आखिरकार कब तक गंग नहर में वाहन गिरने के कारण बुझते रहेगें यूं घरों के चिराग!

Update: 2021-03-11 13:15 GMT

भारत में अधिकांश वाहन चालकों की सोच है कि जिस सड़क पर वाहनों का दवाब कम हो वह खुद को सुरक्षित व टेंशन फ्री रखने के लिए उस सड़क पर यात्रा करने को तरजीह देते हैं, लेकिन हमारे देश के सिस्टम की सोच यह है कि वो वैकल्पिक मार्गों को भगवान के भरोसे छोड़कर चुपचाप ऑफिस में बैठ जाता है। अक्सर देखने में आता है कि इस तरह के वैकल्पिक मार्गो पर सरकारी तंत्र के द्वारा सुरक्षा व चिकित्सा के इंतजाम ना होने के कारण दुर्घटना होने के हालात में वाहन में यात्रा करने वाले सभी लोगों की जानमाल पर बहुत बड़ा खतरा बन जाता है। वैसे भी वैकल्पिक मार्गों पर जब कभी अचानक से वाहनों की भीड़ हो जाती है तो वाहनों की सुरक्षा के इंतजाम ना होने की वजह से दुर्घटना घटित होने की बहुत अत्याधिक संभावना बन जाती है। अगर हम लोग विचार करें तो भारत में सड़क हादसों में होने वाली मौतों के आंकड़े सभी जिम्मेदार देशवासियों को एकदम से झकझोर कर चौंकाते हैं। हर वर्ष लाखों लोग सड़कों पर असमय काल का ग्रास बनकर अपने प्यारें परिजनों को रोता बिलखता छोड़कर अचानक दुनिया से चले जाते है। भारत में प्रत्येक दिन 414 लोग सड़क पर होने वाले विभिन्न हादसों में मौत का एक ही पल में शिकार बन जाते हैं, भारत में इस स्थिति को देखकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने वर्ष 2030 तक सड़क हादसों में मरने और घायल होने वालों की संख्या को घटा कर आधा करने का लक्ष्य रखा है, वहीं केन्द्र सरकार इस लक्ष्य को पांच साल पहले यानी वर्ष 2025 तक ही हासिल करने की दिशा में धरातल पर लगातार ठोस पहल कर रही है। सड़क पर वाहन चलाते समय यातायात के नियमों की अनदेखी वाहन चालकों के खुद व अन्य लोगों के लिए जानलेवा बन जाती है। हालांकि उसको रोकने के लिए भारत सरकार ने नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों से अच्छी खासी मोटी धनराशि का जुर्माना चालान करके वसूलना शुरू कर रखा है, लेकिन फिर भी धरातल पर स्थिति ढ़ाक के वही तीन पात बनी हुई है, चालान व दुर्घटनाओं का ग्राफ देखकर लगता है कि धरातल पर अभी भी हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं, आयेदिन खूनी सड़कों पर घरों के चिराग बुझ रहे हैं। सरकार ने इसके लिए आम जनमानस को सड़क पर वाहन चलाते समय सुरक्षा के सभी जरूरी उपायों के बारे में जागरूक करने के उद्देश्य से और सड़कों पर आयेदिन होने वाली दुर्घटनाओं की भारी संख्याओं में कमी लाने के उद्देश्य से "सड़क सुरक्षा सप्ताह" की जगह "सड़क सुरक्षा माह" का इस वर्ष आयोजन किया है। लेकिन कुछ लोग है कि फिर भी सड़कों पर वह खतरों का खिलाड़ी बनने के प्रयास में अपने व दूसरों के जानमाल का नुकसान कर ही बैठते हैं। वैसे तो भारत में सड़क दुर्घटनाओं के लिए बहुत सारे कारक जिम्मेदार है, लेकिन सड़क निर्माण में इंजीनियरिंग की त्रुटि, वाहन चलाने में हम लोगों की भयंकर लापरवाही, कौनसा वाहन किस तरह के मार्ग पर चलाना है उसकी जानकारी का अभाव, नशा करके वाहन चलाने की आदत, खस्ताहाल खटारा गाड़ियों की वजह से तकनीकी समस्या के कारण, मानवीय भूल और सड़कों पर वाहन चालकों की सुरक्षा के लिए अच्छे इंतजाम ना होने या कुछ जगह पर बिल्कुल भी इंतजाम ना होने की कीमत लोगों को अपनी अनमोल जान देकर चुकानी पड़ रही है। आकड़ों के अनुसार हर वर्ष बहुत बड़ी संख्या में लोग सड़क दुर्घटनाओं में असमय काल का ग्रास बन रहे हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2019 में देश में 4.49 लाख सड़क दुर्घटना हुई थी, इन दुर्घटनाओं में 4.51 लाख लोग घायल हुए और 1.51 लाख लोगों की असमय मौत हो गई थी, इस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में रोजाना 1,230 सड़क दुर्घटनाएं होती हैं,

आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2018 में 1.52 लाख लोगों की मौत हुई थी, जबकि वर्ष 2017 में यह आंकड़ा 1.5 लाख लोगों का था। सड़क हादसों में मारे गए लोगों में से 54 प्रतिशत हिस्सा दुपहिया वाहन सवारों और पैदल चलने वालों का है, यानी देश में नई आधुनिक सड़कों के निर्माण और ट्रैफिक नियमों के बेहद कड़ाई से पालन की तमाम सरकारी कवायद के बावजूद दुर्घटनाओं के इन आंकड़ों पर कोई विशेष अंतर नहीं पड़ा है। सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं में ना जाने कितने परिवारों के चिराग एक ही पल में बुझ जाते हैं। यही स्थिति उत्तराखंड के हरिद्वार से निकल कर उत्तर प्रदेश आने वाली गंग नहर की पटरी पर बनी सड़क पर उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश में बनी हुई है। जबकि गंग नहर की इस पटरी पर कुछ समय पहले ही नई बेहतरीन सड़क का निर्माण हुआ है, लेकिन गंग नहर में गिरने से वाहनों को बचाने के लिए नाम मात्र के सुरक्षा इंतजाम किये गये हैं, जिसकी वजह से गंग नहर मार्ग पर आयेदिन घरों के चिराग दुर्घटना के चलते बुझ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ रोड़ पर रैपिड रेल का काम बहुत तेजी से चलने के कारण वाहनों के भारी दवाब की वजह से गाजियाबाद से मेरठ के बीच हर वक्त जाम लगा रहता है, वाहन चालकों के द्वारा जाम से बचने के कारण व टोल बचाने के लालच के चलते गंग नहर मार्ग पर खतौली तक तो ट्रैफिक का भारी दवाब दिन-प्रतिदिन बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है, मेरठ के सरधना पुल पर तो पीक ऑवर्स में बहुत देर तक जाम में वाहन फंसे रहने लगे हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जिस गंग नहर की पटरी पर सुरक्षा के मद्देनजर केवल हल्के वाहन चलने चाहिए थे, उस पर आजकल भारी भरकम ट्रोला, हाईवा, डम्पर, यात्री बस आदि जैसे यात्री व मालवाहक वाहन बैखौफ होकर अंधाधुंध तेज तफ्तार में दोड़ रहे हैं और हमारे देश का सिस्टम आराम से ऑफिस में बैठकर बड़ी दुर्घटना घटित होने का इंतज़ार कर रहा है। इस मार्ग पर जिस ढंग से किसी वाहन को बचाने के चक्कर में आयेदिन दुर्घटनाग्रस्त होकर वाहन गंग नहर में एक ही क्षण में सुरक्षा के प्रर्याप्त उपाय ना होने के कारण अचानक गिर जाते हैं, वह स्थिति हमारे समाज के लिए बेहतर नहीं है। रेपिड रेल के निर्माण कार्य की वजह से जिस तरह से गाजियाबाद जनपद में गंग नहर की पटरी पर ट्रैफिक बढ़ने से दुर्घटनाओं का ग्राफ बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है , वह बेहद चिंतनीय है, यहां पर आयेदिन वाहनों का गंग नहर में गिरना अब आमबात होती जा रही है, हर वर्ष अनेक घरों के चिराग गंग नहर की पटरी पर होने वाली वाहन दुर्घटनाओं में एक ही पल में बुझ जाते हैं, लेकिन अफसोस की बात यह है कि फिर भी सिचांई विभाग, पीडब्ल्यूडी और अन्य संबंधित जिम्मेदार विभाग आपस में तालमेल करके वाहनों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम उठाने में नाकाम है, इस मार्ग पर आयेदिन पत्थर दिल को भी बुरी तरह झकझोर देने वाले हादसे घटित होते रहते है और हमारा सिस्टम हादसा होने के बाद इस से संबंधित सभी विभागों के साथ मीटिंग करके गंग नहर की पटरी पर सुरक्षा के लिए लंबी चौडी योजना बनाते हैं, लेकिन घटना के कुछ दिन बीतने के बाद हालात फिर वही "ढ़ाक के तीन पात" हो जाते है, हमारे सरकारी सिस्टम के सारे दावे हवा हवाई बनकर हवा में उड़ जाते हैं।

