*जीवन में परिणय हो विरह मिलन का* *************************************

एक सुअवसर ऐसा भी आए, प्यास तृप्त हो जन जन का...

Update: 2021-07-03 07:58 GMT

एक सुअवसर ऐसा भी आए,

प्यास तृप्त हो जन जन का।

मानव जीवन दुर्लभ बेदी पर,

परिणय हो विरह मिलन का।

प्रेम सूत्र में दोनों ही बंध जाएं,

कल्पना ये सफल हो मन का।

सुख दुःख दोनों नाच दिखायें,

यह खेल है आँख का मन का।

कभी अमावस की रातें काली,

कभी हर्ष बढ़े दिन में मन का।

शाम हो ये सुनहरी एवं सुहानी,

खिले पूर्णिमा चाँद आँगन का।

कभी सुबह की स्वर्णिम आभा,

देख हरे हर पीड़ा यह तन का।

धूप-छाँव की ये आँख मिचोली,

करे प्रफुल्लित तृण-2 मन का।

विरह वेदना रग रग में व्यापित,

सुखमय मिलन संतृप्त मन का।

सुख दुःख धूप छाँव आते जाते,

बीते ऐसा शुभ शुभ जीवन का।


रचियता :

*डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*

वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.

इंटरनेशनल चीफ एग्जीक्यूटिव कोऑर्डिनेटर

2021-22,एलायन्स क्लब्स इंटरनेशनल,प.बंगाल


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