहीं चाहती।’ प्रेमचंद ने इसका विरोध करते हुए लिखा(1932), ‘चर्चिल शायद भूल जाते हैं कि यह बीसवीं सदी है और संसार जिस तरफ जा रहा है, उधर ही भारत का जाना अवश्यंभावी है।’ वे सामंती व्यवस्था के संदर्भ में आशा कर रहे थे, ‘(अंग्रेज) सरकार उसकी कितनी ही हिमायत करे, मगर जनतंत्र के तूफान से उसे बचा नहीं सकती।’
कितने आश्चर्य की बात है कि जिस यूरोप के कारखाने में ‘राष्ट्र’ की धारणा बनी थी, वही भारत को ‘राष्ट्र’ बनने देना नहीं चाहता था, जबकि भारत बहुविभाजित रहते हुए भी स्वाधीनता संग्राम के भीतर से अपने उदीयमान ‘राष्ट्र’ में एक बड़ी मानवता की रचना कर रहा था। इसपर सोचने की जरूरत है कि 21वीं सदी में भारत के उन बढ़ते कदमों को अतीत और पश्चिम के संकीर्ण विचारों ने फिर कैसे जकड़ लिया और पूरी दुनिया फिर एक नई मानवता की ओर कैसे बढ़ेगी।
प्रेमचंद के पीछे कोई सत्ता नहीं है
प्रेमचंद की एक बड़ी चीज आज के समय में खो गई है, जो उनके पात्रों के मन में गूंजती रहती थी- ‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे?’ आज कोई आदमी जरा भी नुकसान उठा कर सच्ची बात कहने या त्याग के लिए तैयार नहीं है। इसलिए वह कई मुद्दों पर चुप रहता है और अपनी चुप्पी को रणनीति बताता है।
आज जीवन में चुनी हुई चुप्पियों के अलावा नई-नई उपभोक्ता चीजों का आकर्षण है। अब उत्तेजना पैदा किए बिना कुछ भी अधूरा है। मानवीय संबंध अल्पकालिक हो गए हैं। आत्मकेंद्रिक नगर जीवन में प्रत्यक्ष मिलकर बात करने वाले, बहस करने वाले, अड्डा मारने वाले लोगों का अभाव है। अब विकल्प के तौर पर ह्वाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे ऐप हैं। जिधर देखो, चटकदार या हिंसक भाषा है, जो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। कैसे पहुंची हमारी भाषा इस मोड़ पर?
मानवता, लोकतंत्र, राष्ट्रीयता, समाजवाद, विकास, सामाजिक न्याय, विमर्श, धर्म और जनसेवा कैसे बन गए अपराधियों के छिपने की जगहें और ये चीजें क्यों रिक्त होकर चिह्नों में बदल गईं? इस देश, दुनिया और समाज की मूल्यवान चीजों का चिह्नों में बदलना एक बड़ी बौद्धिक रिक्तता की देन है। बौद्धिक रिक्तता लोकतंत्र में घुन का काम करती है।
क्या प्रेमचंद भी चिह्न में बदले हैं? ऐसा नहीं हुआ है, क्योंकि हर चिह्न के पीछे सत्ता होती है- बाजार सत्ता या राज्य सत्ता। सत्ताओं के पास ही चिह्न निर्मित करने की ताकत है, क्योंकि उन्हें छिपने की जगहें चाहिए। प्रेमचंद के पीछे कोई सत्ता नहीं खड़ी है, क्योंकि यह एक असुविधाजनक जगह है। इसलिए आज लोग याद करना नहीं चाहते उनके सूरदास, धनिया, जानकीनाथ, मंगल, हामिद, जाहिद जैसे चरित्रों को, उनके दो बैलों को, उनकी आवाज की साहसिक ईमानदारी को, उनके सादे विद्रोही जीवन को!
इस युग में स्मृतियों, अनुभवों और भविष्य कल्पना की जरूरत सामान्यतः खत्म हो चुकी है, क्योंकि टेक्नोलॉजी तेजी से बदल रही है। चीजें जल्दी पुरानी और गैर-जरूरी हो जा रही हैं। इसलिए सकारात्मक स्मृतियां काम नहीं आ रही हैं, नकारात्मक स्मृतियों का उपयोग भले हो रहा हो। हमेशा एक अनिश्चितता है। सबकुछ बदलते तकनीकी संसाधनों और तात्कालिक जरूरतों पर निर्भर होता जा रहा है। हर दस दिन पर सत्ताएं बताती हैं कि क्या याद करना है और क्या नहीं। इस तरह लोगों की खुद याद रखने और भविष्य कल्पना की क्षमताओं का धीरे-धीरे ह्रास होता जा रहा है, जबकि सिर्फ अ-मानव के लिए ही स्मृतियां और भविष्य कल्पना अर्थहीन हैं।
(’वागर्थ’ संपादकीय)