पढ़िए, अब्बास ताबिश की ग़ज़ल : "इनसान था आख़िर तू मिरा रब तो नहीं था"
ताबिश' तिरा चेहरा मह-ए-नख़शब' तो नहीं था;
इनसान था आख़िर तू मिरा रब तो नहीं था।
ये औज-ए-तग़ाफुल तिरा मनसब तो नहीं था।
पहले भी हम इक बार जुदा तुझ से हुए थे,
लेकिन ये चरागाँ का समाँ जब तो नहीं था।
बैठे थे यूँ ही हम तिरी दीवार से लग कर,
ऐ जाँ हमें तुझ से कोई मतलब तो नहीं था।
ये सब मिरे दिल से ही सरज़द हुआ वर्ना,
उस शख़्स की पूजा मिरा मज़हब तो नहीं था।
पहले भी मैं उस आँख से टपका था कई बार,
यकसाँ मुझे मिट्टी किया जब तो नहीं था।
किस बात ने मबहूत रक्खी वस्ल की साअत,
उस आँख से ज़ाहिर कोई करतब तो नहीं था।
कल शब भी यही चाँद था अफ़लाक पे रौशन,
इस तरह का अरमाँ हमें कल शब तो नहीं था।
क्यों उसके इशारे पे उतर आया तह-ए-आब',
'ताबिश' तिरा चेहरा मह-ए-नख़शब' तो नहीं था।