राधा रानी – प्रेम की परिभाषा और भक्ति की आत्मा
राधा रानी का जन्म भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को हुआ था। राधा रानी को भक्ति की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है।;
अरुण मिश्रा, पत्रकार : भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में यदि प्रेम और भक्ति का सबसे ऊँचा स्वरूप खोजना हो तो वह राधारानी के रूप में दिखाई देता है। वे केवल एक देवी या श्रीकृष्ण की प्रेयसी नहीं, बल्कि अनंत प्रेम और समर्पण का शाश्वत प्रतीक हैं।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
राधारानी का जन्म भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को हुआ था। व्रज की पावन धरती बरसाना पर जब वे अवतरित हुईं तो समस्त गाँव आनंदित हो उठा। वृषभानु जी और माता कीर्ति के घर यह अद्भुत कन्या आईं, जिनकी सुंदरता और तेज देखकर सभी चकित रह गए। जन्म के समय राधारानी ने आँखें नहीं खोलीं। किंवदंती है कि उन्होंने पहली बार अपनी पलकें तब खोलीं जब नंदलाल कृष्ण उनके सामने आए। यह तथ्य दर्शाता है कि उनका जीवन कृष्ण से ही पूर्ण था।
व्रज की शोभा
बचपन से ही राधारानी असाधारण थीं। उनका स्वभाव अत्यंत विनम्र और हृदय दयालु था। व्रज की गोपियाँ उन्हें अपनी अगुआ और सखी मानती थीं। उनकी हँसी से वातावरण पवित्र हो जाता और उनके चलने से जैसे धरती पर पुष्प खिल उठते।
राधा-कृष्ण का अलौकिक प्रेम
राधा और कृष्ण का प्रेम संसार के साधारण रिश्तों से परे है। यह कोई सांसारिक आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा का दिव्य मिलन है। श्रीकृष्ण की बांसुरी जब गूँजती, तो सबसे पहले राधा का हृदय उसमें बंध जाता। कृष्ण की लीलाओं में राधा का स्थान सर्वोच्च रहा। यही कारण है कि श्रीकृष्ण का नाम भी सदैव राधा के नाम से पहले लिया जाता है – राधा-कृष्ण।
उनका प्रेम हमें यह सिखाता है कि सच्चा स्नेह अपेक्षा नहीं करता, केवल समर्पण चाहता है। राधारानी ने अपने जीवन से यह दिखाया कि ईश्वर को पाने का मार्ग प्रेम और भक्ति से होकर गुजरता है।
भक्ति का आदर्श
राधारानी को भक्ति की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। संत कवि सूरदास, मीराबाई और रसखान जैसे भक्तों ने राधा के प्रेम को भक्ति की चरम सीमा बताया है। जब भक्त ‘राधे-राधे’ कहते हैं, तो उनके भीतर स्वतः ही कृष्ण का स्मरण जाग उठता है। वास्तव में, राधा का नाम जपना ही ईश्वर की ओर पहला कदम है।
बरसाना और वृंदावन की महिमा
आज भी बरसाना और वृंदावन की गलियाँ राधा-कृष्ण की लीलाओं की साक्षी हैं। बरसाना का श्रीजी मंदिर और राधा-कुंड अनगिनत भक्तों के लिए आस्था का केंद्र हैं। जो वहाँ जाता है, वह उनके प्रेम और करुणा की अनुभूति किए बिना नहीं लौटता।
राधारानी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि प्रेम का सच्चा रूप निस्वार्थ होता है और भक्ति का सर्वोच्च साधन समर्पण है। जब तक हृदय में राधा का भाव नहीं है, तब तक कृष्ण की प्राप्ति अधूरी है।
इसीलिए भक्तजन कहते हैं –
“राधे बिना श्याम अधूरे हैं, और भक्ति बिना राधा निष्फल है।”
(लेखक 'स्पेशल कवरेज न्यूज़' में सहायक संपादक हैं)