Dr. Shailendra Pandya
हाल ही में केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हवाले से लोक सभा में बताया कि साल 2017 के बाद से देश में बाल विवाह से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी हुई है। साल 2017 में पुलिस ने पास बाल विवाह निषेध अधिनियम-2006 के तहत कुल 395 मामले दर्ज किए थे। वहीं, साल 2021 में यह आंकड़ा बढ़कर 1050 हो गया। हालांकि, केंद्र सरकार ने साफ किया है कि इस बढ़ोतरी का मतलब बाल विवाह के मामलों में बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि लोगों के बीच जागरूकता का प्रसार है। वे अब बाल विवाह के खिलाफ मामला दर्ज कराने के लिए पहले से अधिक संख्या में पुलिस के पास पहुंच रहे हैं। यह हकीकत भी है।
वहीं, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (एनएफएचएस, 2019-21) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में 20 से 24 साल के बीच की उन महिलाओं की संख्या 27 फीसदी से घटकर 23 फीसदी हो गई है, जिनकी 18 साल से कम उम्र में शादी हुई थी।
एनसीआरबी और एनएफएचएस के आंकड़ों को एक साथ रखकर देखें तो इससे यह बात सामने आती है कि आज भी बड़ी संख्या में बाल विवाह के मामले दर्ज नहीं किए जा रहे हैं। इसके अलावा बाल विवाह के खिलाफ कानून बनने के 16 साल बाद भी यह एक चलन के रूप में बदस्तूर जारी है। हालांकि, जागरूकता और कानूनी सख्ती के चलते मंद गति से ही सही, लेकिन हम देश से बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करने की राह पर हैं। इसके लिए हमें सबसे पहले समस्याओं को पहचानने और उनके समाधान की जरूरत है।
सरकारी संस्थाओं सहित कई गैर-सरकारी संगठनों की रिपोर्टों में यह बात सामने आई है कि भारत में बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथा के प्रमुख कारण गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक सुरक्षा का अभाव है। एनएफएचएस के आंकड़ें भी इसकी पुष्टि करते हैं। देश के जिन राज्यों में बाल विवाह के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए हैं, उनमें बिहार (40.8 फीसदी), असम (31.8 फीसदी), झारखंड (32.2 फीसदी) और राजस्थान (25.4 फीसदी) जैसे राज्य हैं, जिनकी गिनती आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े राज्यों में सबसे पहले होती है।
अब हम एक-एक करके प्रमुख समस्याएं और उनके समाधानों को देखते है।
अशिक्षा
कुछ दिन पहले केंद्र सरकार ने ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा पर एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें कहा गया है कि गांवों में रहने वाले चार में से तीन माता-पिता चाहते हैं कि उनकी बेटी कम से कम ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई करें। लेकिन आर्थिक और अन्य कारणों से वे ऐसा नहीं कर पाते।
फिलहाल, शिक्षा के अधिकार कानून के तहत 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की सुविधा दी जा रही है। अगर इस सीमा को 14 साल से बढ़ाकर 18 साल कर दी जाए तो न केवल लड़कियां अच्छी शिक्षा पा सकेंगी, बल्कि बाल विवाह के आंकड़े भी कम हो जाएंगे। इसके साथ ही, अगर केंद्र सहित राज्य सरकारें लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय मदद उपलब्ध करवाए तो उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए कई दरवाजे खुल सकते हैं। उदाहरण के लिए एनएफएचएस-5 रिपोर्ट की मानें तो केरल में 20 से 24 साल के बीच की केवल छह फीसदी महिलाओं का बाल विवाह हुआ था।
गरीबी
