"दिल्ली है दिलवालों की मुम्बई है पैसे वालों की", जानिए दिल्ली में क्या क्या खो गया?

Update: 2021-01-06 10:17 GMT

रामभरत उपाध्याय 

दिल्ली,देश की राजधानी व उत्तर भारत का ऐतिहासिक शहर। बचपन से ही स्कूल, आसपड़ोस व टेलीविजन ने दिल्ली का गुणगान शुरू कर दिया था।खेल-खेल में अनगिनत बार गाया होगा,"दिल्ली है दिलवालों की मुम्बई है पैसे वालों की"।

दूरदराज के छोटे से गांव के बच्चों में बड़े शहरों की चकाचौंध,वहां के वाशिंदों की लाइफस्टाइल व सोचविचार के प्रति कौतूहल होना लाजिमी है। मेरा तो ये कौतूहल कॉलेज लाइफ तक बना रहा और उसका कुछ अंश अब भी कायम है।

देहातियों के शहर की तरफ कूच करने के मुख्य कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार व कभी कभी पर्यटन होता है। लगभग एक दशक से मेरा भी महीने दो महीने में एक बार दिल्ली आना जाना लगा रहा। प्रत्येक राउंड में मेरी दिल्ली को समझने की गति थोड़ा-थोड़ा बढ़ती रही है। फिर भी मैं कुछ सड़कों, कुछ बस्तियों, कुछ बाजारों के नाम के अलावा कुछ खास नहीं जान सका।

दिल्ली को और बेहतर जानने में दोस्तों के कुछ प्रसंगों व अपने गुरु अनिल शुक्ल द्वारा बताये गए पत्रकारिता जीवन के किस्सों ने बहुत मदद की है। लेकिन अब पिछले दो माह से "गिफ्ट स्टोरी" के तहत मैं दिल्ली में रहकर दिल्ली को करीब से जानने का प्रयास कर रहा हूँ।

अपने वर्तमान ठिकाने नोएडा से अक्सर मेरा दिल्ली के विभिन्न बाजारों में बाइक से आना जाना रहता है। आते जाते समय मैं खूब सारा सीखने समझने के मूड में बना रहता हूँ। कभी कभी ऊंचे-ऊंचे फ्लाईओवरों से चमचमाती गगनचुंबी इमारतों को निहारने पर लगता है कि कितने सुख,दुःख, उम्मीदों, भय, लालसा को लेकर अनेकों लोग इन पिजड़ों में बंद हैं। हालांकि ऐसा कतई नहीं हैं कि दिल्ली में पेड़ पौधों व हरियाली की कोई कमी हो। पर्यावरण से समृद्ध होने पर भी यहाँ के निवासी इसका लाभ लेने का प्रयास नहीं करते।अपने दैनिक जीवन की आपाधापी से ऊबकर यहाँ अधिकतर लोग प्रकृति का सहारा ना लेकर नशे या इंटरनेट की दुनियां में विचरण करते हैं।

रिश्तों में आपसी समझ, खुलापन व आजादी पर्याप्त यहाँ है जिसका अभाव ग्रामीनक्षेत्रों में प्रायः देखा जा सकता है। धर्म,जाति, वर्ग या लिंग के भेद व पाखण्ड अनावश्यक रूप से कम ही यहाँ दिखते हैं। पिछले दो दशकों से दिल्ली मनमौजी तरीके से बढ़ती भी जा रही है। पड़ौसी राज्य उत्तर प्रदेश के मेरठ, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर (नोएडा), ग्रेटर नोएडा, बुलंदशहर, बागपत, हापुड़ और मुजफ्फरनगर; और हरियाणा के फरीदाबाद, गुड़गांव, मेवात, रोहतक, सोनीपत, रेवाड़ी, झज्जर, पानीपत, पलवल, महेंद्रगढ़, भिवानी,जींद और करनाल जैसे जिले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में शामिल हो चुके हैं।

