नीतीश के ताबूत में कील ठोक सकते हैं 'पीके'

नीतीश किसी भी सूरत में बिहार का मुख्यमंत्री बने रहना चाहते हैं इसके लिए आरजेडी से अलग होने के बाद उनके पास बीजेपी के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

Update: 2020-01-30 08:07 GMT

पटना। किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं रहा है प्रशांत किशोर के लिए नीतीश कुमार का बेइंतहा प्यार, फिर तकरार और अब अलगाव। आखिरी क्या वजह रही कि दोनों एक दूसरे पर एकदम से हमलावर हो गए। तो जनाब इसके पीछे दोनों की अपनी-अपनी राजनीति महत्वाकांक्षा है। नीतीश किसी भी सूरत में बिहार का मुख्यमंत्री बने रहना चाहते हैं। इसके लिए आरजेडी से अलग होने के बाद उनके पास बीजेपी के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हाल के दिनों में महाराष्ट्र और झारखंड में सत्ता गवाने के बाद बीजेपी नीतीश को लेकर नरम रुख अपना रही है। बीजेपी के पास भी नीतीश के कद का कोई नेता नहीं है। इसका फायदा उठाकर नीतीश एक बार फिर से सत्ता की कुर्सी पाने की जुगत में हैं।

वहीं, राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर को यह भलीभांति पता है कि नीतीश को लेकर आम लोगों के बीच भारी गुस्सा है। नीतीश से बिहार में रहने वाले औैर बाहर रहने वाले खुश नहीं है। नीतीश और लालू के शासन में बिहारी आवाम को अब बड़ा अंतर नहीं लग रहा है। बिहार में लंबे समय तक शासन करने के बाद भी नीतीश कुमार बड़ा बदलाव नहीं कर पाएं हैं। संविदा शिक्षकों के हाथ में शिक्षा व्यवस्था चौपट हो गई है।

स्वास्थ्य और विकास का उनका मॉडल किसी से छूपा नहीं है। पटना में बारिश के पानी से क्या हाल हुआ यह पूरी दुनिया देखी ही है। नए उद्योग लगाने की उनकी नीति ठंडे बस्ते में है। प्रशांत किशोर को शायद यह भी भान है कि नीतीश ने वो सब कुछ बड़े सधे तरीके से किया जो लालू प्रसाद नहीं कर पाएं। चाहे वो सरकारी योजनाओं का अधिकतम फंड नालंदा और बाढ़ क्षेत्र में खर्च करने का हो या बिहार सरकार के नौकरी में एक वर्ग विशेष और स्थान विशेष को महत्व देने का। एक बिहारी होने के नाते पीके अच्छी तरह से बिहारी राजनीति को समझ रहे हैं।

इस सब के बावजूद नीतीश कुमार सत्ता पर शायद इसलिए काबिज हैं कि बिहारी अवाम के सामने विकल्पहीनता की स्थिति रही है। लालू राज से सहमी अगड़ी जाति चाह कर भी लालू परिवार को सत्ता सौपने को तैयार नहीं है। हाल के दिनों में लालू परिवार के अंदर मचा कोहराम भी आने वाले चुनाव में असर डाल सकता है। वहीं, बीजेपी को भी झारखंड की तरह बिहार से झटका लग सकता है।

ऐसे में प्रशांत किशोर अपने लिए बिहार की राजनीति में एक बड़ा अवसर के तौर पर देख रहे हैं। हाल के दिनों में सीएए को लेकर उन्होंने खुलकर कांग्रेस और सोनिया गांधी की तारीफ की है। नीतीश कुमार को भी इस मुद्दे पर खड़ी-खड़ी सुनाई है। ऐसे में बहुत संभव है कि इसी साल के अंत में बिहार विधानसभा के चुनाव में प्रशांत किशोर कांग्रेस पार्टी के बड़े चेहरे के रूप में उभरे। वैसे भी कांग्रेस पार्टी के पास कोई बड़ा चेहरा बिहार में नहीं है।

इसका फायदा उठाकर प्रशांत किशोर एक नई रणनीति के साथ बिहार में कदम रह सकते हैं। वह अपने को भजपा, जेडीयू और आरजेडी के विकल्प के तौर पर पेश कर सकते हैं। वैसे भी पिछले 30 साल से जनता आरजेडी और जेडीयू को देख चुकी है। ऐसे में बड़े बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

हालांकि, राजनीति को क्रिकेट की तरह अनिश्चितताओं का खेल कहा जाता है। इसलिए अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगा लेकिन इतना जरूर है कि इस साल के अंत होने वाले चुनाव में अभी 10 महीने का समय है। अगर, इस अवधि में राजनीतिक रणनीतिकार पीके नए एजेंडे के साथ बिहार चुनाव में उतरते हैं तो बड़े उलटफेर करने में वह सफल हो सकते हैं। अब यह तो वक्त ही बताएगा कि ऊंट किस करवट बैठेगा।


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