मतदाताओं को लुभाने के लिए गिरगिट की तरह बदलते चुनावी मुद्दों में अब शामिल हुये बेकाबू सांड!

आवारा पशु यानी सांड प्रदेश के शेष बचे चुनाव जीतने के लिये चुनावी नैया के खेवनहार बनते जा रहे हैं।

Update: 2019-04-28 03:05 GMT

भोलानाथ मिश्र वरिष्ठ पत्रकार

इधर लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के दौरान राजनीत का जो परिदृश्य हो जाता है उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है।चुनाव शुरू होते ही समय के साथ साथ चुनावी मुद्दे भी बरसाती मेंढक की तरह रंग बदलने लगते हैं। कहावत है कि-" जो रोगी के मन भावे वैद्य वही बात बतावे"। बिल्कुल इसी कहावत की तरह ही हमारे यहां जब चुनाव का समय आता है तो हमारे राजनेता भी वही बात करते हैं जो मतदाताओं के मन को लुभावने वाली होती है। आजकल चल रहे लोकसभा चुनाव के दौरान चुनावी मुद्दे गिरगिट की तरह रंग बदलते जा रहे हैं और पुराने मुद्दे पीछे छूटते और नए मुद्दे चुनावी महा समर में सामने आते एवं जुड़ते जा रहे हैं। चुनाव शुरू होने के पहले सरकार की योजनाओं के जो तमाम कार्य चुनावी मुद्दे बनने की चर्चा थी वह सब पीछे हटते और नए नए मुद्दे उभर सामने आने लगे है चाहे वह नोटबंदी जीएसटी राम मंदिर या फिर पुलवामा हमले की बात हो चाहे वह इस हमले के खिलाफ की गई सर्जिकल स्ट्राइक हो।




चुनाव शुरू होते ही पुराने मुद्दे पीछे और नए मुद्दे चुनावी रंगमंच की शोभा बढ़ाने लगे हैं और राम हनुमान की चर्चा पीछे हो गई है और उत्तर प्रदेश की राजनीति में गाय के बाद उनके वंश सांड चुनावी महासंग्राम में शामिल होने लगे हैं। आजकल विपक्ष सरकार के सारे पुराने मुद्दों को भुला कर सांड की सवारी कर चुनाव वैतरणी को पार करने की जुगत में जुड़ गया है और शेष बचे चुनावी चरणों के लिए सांड का सहारा लिया जाने लगा है। यह पहला अवसर है जबकि गो लोक से आई मानी जाने वाली गौ माता के कमाऊं बछड़े रूपी कमाकर खिलाने वाले सुपुत्र आवारा पशु कहे जाने लगे हैं। एक समय वह भी था जब की कहावत कही जाती थी कि-" या धन बाढ़ है नदी के काछा या धन वाढ़ै है गऊ के बाछा"। लेकिन आदिकाल से चली आ रही यह पुरानी कहावत समाप्त हो गई है और लोग गऊ के बछड़े को आवारा नक्कारा हरामखोर समझकर उसे अपने से दूर करने लगे हैं।


आवारा पशुओं की समस्या पैदा करने में किसानों मजदूरों गांव वालों को मात्र बदनाम किया जा रहा है जबकि जो आवारा पशु सड़कों पर घूम रहे हैं वह साधारण गांव घरों में पलने वाले पशु नहीं हैं बल्कि उच्च प्रजाति के यह बछड़े हैं और अधिकांश धन कमाने की आड़ में सरकारी मदद लेकर खोले गए गौशालाओं से जुड़े हैं। इस समय चुनाव में अब तक किसानों मजदूरों की हमदर्दी लेने के मुद्दे बने हुए थे लेकिन इधर तो इन बछड़ो को चुनावी सभाओं और रैलियों मैं खदेड़ कर इनका उपयोग किया जाने लगा है। अभी दो-तीन दिन पहले इटावा में और मैनपुरी में महागठबंधन की हुई जनसभाओं में इन बेचारे समय के मारे बछड़ा यानी साड़ का इस्तेमाल करके इन्हें चुनावी मुद्दा बना दिया गया है।




 इस समय महागठबंधन अखिलेश हो या बहन मायावती जी हो दोनों साड़ को मुद्दा बनाकर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास कर मतदाताओं का दिल जीतने में जुटे हुए हैं और दोनों सुप्रीमो का चुनावी राजनैतिक आरोप है कि भाजपा के यह सांड जानबूझकर उनकी जनसभाओं में उत्पात मचाने के लिए भेज जा रही हैं जबकि सत्ता दल भाजपा कहती है यह तो पशु हैं कहीं भी जा सकते हैं। कुछ भी हो आगामी लोकसभा चुनाव के महाभारत में सांड को जोड़कर मतदाताओं को उकसाने एवं लुभाने का कार्य शुरू हो गया है। कांग्रेस की सुपर स्टार एवं पार्टी की भविष्य मानी जाने वाली प्रियंका गांधी ने तो राजनीति में कदम रखते ही उत्तर प्रदेश के अपने दौरों के दौरान आवारा पशुओं का मामला उठा कर मतदाताओं की सहानुभूति लेने का दौर शुरू कर दिया था। आज वही आवारा पशु यानी साड़ प्रदेश के शेष बचे चुनाव जीतने के लिये चुनावी नैया के खेवनहार बनते जा रहे हैं।

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