पुरानी दिल्ली का चांदनी चौक एरिया व्यवसायियों का प्रिय बाजार है।

खरीदारी के लिए यह सबसे उपयुक्त स्थान है। भारी जनसंख्या वाला यह बाज़ार तीन शताब्दियों से अधिक समय से मौजूद है, जहां तुर्की, चीन और हॉलैण्ड तक से व्यापारी आया करते थे। यहां से आप कलाकृतियां और स्मृतिचिह्न खरीद सकते हैं। दरीबा कलां अपने मोतियों, सोने और चांदी के आभूषणों तथा इत्र (प्राकृतिक सुगंधियां) के लिए जाना जाता है। इत्र के प्रसिद्ध निर्माता और निर्यातक गुलाब सिंह जौहरी मल, इस बाज़ार में 1819 में आए थे। मसालों के शौकीनों को खारी बावली अवश्य जाना चाहिए - मत भूलें कि यह मसाले ही थे जिन्होंने भारत को पश्चिम से रूबरू कराया था। ज़री और ज़रदोजी की गोटा-किनारी और पन्नियों के लिए किनारी बाज़ार उपयुक्त स्थान है। कटरा नील के कपड़ा बाज़ार में हर प्रकार का कपड़ा जैसे सिल्क, सेटिन, क्रेप, कॉटन और मसलिन खरीदा जा सकता है। भगीरथ पैलेस बिजली के सामान की एशिया की सबसे बड़ी मार्किट है, साथ ही यहां डाक्टरी उपकरण और एलौपैथिक दवाएं भी मिलती हैं। मोती बाज़ार शालों और मोतियों के काम के लिए प्रसिद्ध है तो तिलक बाज़ार केमिकल के लिए।

नई सड़क: पुरानी दिल्ली स्थित नई सड़क पुस्तकों के लिए प्रसिद्ध हैं। चांदनी चौक की मुख्य सड़क को यह बाज़ार चावड़ी बाज़ार से जोड़ता है, नई सड़क पर अनेक थोक तथा खुदरा दुकानें हैं, जहां कॉलेजों और स्कूलों की पाठ्यपुस्तकें मिलती हैं। प्रख्यात परांठेवाली गली से थोड़ा बाएं मुड़ते ही आप नई सड़क पहुंच जाएंगे। यहां आपको केवल स्टेशनरी बेचने वाली दुकानें खूब मिलेंगी। यह बाज़ार रविवार के दिन बंद रहता है।

चोर बाज़ार: लाल किले और लाजपत राय मार्किट के समीप स्थित चोर बाज़ार का शाब्दिक अर्थ "थीव्स मार्किट" है। यहां आपको इलेक्ट्रॉनिक आइटम से लेकर हर चीज़ मिल सकती है। मूल्य आश्चर्यजनक रूप से कम होते हैं किंतु यह गारंटी नहीं मिल सकती कि उत्पाद कितने दिन चलेगा। आपको मौखिक आश्वासन तथा अपने स्वयं के निर्णय पर निर्भर होना पड़ेगा।

छत्ता चौक: छत्ता चौक बाज़ार, 17वीं शताब्दी में बना था, जो घूंघट में रहने वाली महिलाओं के लिए था। यह लाल किले की ओर जाने वाली पूरी सड़क पर लगा करता था, जहां खानाबदोश व्यापारी अपना सामान लगाते और बेचकर चले जाया करते। वहां आने वाली महिलाएं अपने पसंद की खरीदारी करती और कोई उन्हें देख भी न पाता था। आज, इस बाज़ार में 40 के करीब दुकानें हैं, जहां आर्टिफिशियल और सेमी-प्रेशियस ज्वैलरी, कढ़ाई वाले बैग, हाथ से छपी वॉल-हैंगिंग और संदिग्ध प्रामाणिकता वाली 'एंटिक' वस्तुएं बिकती है।

दरियागंज बुक मार्किट: चाहे कोई सर्वाधिक बिकने वाली किताब हो, या आउट-ऑफ-प्रिंट किताब हो, दिल्ली किताबें खरीदने वालों का लोकप्रिय स्थान है। एक किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला दरियागंज का पुराना पुस्तक बाज़ार, अक्सर दुनिया का सबसे बड़ा साप्ताहिक पुस्तक बाज़ार माना जाता है। यह बाज़ार प्रत्येक रविवार को लगता है।

यहां अधिकांशतः उपयोग की गई पुस्तकें मिलती हैं। कम मूल्य के अलावा, व्यापक वैरायटी की आउट-ऑफ-प्रिंट पुस्तकें, कठिनाई से मिलने वाली पुस्तकें खरीदारों को यहां खींच लाती हैं। फिक्शन से लेकर मेडिकल साइंस, आर्किटेक्चर से कुकरी, कॉमिक्स से लेकर एटलस, क्लासिक्स से लेकर मैग्ज़ीन और मेनेजमेंट से लेकर विभिन्न रुचियों वाली तथा विभिन्न नामों व शैलियों वाली पुस्तकें यहां मिलती हैं।

दिल्ली को बेहतर समझने में डूडल आर्टिस्ट सैफ असलम खान का मुझे काफी सहयोग मिल रहा है। दिल्ली के प्रति उनकी दीवानगी देखते ही बनती है। आगे की कढ़ी में दिल्ली के हौज खास, लाजपत नगर, सदर बाजार, दिल्ली हाट, फ्रेंड्स कॉलोनी,लुटियंस दिल्ली से मुखातिब हो सकेंगे,तब तक के नमस्कार!💐

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