जन्मदिन विशेष : कुंवर बेचैन साहब
वाजश्रवा के बहाने' में उनकी कुछेक पंक्तियाँ इसी सहजता को दर्शाती हैं...;
कुँवर नारायण न सिर्फ आम जन के कवि हैं बल्कि उतने ही सहज भी। 'वाजश्रवा के बहाने' में उनकी कुछेक पंक्तियाँ इसी सहजता को दर्शाती हैं-
"कुछ इस तरह भी पढ़ी जा सकती है
एक जीवन दृष्टि
कि उनमें विनम्र अभिलाषाएँ हों
बर्बर महत्वाकांक्षाएँ नहीं
वाणी में कवित्व हो
कर्कश तर्क-वितर्क का घमासान नहीं
कल्पना में इन्द्रधनुषों के रंग हों
ईर्ष्या देश के बदरंग हादसे नहीं
निकट संबंधों के माध्यम से बोलता हो पास-पड़ोस
और एक सुभाषित, एक श्लोक की तरह
सुगठित और अकाट्य हो
जीवन विवेक..."