परिमल- प्रसंग : धर्मवीर भारती
मतवाद के घेरे में साहित्य को बांधना ठीक नहीं है..;
एम. ए. कर लेने के बाद मार्सवाद का अध्ययन प्रारंभ किया। प्रगतिशील लेखक संघ का स्थानीय मंत्री भी रहा कुछ दिन, पर कम्युनिस्टों की कट्टरता तथा देश विरोधी नीतियों से मोहभंग हुआ। तभी मैं ने छहों भारतीय दर्शन, वेदान्त तथा विस्तार से वैष्णव और संत साहित्य पढा और भारतीय चिन्तन की मानववादी परम्परा मेरे चिन्तन का मूल आधार बन गयी। उन्ही दिनों पहले गुनाहों का देवता, फिर प्रगतिशील- एक समीक्षा तथा सूरज का सातवां घोडा लिखा।
उस समय परिमल संस्था काफी सक्रिय हो चुकी थी। मैं उसके प्रारंभिक सदस्यों में था। मतवाद के घेरे में साहित्य को बांधना ठीक नहीं है, इस बात को लेकर प्रगतिशील लेखकों से काफी विवाद रहता था। तभी नवलेखन के प्रतिनिधि त्रैमासिक के रूप में निकष का प्रकाशन शुरू किया। उसी समय नदी प्यासी थी, चांद और टूटे हुए लोग, ठेले पर हिमालय, सिद्ध साहित्य का प्रकाशन हुआ। तब मैं विश्वविद्यालय में अध्यापन करने लगा था। इस दौरान अस्तित्ववादी तथा पश्चिम के अन्य दर्शनों का विशिष्ट अध्ययन किया। रिल्के की कविताएँ, कामू के लेख और नाटक, ज्यां पाल सार्त्र की रचनाएँ और कार्ल मार्क्स की दार्शनिक रचनाओं में काफी डूबा और साथ ही महाभारत, गीता, विनोबा और लोहिया के साहित्य का विशेष अध्ययन किया। गांधी जी को भी नये परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश की। भारतीय सन्त और सूफी काव्य, विशेषत: कबीर, जायसी और सूर को पुनः पढा और समझा। नाथ परम्परा और सिद्ध साहित्य तो रिसर्च के विषय थे ही।
... आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि बी.ए. में हमारे बीच साहित्य की समस्याओं पर बहस नहीं होती थी। हम लोग विभिन्न दर्शनों पर बातचीत किया करते थे और उसमें दो- तीन बातें उभर कर आती थी।
एक तो यह कि आत्मा नाम की कोई चीज है क्या ? अगर है तो उसका क्या संबंध है? ईश्वर नाम की कोई चीज है क्या? अगर है, तो उससे क्या संबंध है और इनका समाज से क्या संबंध है ? हम लोग भारतीय दर्शन की कई विचारधाराओं पर विचार- विनिमय करते थे और उनमें मुझे उपनिषद् बहुत अच्छे लगते थे। उपनिषदों में गहराई है। आत्मचिन्तन को, आत्मोपलब्धि को सामाजिक चिन्तन और सामाजिक उपलब्धि से जोडने के बीज उपनिषदों में हैं और वे ही बाद में गीता में प्रस्फुटित हुए। लेकिन एक चीज का अभाव मिलता था- वह यह कि सारी स्थितियां थीं। पर हमारे सामने जब इतिहास आता था, तो हम देखते थे कि यह युग आया, उसके बाद यह युग आया, उसमें समाज ऐसा था, फिर समाज इस रूप में बदला। इसका हमें कोई निदान नहीं मिल पाता था कि इसका कारण क्या है? क्या इसके पीछे कोई सांचा, पैटर्न है।
