वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को, कवि अरुणाभ सौरभ का भावुक पत्र..

किसी टीवी शो में या स्थानीय अखबार की कतरन बनने से भी कविता की किताब नहीं बिकती।आपने किसी कवि को पढ़ा या नहीं पढ़ा उससे न तो कवि पर फर्क पड़ेगा और न ही उनकी किताब पर..

Update: 2021-09-19 13:37 GMT

आदरणीय वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार जी, 

आप मुझे नहीं जानते! यह कोई बड़ी बात नहीं है। मैं भूखा-दूखा जनपद का एक मामूली सा कवि हूँ! जिसकी छोटी सी अपनी मामूली दुनिया है।

मेरे पात्र बेहद मामूली किस्म के हैं। मेरे पास दिव्य या भव्य कुछ भी नहीं है। हलाँकि कुछेक बार आइआइसी और आईएचसी और गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में आपसे मिलने का सौभाग्य मुझे प्राप्त है। पटना और दिल्ली के पुस्तक मेले में भी कुछेक भेंट आपसे हुई है। बीएचयू में 2014 में चुनावी रिपोर्टिंग के दौरान आप आए थे। आदरणीय रामाज्ञा सर के साथ मैत्री जलपान गृह में कई विद्यार्थियों से आपकी भेंट हुई थी। संयोग से उस दिन मैं भी वहाँ उपस्थित था।

आपसे जिक्र करना जरूरी समझता हूँ कि स्मृतिशेष आदरणीय रवीन्द्र कालिया जी के साथ विश्व पुस्तक मेला 2014 में हॉल नंबर 18 के बाहर आपसे छोटी-सी भेंट हुई थी। जिसमें कालिया जी ने परिचय करवाते हुए आपसे कहा था कि-"इस साल का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार इसी लड़के को दिया गया है।" मुझे आपकी स्नेहिल बधाई याद है! खैर, छोटी-छोटी मुलाकातें स्मृति में नहीं आ पातीं हैं। उस पर अतिरिक्त कुछ कहना मुझे आवश्यक नहीं लगता है। 2013-16 के बीच की लिखी कविताओं की मेरी किताब आती है 'किसी और बहाने से' ।यह मेरी पहली किताब नहीं है। इस संग्रह की सारी कविताएँ हिन्दी की लगभग सभी प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।

यथा- हंस, शुक्रवार, आलोचना, कथानक, नया ज्ञानोदय,पक्षधर और कई महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ जिनका नाम नहीं ले पा रहा। आलोचना का युवा कविता अंक जिसका संपादन अपूर्वानंद जी ने किया है, उसे भी देखा जा सकता है । आप भारत के एक सेलीब्रेटी हैं और मैं भारत का एक अदना-सा कवि। प्रतिदिन आप सैकड़ों-हजारों लोगों से मिलते होंगे इनमें से कितने लोगों को याद रखेंगे! अब जिस अखबार की कतरन ने आपका ध्यान खींचा है, उसपर थोड़ी चर्चा करना मैं आवश्यक समझता हूं सर!

किसी भी अखबार की ख़बर में 'शीर्षक' उससे सम्बन्धित लोग ही लगाते हैं सर! रही आपकी बात तो, इस ख़बर में यह कहा गया है कि एक कार्यक्रम में आपने मेरी किसी एक कविता का पाठ किया है। अब 2013-14 में याकि 15-16 में ये मुझे भी ठीक-ठीक याद नहीं पर मेरे कई मित्रों का कहना है कि बिहार से संबंधित मेरी पहले की लिखी एक कविता का कुछ अंश आपने किसी कार्यक्रम में उद्धृत किया है। पर 2013 में पढ़ी है या 2015 में या कब, यह कोई नहीं बता सकता है। मैं टीवी चैनल पर गाहे-बगाहे जाता हूँ।

मेरे ऊपर कुछेक चैनलों ने हाल में जो कार्यक्रम किए हैं, वह यूट्यूब पर उपलब्ध है। अब 2014-15 में दूरदर्शन या अन्य जगह पर जो कुछ मैंने कहा है वह भी मेरे पास नहीं है। यूट्यूब और सोशल मीडिया के अन्य प्लेटफॉर्म पिछले पाँच-छह वर्षों से ज्यादा सक्रिय हैं। उसके पहले यह सक्रियता नहीं थी। जरूरी नहीं कि मेरे पास 6-7 साल पहले के हरेक कार्यक्रम की लिंक संरक्षित हो। दूसरी बात कि मैं उतना महत्वपूर्ण नहीं हूँ कि पूरा कार्यक्रम मेरे ऊपर चले और जिसका लिंक भी मिल ही जाए।