"हाल ही के दिनों में थाना मुरादनगर के अन्तर्गत गंग नहर पर दिल को झकझोर देने वाली ऐसी ही एक घटना घटित हुई, 21 फरवरी रविवार के दिन दोपहर 1.40 से 2.0 बजे के बीच गंग नहर की पटरी पर मुरादनगर से मसूरी की तरफ जाते हुए रेलवे लाईन से चंद कदम आगे गाजियाबाद जनपद के बेहद प्रतिष्ठित परिवार राजेंद्र त्यागी (मंडौला वालों) के छोटे पुत्र 36 वर्षीय युवा समाजसेवी तरूण त्यागी की गाड़ी गंग नहर में गिर जाने से उनका आकस्मिक निधन हो गया था, जबकि तरूण त्यागी को दुर्घटना के चंद मिनटों के बाद ही अपनी पत्नी के साथ बीमार बेटी को मेरठ से दिखाकर बाईक पर वहां से गुजर रहे पिपलेहड़ा गांव के जाब़ाज युवक आमेर अली ने अपनी व अपने परिवार की चिंता किये बिना, एक भी क्षण गवायें बिना तत्काल नहर में कूद कर तरूण त्यागी को कार से निकालकर बचाने का भरकस प्रयास किया था, लेकिन अफसोस गंग नहर की विकट परिस्थितियों में किसी और व्यक्ति का समय पर सहयोग ना मिलने के चलते जाब़ाज आमेर अली अकेले तरूण त्यागी को गंग नहर से निकाल कर बचा पाने में नाकाम रहे, लेकिन जाब़ाज युवा आमेर अली यह प्रयास बेहद सराहनीय है और वह उसके लिए बधाई व दिल से सम्मान के पात्र हैं कि उन्होंने ने बेहद विकट परिस्थितियों में भी हिम्मत हारे बिना अपनी जान की चिंता ना करते हुए खुद की जान की बाजी लगाकर तरूण त्यागी की जान बचाने का प्रयास किया था। हालांकि बाद में मुरादनगर थाना के थानाध्यक्ष अमित कुमार, गंग नहर पुल पर बनी जलालाबाद चौकी के इंजार्च कपिल कुमार, एसआई सोमपाल सिंह व रविन्द्र राठी ने सामंजस्य बिठाकर बहुत ही तेजी के साथ जिम्मेदारी दिखाते हुए तत्काल गोताखोर व हाईड्रा बुलाकर तरूण त्यागी को तुरंत गंग नहर में निकलवा कर नजदीक के अस्पताल ले जाने का और उनकी गाड़ी को थाने पहुंचाने का कार्य किया था, लेकिन फिर भी तरूण त्यागी की जान नहीं बच सकी थी। दुःख की बात यह है कि प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार एक जानवर को बचाने के चक्कर में यह घटना घटित हुई थी, घटनास्थल पर गंग नहर की पटरी पर सुरक्षा के बिल्कुल भी इंतजाम नहीं होने के कारण बहुत आराम से चल रही कार भी गंग नहर में अनियंत्रित होकर समा गयी, क्योंकि इस स्थल पर गंग नहर की पटरी पर वाहनों को नहर में गिरने से रोकने के कोई इंतजाम नहीं था, जिसकी वजह से एक परिवार का चिराग तरूण त्यागी एक ही पल में असमय काल का ग्रास बन गया।"