और उस समय मुझे मार्क्सवाद में मुझे सबसे बड़ी बात मिली कि उसने सामाजिक परिवर्तन को एक अर्थ, एक ढांचा देने की कोशिश की थी। लेकिन मार्क्सवाद का काफी अवगाहन करने के बाद मुझे लगा कि बहुत-से प्रश्न हैं जो अनुत्तरित छूट जाते हैं। उनके विषय में मार्क्स कोई जबाव नहीं दे पाते। उस समय हम एक जीवन से बंधे हुए थे- एक निम्न मघ्यवर्ग का जीवन था। उसका जो कुछ भी संत्रास, यंत्रणा थी, मानवीय संबंध था, इनके बीच जब हम मार्क्स को लागू करते थे, तो लगता था कि मार्क्सवाद अपने को पर्याप्त सिद्ध नहीं कर पा रहा है। तो उसके बाद फिर खोज. शुरू हुई और मैं एक बार फिर भारतीय दर्शन की ओर लौटा। तब मैं ने पाया कि हमारे यहाँ मध्यकालीन संत, वैष्णव भक्त, सूफियों की विचारधाराएँ आयी हैं। इनमें हमारे अनेक प्रश्नों का उत्तर है जो मार्क्सवाद नहीं दे सकता। उसी समय फिर अस्तित्ववादी लेखन और अस्तित्ववादी चिन्तक सामने आये उनमें से जो चरम वैयक्तिक चिन्तक थे- जैसे हिडेगर या सार्त्र- मुझे अधिक पसंद नहीं आये। लेकिन कार्ल यास्पर्स जैसे चिन्तक, जिन्होने सामाजिक धाराओं को और इनमें व्यक्ति की स्थिति को, विकल्प और अनिश्चय इन दोनों को, और उसके बाद विकल्प और अनिश्चय से उपजने वाली संकल्प की नैतिकता को व्याख्यायित किया था, वे चिन्तक मुझे अधिक पसंद आये और उन सबको मिला- जुलाकर निरा मानवीय मूल्यों के विषय में एक चिन्तन बना जिसके बारे में काफी गालियां भी खायीं और काफी समर्थन भी मिला।
व्यक्ति- रूप में जिन लोगों से मुझे सहारा, निर्देशन और प्रोत्साहन मिला, उनमें दो व्यक्ति हैं- एक हैं पंडित माखनलाल चतुर्वेदी और दूसरे हैं ताराशंकर वन्धोपाध्याय। जब मेरा निर्माण- युुग ( फार्मुलेटिव पीरियड) था, जब मेरी चेतना बन रही थी, उस समय इन लोगों का सान्निध्य मिलना मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात रही। जब मैं लिखना शुरू कर चुका था और शायद गुनाहों का देवता भी लिख चुका था, उस समय वात्स्यायन जी से भेंट हुई और इसमें कोई संदेह नहीं कि उस समय वात्स्यायन जी ने तार- सप्तक में मुझे प्रकाशित किया। प्रतीक मासिक में बराबर छापते रहे और जो उससे भी बड़ा काम उन्होंने किया, हमारे और हमारी पीढी के लिए, वह यह था कि जिस समय सारा हिन्दी- जगत हमारी प्रामाणिकता को अस्वीकार करने पर तुला हुआ था, जो पुराने ढंग के लोग थे वे यह कह कर कि ये प्रयोगवादी हैं और जो प्रगतिवादी थे, वे यह कहकर कि ये अमेरिकी एजेंट है, उस समय अकेले वात्स्यायन जी पूरे हिन्दी साहित्य में थे जो हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए और जिन्होंने हमारी प्रामाणिकता को, हमारी अनुभूति को, महत्व दिया। इस नाते निसंदेह वात्स्यायन जी के प्रति कृतज्ञता हमेशा रही है।
... उसी समय एक दिलचस्प घटना यह हुई कि हमने परिंमल पर्व मनाया जो तीन दिन तक चला। उसमें कुछ कविताएँ पढी गयीं। एक नाटक प्रस्तुत किया गया था। उसमें हजारीप्रसाद द्विवेदी को भी बुलाया गया था। अद्भुत सफलता मिली उस पर्व को। अज्ञेय जी ने अपने प्रतीक ( मासिक) में उस पर प्रथम संपादकीय लिखा। इसके बाद से दो बातें हुई - एक तो परिमल अखिल भारतीय स्तर पर चर्चित हो गया, और दूसरे प्रगतिशील लेखक संघ ने सहसा हम पर हमला बोल दिया।
मजे की बात यह थी कि प्रगतिशील लेखक संघ की प्रयाग शाखा के हिन्दी विंग का मैं संयोजक था।