गरीबी और सामाजिक बुराइयों के बीच चोली-दामन का संबंध है। बाल विवाह की भी एक बड़ी वजह गरीबी है। आम तौर पर सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े परिवारों में सदस्यों की संख्या अधिक होती है। इन परिवारों में लड़कों को तो कम उम्र में बाल श्रम पर लगा दिया जाता है, लेकिन लड़कियों को बोझ मान लिया जाता है। और परिवार के मुखिया अपनी नाबालिग बेटी की शादी कराकर इस बोझ से खुद को मुक्त कर लेते हैं। वे इस बात को नहीं समझते हैं कि इसके बुरे नतीजे उनकी बेटी को आजीवन झेलने पड़ेंगे।
साल 1947 में आजादी मिलने के बाद से ही देश की सरकारें गरीबी को खत्म करने की दिशा में कोशिश कर रही हैं। इसके लिए कई कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत की गई। लेकिन योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन में खामियों के चलते अभी भी देश की आबादी का एक हिस्सा गरीबी में अपने दिन गुजारने को मजबूर है। सरकार इन खामियों को दूर कर न केवल लोगों को गरीबी के भंवरजाल से बाहर निकाल सकती है, बल्कि बाल विवाह जैसे अभिशाप से कई लड़कियों की जिंदगी भी बच सकती है।
सामाजिक सुरक्षा
बाल विवाह की एक बड़ी वजह देश में लड़कियों के लिए असुरक्षा के माहौल का होना है। हर दिन अखबारों की खबरें बताती हैं कि बेटियां अपने समाज और स्कूल, कॉलेज आदि जैसी जगहों पर भी सुरक्षित नहीं हैं। हर दिन देश में सैकड़ों बेटियां किसी की हवस की शिकार बनती हैं। उनकी ट्रैफिकिंग कर दूसरे शहरों और राज्यों में बेच दिया जाता है। अपने आस-पास इस तरह की स्थितियों को देखकर किसी भी लड़की के माता-पिता का दिल घबरा उठता है। इसके अलावा देश में बेटियों के साथ सम्मान को भी जोड़ा जाता है। अगर किसी बेटी के साथ यौन उत्पीड़न होता है तो समाज में उस पीड़ित परिवार की प्रतिष्ठा धूमिल मान ली जाती है। इन परिस्थितियों के बीच वे अपनी बेटियों की शादी कर इस चिंता से मुक्त हो जाने की कोशिश करते हैं।
देश में कहीं भी हमारी बेटियां खुद को सुरक्षित महसूस करने के साथ अपने सपनों की उड़ान उड़ सकें, इसके लिए चुस्त- दुरूस्त प्रशासन सहित बाल विवाह निषेध कानून- 2006 और यौन उत्पीड़न से संबंधित विभिन्न कानूनों-नियमों को जमीन पर सख्ती से लागू करने की जरूरत है।
सरकार के साथ-साथ समाज के सभी पक्षों को एक जुट होकर बाल विवाह को प्रयास करना चाहिए। इसमें धर्म गुरुओं सहित सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक अहम भूमिका है। नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने देश से बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति को जड़ से खत्म करने के लिए 16 अक्टूबर, 2022 को बाल विवाह मुक्त भारत अभियान की शुरुआत की थी। इसमें देशभर की 70,000 से अधिक महिलाओं ने हिस्सा लिया था। वहीं, कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन (केसीएसएफ) साल 2030 तक देश से बाल विवाह को खत्म करने की दिशा में लगातार प्रतिबद्ध है।
अगर हम भारतीय इतिहास के पन्नों को एक बार फिर से पलटकर देखें तो हम पाते हैं कि देश में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कई आंदोलन चले हैं। समय के साथ ही हमने सती प्रथा, नरबलि प्रथा सहित अन्य बुराइयों पर जीत हासिल की है। इन सबके बीच बाल विवाह जैसी कुप्रथा अभी भी हमारी बेटियों के उज्ज्वल भविष्य को लील रही है। लेकिन अगर देश के सभी लोग धर्म, जाति और विचारधारा आदि तो छोड़ एकजुट होते हैं तो हम इस कुरीति पर भी विजय पा सकते हैं। और यह हमारी करोड़ों बेटियों की मुक्त उड़ान को सुनिश्चित करने वाली बहुमूल्य उपलब्धि होगी।
Dr. Shailendra Pandya, Former Member Rajasthan State Commission for Protection of Child Rights and the Director of Gayatri Seva Sansthan (NGO). Based in Udaipur, Rajasthan, this organization has been instrumental in bringing about a big change in society since 1986.