मेरे कवि पर इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि किस पत्रकार ने मुझपर क्या लिखा, बोला है? यदाकदा आप स्वयं कई कवियों की कविताएँ साझा करते रहे हैं। यदि कल उन कवियों पर कोई दूसरा पत्रकार कुछ लिखे और जिसमें आपका संदर्भ हो तो, वह कवि जवाबदेह नहीं है। आप हिन्दी के एक जिम्मेदार पत्रकार हैं। आप महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं, करते रहिए। कविताओं की किताबें कितनी बिकती है,यह आपको भी पता है। उसकी धूम मैं नहीं मचा सकता। आपके या किसी भी पत्रकार के नाम के साथ जोड़कर खबर बनाने से कोई किताब नहीं बिक सकती। मुझे आपके या किसी पत्रकार के साथ नाम जोड़कर अपने प्रकाशक को लाभ दिलाने की कोई जरूरत या मंशा भी नहीं है। किताब ज्ञानपीठ से आई है। जिनका अपना विक्रय तंत्र है, जिनपर हम-आप अतिरिक्त प्रभाव नहीं बना सकते।

इस मुद्दे में यह बात दुःखद है कि अनावश्यक प्रभात खबर के उस स्थानीय पत्रकार और उनके संपादक पर निराधार आरोप लग रहे हैं,जो पत्रकार अहर्निश गरीब, मजदूर, वंचित, पीड़ितों की आवाज है और आपके करीबी भी हैं।उत्साह में कोई पत्रकार ऐसे अपनी प्रतिष्ठा दाँव पर लगाकर किसी लेखक की किताब बिकने के लिए नहीं करेगा । इस तरह खबर बनने से भी कविता की किताब नहीं बिकती।

किसी टीवी शो में या स्थानीय अखबार की कतरन बनने से भी कविता की किताब नहीं बिकती।आपने किसी कवि को पढ़ा या नहीं पढ़ा उससे न तो कवि पर फर्क पड़ेगा और न ही उनकी किताब पर। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि किसी स्थानीय अखबार में एक साधारण पत्रकार जो मेरे बारे में बहुत सारी जानकारी इकट्ठा करके एक साहित्यिक न्यूज बनाता है। यह पेड और फेक न्यूज या विज्ञापन तो नहीं ही है जैसा कि आपके वाॅल पर कुछेक उत्साही लोगों का आरोप है ।

हाँ, मैंने कन्हैया जी की भावना का सम्मान करने के लिए न्यूज साझा किया! पर यह सिर्फ साझा करना ही है। हेडिंग मैंने नहीं बनाई, तथ्य मैंने नहीं लिखा। कुछ लोग आपके वाल पर कह रहे हैं कि मैं आपके या अन्य किसी पत्रकार के नाम का दुरुपयोग करता हूँ वगैरह यह सब निराधार बातें हैं जिनका कोई मतलब नहीं है। यह एक स्थानीय पत्रकार द्वारा उनके जनपद के किसी अदने से कवि के ऊपर लिखी हुई एक खबर मात्र है । जिसके शीर्षक,तथ्य और जानकारी से कवि का बहुत लेना-देना नहीं है। आपकी किसी बात से मुझे कोई आपत्ति नहीं है।आप बहुत बड़े हैं, उम्र और अनुभव में भी।आपका सदैव सम्मान करता हूँ।

इस प्रकरण में हिन्दी के उन सभी लेखकों, मित्रों, गुरुजनों और संस्कृतिकर्मियों का आभार जिन्होंने मुझे अपना समझा और विश्वास दिया और समर्थन भी! जिन्होंने आलोचना की उनका भी आभार!

अगर वास्तव में आपने अबतक मेरी कविताएँ नहीं पढ़ी है तो तमाम माध्यमों पर किताबें उपलब्ध हैं पढ़ सकते हैं। उम्मीद है अच्छी लगेंगी। प्रतिबद्धता के साथ अपना काम करता हूँ! करता रहूँगा! मुझसे परिचय नहीं है तो यह परिचय की शुरुआत भी हो सकती है। पर हाँ अपनी किसी कविता पर आपसे किसी चर्चा की अतिरिक्त अपेक्षा नहीं करता हूँ। चर्चा करने न करने हेतु आप स्वतंत्र हैं। इस प्रकरण के बाद भी मेरे मन में आपके प्रति सम्मान में कोई कमी नहीं है। आप मेरे प्रिय पत्रकार हैं! अगर मेरी बातों से आपको या किसी को तकलीफ हुई है तो, क्षमाप्रार्थी हूँ!

आपके स्वस्थ, दीर्घायु एवं रचनात्मक जीवन की शुभकामनाओं के साथ!

(इस टिप्पणी के बाद मैं किन्हीं की टिप्पणी का कोई जवाब नहीं दूँगा)!

सादर!

आपका-

अरुणाभ सौरभ

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