हालांकि ऐसे गंभीर हादसों के बाद पुलिस व उसके आला अधिकारी तो अपनी जिम्मेदारी पूर्ण ईमानदारी से निभाने के लिए तत्काल हरकत में दिखते हैं, लेकिन गंग नहर पर सड़क व सुरक्षा के लिए आवश्यक निर्माण कार्य करने के लिए उत्तरदायी सभी विभाग आराम से सोते हुए नजर आते हैं, उनको कुम्भकर्णी नींद से जगाने के लिए हम सभी लोगों को एकजुट होकर पहल करनी होगी, क्योंकि जब किसी घटना को लेकर के लापरवाही बरतने के आरोप में एक आम आदमी के खिलाफ मुकदमा दर्ज होकर कार्यवाही हो सकती है, तो गंग नहर की पटरी के रखरखाव के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ 'तरूण त्यागी' जैसे लोगों की गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज क्यों ना हो और जिम्मेदार विभाग से हर पीड़ित पक्ष को मुआवजा धनराशि क्यों ना दिलवायी जाये, शासन प्रशासन को इस पर तत्काल विचार करना चाहिए। वैसे भी कुछ जगह तो गंग नहर की पटरी पर रखरखाव के अभाव में अब कोई सुरक्षा के इंतजाम बचे ही नहीं हैं और बहुत सारी जगह पर अभी तक इंतजाम हुए ही नहीं है, विशेषकर मुरादनगर से मसूरी वाले टुकड़े पर तो स्थिति बेहद खतरनाक है। गंग नहर पटरी व सड़क से जुड़े विभागों के आपसी तालमेल के अभाव में आम लोगों की सुरक्षा कें संबंध में कोई ठोस निर्णय समय रहते धरातल पर नहीं हो पाता है। मुरादनगर से मसूरी की तरफ जाते समय गंग नहर पर वाहनों को नहर में गिरने से बचाने के लिए सुरक्षा की कच्ची या पक्की साइड़ वॉल तक जगह-जगह मौजूद नहीं है, पटरी पर कटान के कारण सड़क की चौडाई भी बहुत सारी जगह बेहद कम है, जिसके चलते एक ही पल में किसी के घर का चिराग बुझ जाता है। मुरादनगर से हरिद्वार की तरफ जाते समय तेज रफ्तार का कहर, बैखौफ होकर भारी यात्री व मालवाहक वाहनों का गंग नहर की पटरी पर दौड़ना व उस हिसाब से सुरक्षा के इंतजाम ना होने से आयेदिन लोग असमय काल का ग्रास बन रहे हैं, जबकि हालात यह हैं कि गंग नहर के आसपास की किसी भी पुलिस चौकी पर गोताखोरों के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर तक नहीं मिल पायेंगे, अभी चंद दिन पहले ही हरिद्वार में गंग नहर में गाड़ी गिरने से चार लोगों की मौत हो गयी थी, लेकिन देश व समाज के हित में अब सिस्टम के द्वारा विचार करने का समय आ गया हैं कि आखिरकार गंग नहर की पटरी को वह किस तरह से वाहनों के लिए सुरक्षित बनाकर लोगों के अनमोल जानमाल की सुरक्षा कर सकें और उनकी यात्रा को सुगम बनाया जा सकें। इसके लिये तत्काल उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश सरकार और गंग नहर से जुड़े सभी संबंधित सभी विभागों को तत्काल सामंजस्य बनाकर धरातल पर विस्तार से रूपरेखा बनाकर मानव के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए ठोस पहल करनी चाहिए।

।। जय हिन्द जय भारत ।।

।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

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