तलाक पर केरल हाईकोर्ट के जज की चिंता जायज

Update: 2022-09-11 03:45 GMT

अभी हाल के दिनों में केरल हाई कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने बिना शादी के बंधन के युवा पीढ़ी द्वारा जीवन के आनंद (शारीरिक संबंध) लेने की प्रवृति पर चिंता जताई है. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में इसे एक सामाजिक बुराई बताया है. समाज में उपभोक्ता संस्कृति बढ़ने की वजह से यूज एंड थ्रो की प्रवृति ने वैवाहिक जीवन को बहुत प्रभावित किया है.

यह टिप्पणी जस्टिस मोहम्मद मुस्ताक और जस्टिस सोफी थॉमस की बेंच ने की। 34 साल के एक शख्स ने अपनी 38 साल की पत्नी से तलाक मांगा है। इसी मामले पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी आई है. अपने से ज्यादा उम्र की लड़की से करीब एक दशक पहले प्रेम करने के बाद शादी की थी. उन दोनों की 3 बेटियां हैं और आरोप है कि पति किसी और महिला के साथ अपने संबंधों के आगे बढ़ाने के लिए तलाक चाहता है. हालांकि, पति ने तलाक की अपील में कहा है कि मेरी पत्नी क्रूर व्यवहार करती है. कोर्ट ने तलाक की अर्जी स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।

इस मामले पर सुनवाई के दौरान जस्टिस सोफी ने कहा कि आजकल की युवा पीढ़ी मुक्त जीवन का आनंद लेने के लिए शादी को टालना चाहती है. उन्हें शादी एक बुराई लगती है. ये पीढ़ी 'WIFE' शब्द की अपनी हिसाब से व्याख्या कर रही है. यानी 'WIFE' को वे 'वरी इनवाइटेड फॉर एवर' (चिंता हमेशा के लिए आमंत्रित करना) समझ रहे हैं. उन्होंने कहा कि यूज एंड थ्रो संस्कृति ने हमारे वैवाहिक संबंधों को प्रभावित किया है. इन वजहों से लिव इन रिलेशनशिप में तेजी से इजाफा हो रहा है. यानी जब तक मन लगा साथ रहे और जिस दिन मन किया अलविदा कह दिए।

उन्होंने यह भी कहा कि केरल कभी अपने अच्छे पारिवारिक संबंधों के लिए जाना जाता था, लेकिन वर्तमान प्रवृतियां इसे कमजोर बना रही हैं. यहां तक कि अब लोग बच्चों की भी चिंता नहीं कर रहे हैं.

धार्मिक विवाह को कानूनी मान्यता है. इसे हम एक संस्था के रूप में देखते हैं. इसे हम एकतरफा तोड़ नहीं सकते हैं. आकस्मिक झगड़े को हम क्रूरता नहीं मान सकते हैं. अदालत ने यह भी कहा कि पति के किसी अन्य महिला के साथ संबंध उनके पारिवारिक जीवन में गड़बड़ियां पैदा कर सकती हैं.

प्राचीन काल से ही स्त्री को दान की वस्तु के रूप में देखा गया

हमारे इतिहास में एक लंबे समय तक, महिलाओं को अपने पति की एक स्थापित संपत्ति के रूप में देखा गया। यहाँ तक की20 वीं शताब्दी के इंग्लैंड के उत्तरार्ध में, पति का अपनी पत्नी केशरीर पर अधिकार होने के साथ-साथ उसकी संपत्ति पर भी पूर्ण अधिकार होता था। वैवाहिक बलात्कार एक अवधारणा थी जिसे बाद में प्रस्तावित किया गया और पहचाना गया।वहीं दूसरी तरफ, भारत नेअभी तक इस प्रथा को रोका नहीं है।

हालांकि,प्राचीन हिंदू धर्मशास्त्र मनुस्मृति ने महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकार प्रदान किए थे। लेकिन, इसमें महिलाओं को हमेशा पुरुषों की संरक्षकता के अधीन भी रखा गया- पहले उनके पिता, फिर उनके पति, और अंत में उनके बेटे। यद्यपि कोई मूल पुष्टि नहीं है, लेकिन कन्यादान की प्रथा को अक्सर एक पिता द्वारा अपनी बेटी की जिम्मेदारी उसके पति को सौपने के रुप में परिभाषित किया जाता है।जिसका शाब्दिक अर्थ दान है।

पाश्चात्य संस्कृति है बड़ा कारण

कानूनी रुप से अलग होने वाले और तलाक की मांग करने वाले युवा जोड़ों की संख्या में वृद्धि हुई है, जो कि एक चिंता का विषय है।बहुत से लोग, खासकर पुरानी विचारधारा के लोग इसे 'पश्चिमी' संस्कृति की ओर से एक बदलाव के रूप में देखते हैं। युवा पीढ़ी की अधीरता और अहंकार को विवाहों के टूटने का मुख्य कारण माना जाता है।

कई विवाह सलाहकार यह मानते हैं कि आजकल के विवाहित जोड़े सुलह करने के एक तरीके रूप में परामर्श नहीं लेते हैं, बल्कि इसलिए लेते हैं ताकि वे अपने साथी या परिवार को इस बात के लिए मना लेते हैं कि अलगाव एक सही विकल्प है। इस विचारधारा को हमारे समाज के लिए एक नए प्रवेशकर्ता के रूप में देखा जाता है। हालांकि, बेंगलुरू की एक वकील कहती हैं कि "पिछले कुछ वर्षों से समान नियमितता के साथ विवाह टूट रहे हैं, लेकिन जोड़े अपनी शादी को बचाने की हर संभव कोशिश कर रहे है। तलाक की बढ़ती दर एक संकेत है कि इसके साथ जुड़ाकलंक खत्म हो रहा है।"

हालांकि अब इस विषय पर गंभीरता से विचार करना पड़ेगा की आखिर ऐसी कौन सी मूल समस्या है जो समाज में तलाक जैसी कुप्रथा को जन्म दे रही है और समाज को विघटित कर रही है। इस समस्या को खोज कर और उसे दूर करके हम तलाक जैसी समस्या से समाज को निजात दिला सकते हैं।

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