कुंवर बेचैन की चुनिंदा श्रेष्ठ गजलें...

Update: 2021-07-01 13:22 GMT

कफन बाँध कर अपने सर से

निकले हैं फिर आँसू घर से

राहों में इस्पाती पहिये

गुज़र गए जब तब ऊपर से

अपने साथ चला है जीवन

शव को बाँधे हुए कमर से

लौटी हैं कुछ बंद फ़ाइलें

हम कब लौटे हैं दफ्तर से

नीला बदन हुआ सपनों का

किसके विष के तेज़ असर से

2)

खुद को नज़र के सामने ला कर ग़ज़ल कहो

इस दिल में कोई दर्द बिठा कर गज़ल कहो

अब तक तो तुमने मैक़दों पै ही ग़ज़ल कही

होंठों से अब यह जाम हटा कर गज़ल कहो

दिन में भी दूर-दूर तलक रोशनी नहीं

अब तुम ही अपने दिल को जला कर गज़ल कहो

पूरी ही ग़ज़ल दिल की इबादत है दोस्तों!

अश्कों में ज़रा तुम भी नहा कर गज़ल कहो

दिल में न अगर आए तुम्हारे कोई 'कुंअर'

तो तुम ही किसी के दिल में समा कर ग़ज़ल कहो

3)

दोनों ही पक्ष आए हैं तैयारियों के साथ

हम गरदनों के साथ है वो आरियों के साथ

बोया न कुछ भी ओर फ़सल ढूँढ़ते हैं लोग

कैसा मज़ाक चल रहा है क्यारियों के साथ

तुम ही कहो कि किस तरह उसको चुराऊँ मैं

पानी की एक बूँद है चिनगारियों के साथ

सेहत हमारी ठीक रहे भी तो किस तरह

आते हैं घर हक़ीम भी बीमारियों के साथ

4)

मत पूछिए कि कैसे सफ़र काट रहे हैं

हर साँस एक सज़ा है मगर काट रहे हैं

ख़ामोश आसमान के साये में बार-बार

हम अपनी तमन्नाओं का सर काट रहे हैं

कमज़ोर छत से आज भी एक ईंट गिरी है

कुछ लोग हैं कि फिर भी गदर काट रहे हैं

आधी हमारी जीभ तो दाँतों ने काट ली

बाकी बची को मौन अधर काट रहे हैं

दो चार हादसों से ही अख़बार भर गए

हम अपनी उदासी की ख़बर काट रहे हैं

हर गाँव पूछता है मुसाफ़िर को रोक कर

हमने सुना है हमको नगर काट रहे हैं

इतनी ज़हर से दोस्ती गहरी हुई कि हम

ओझा के मंत्र का ही असर काट रहे हैं

कुछ इस तरह के हमको मिले हैं बहेलिये

जो हमको उड़ाते हैं न पर काट रहे हैं 


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