कबीर दास जयंती पर विशेष ...

कबीर के बारे में कहा जाता है कि उनमें बुद्धि थी लेकिन शास्र के बारे में ज्ञान नहीं था। कहीं कहीं ऐसा लगता भी है, जब कबीर किसी खंडन-मंडन का मजाक उड़ाते हैं;

Update: 2021-06-24 11:23 GMT

निर्गुण काव्यधारा में कबीर की अहम भूमिका रही है। कबीर के बारे में कहा जाता है कि कबीर की भाषा में साहित्यिकता नहीं थी उनके छंद आधे-अधूरे और उटपटांग बताए गए थे, उसके बावजूद जनता ने उन्हें स्वीकार किया। न केवल स्वीकार किया, बल्कि उन्हें विशेष प्रसिद्धि भी दी।

इसका कारण यह भी है कि कबीर का युग वह था जब पंजाबी, फारसी, हिंदवी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी सहित उत्तर भारत की भाषाएं अपना-अपना रूप निर्माण कर रही थी । इन भाषाओं का स्थान-भेद हिंदी के रूप में परिवर्तित हो रहा था।

डॉक्टर सिद्धि नाथ तिवारी ने कबीर की भाषा के भदेसपन का विवेचन करते हुए लिखा - कि, जब हम उनकी "आखनि देखी" बातों में आगे बढ़ते हैं तो ऐसा लगता है कि कबीर भाषा का सरल पद छोड़कर रुखड़े मार्ग पर यात्रा कर रहे हैं"

कबीर की भाषा के खरेपन की मिठास की चर्चा करते हुए डॉक्टर श्यामसुंदर दास लिखते हैं, कहीं-कहीं कबीर की भाषा बिल्कुल गँवारू लगती है, उनकी बातों में खरेपन की मिठास है, जो उन्हीं की विशेषता है और किसी की नहीं और कबीर का यही गुण है जिसके सामने यह गंँवारूपन डूब जाता है"

कबीर का रहस्यवाद बहुत रोचक है। रहस्यवाद की एक शाखा है सिद्धावस्था। यह वो स्थिति है जब आत्मा परमात्मा का एकीकरण हो जाता है। जिसे सूफी संत "फना" कहते हैं। कबीर की रचनाओं में ज्ञान, अनुभूति और कल्पना तीनों का मिश्रण है। कबीर के कवि होने पर भी विवाद है, यदि हम यह मान भी लें कि, कविता करना कबीर का लक्ष्य नहीं था परंतु इतना तो निश्चित है कि इन अनुभूतिपूर्ण और प्रभावशाली उक्तियों के कारण ही समालोचना के क्षेत्र में यह लोकोक्ति चल पड़ी -- "तत्व तत्व कबीरा कही"

कबीर के बारे में कहा जाता है कि उनमें बुद्धि थी लेकिन शास्र के बारे में ज्ञान नहीं था। कहीं कहीं ऐसा लगता भी है, जब कबीर किसी खंडन-मंडन का मजाक उड़ाते हैं तो उनकी काव्य शक्ति उनका साथ छोड़ने लगती है। इससे प्रतीत होता है कि कबीर कवि की अपेक्षा, समन्वयवादी  समाज-सुधारक अधिक थे। डॉ राम रतन भटनागर ने ठीक ही लिखा है कि, "कबीर ने समाज सुधार का नहीं, बल्कि जीवन गढ़ने का काम किया है"

कबीर ने समाज की अपेक्षा व्यक्ति के सुधार की बात की ।कबीर ने कहा कि, जब व्यक्ति सुधरेगा तो समाज खुद सुधर जाएगा। आज जो लोग साम्यवादी दृष्टिकोण की बातें करते हैं, उन्हे कबीर से सीखना चाहिए। कबीर व्यक्तिवाद को साम्यवादी दृष्टिकोण से देखते थे, ना कि आज पूरे एक गिरोह की तरह...

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