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आभासी यथार्थ के दौर में भारतीय पत्रकारिता

आभासी यथार्थ के दौर में भारतीय पत्रकारिता

मुशर्रफ़ अली मैं यथार्थ हूँ, मुझे पकड़कर, छूकर देखा, महसूस किया जा सकता है लेकिन आईने में नज़र आ रही मेरी छवि को छुआ या पकड़ा नही जा सकता। यह आभासी यथार्थ है। आइने के सामने से हटते ही मेरा वजूद तो...

17 July 2021 1:15 PM IST
सादगी और चाहत नहीं पता कि मेरी चाहत की इंतेहां क्या होगी

"सादगी" और "चाहत" नहीं पता कि मेरी चाहत की इंतेहां क्या होगी

बस ये जो हमारी सांसे हैं तुम पर ही फना होगी...

16 July 2021 2:54 PM IST