उस समय प्रगतिशील लेखक संघ काफी सुसंगठित और सशक्त था। जब मैं एम.ए. में था तो उस समय हुआ यह कि माओ ने एक नारा दिया कि लैट आल हंड्रेड फ्लावर्स ब्लूम यानी जो हमारी विचारधाराओं से मेल नहीं भी खाते हैं वह भी सामने आयें, तो उस नाते में प्रगतिशील लेखक संघ के हिन्दी विंग का संयोजक बना था। उन्ही दिनों इन लोगों ने कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में एक गोष्ठी की और स्वतंत्रता दी कि मैं सुभाष चन्द्र बोस पर एक कविता पढूं। उस समय तो वे कुछ नहीं कह सके पर बाद में उन्होंने यह कोशिश की कि मुझे कुछ सबक दिया जाये। काफी परेशान किया गया। मैं ने फिर रिजाइन कर दिया।
पर इसके बाद वे लोग मेरे पीछे ही पड गये। यूं समझिये कि शुरू में हमको जो शोहरत मिली उसमें सी. पी. आई. का हाथ था। उन्होंने यह कहा कि मैं अमेरिकन एजेंट हूं और उन कुछ लोगों में शामिल हूं जो देश में आधुनिक कैपटलिज्म या अमेरिकनिज्म ला रहे हैं। उनके इस शोर से लोगों के दिमाग में मेरी छवि और दुगुनी- तिगुनी हो गयी और तब मैं ने भी यह महसूस किया कि हमें इस चुनौती का जबाव क्रियेटिव तरीके से देना है। तो इस प्रकार से हमारी क्रिएटिविटी भी दुगुनी- तिगुनी हो गयी। हममें से अधिकांश सामाजिक समानता के प्रबल पक्षधर थे। लेकिन साहित्य पर कम्युनिस्ट पार्टी या किसी राजनीतिक दल के अनुशासन को स्वीकार नहीं करते थे। यह बात सन् १९४९-५०-५१-५२ के आसपास की है। फिर हममें से अलग- अलग लोगों का अलग- अलग व्यक्तित्व निकलने लगा और परिमल के लेखक हर विधा में चर्चित होने लगे।
... सन् १९६० के आसपास हिन्दी पत्रकारिता एक संक्रमण- काल से गुजर रही थी, वहाँ एक शून्य पैदा हो रहा था, जो आजादी के पहले की पत्रकारिता की परंपराएं थीं, वो सन् १९५० के आते- आते धूमिल पडने लगी थीं, अस्पष्ट होने लगीं थीं, बाद की परंपराएं अपने को स्थापित नहीं कर पा रही थीं और उनका कोई स्पष्ट स्वरूप नहीं बन पा रहा था। उस शून्य में से एक रास्ता निकालना था। स्थिति यह थी कि उस समय या तो बहुत ऊंचे स्तर की साहित्यिक पत्रिकाएं थीं- उनका एक पाठक वर्ग था। या फिर ऐसी पत्रिकाएं थीं, जो बिल्कुल लोकप्रिय हथकंडों का सहारा लेती थीं, लेकिन बदलती हुई परिस्थितियों में मध्यवर्ग को नया संस्कार देकर नये स्तर पर उसकी अस्मिता को सहारा देने की चेष्टा वाली पत्रकारिता उस समय नहीं थी। धर्मयुग ने उसी दिशा में थोडा विनम्र प्रयास किया, अपनी साधनहीनता के बावजूद उस समय हम लोगों को जो सफलता मिली, उसका कारण था कि हमने उस शुन्य को थोडा भरने की कोशिश की। बाद में तो नया विकास आया। कई नयी धाराएँ आयीं। गांधी युग से ही एक परंपरा रही कि माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे लोग, जो दोनों विधाओं में निष्णात थे, साहित्य हो चाहे राजनीतिक चिन्तन हो, उन्हें पत्रकारिता में आने में कोई संकोच नहीं महसूस होता था। अपने- अपने ढंग से लोकप्रिय साहित्यिक पत्रकारिता करने में निराला से लेकर उग्र तक कहीं भी संकोच अनुभव नहीं करते थे। वस्तुतः साहित्यकार और पत्रकार में उस समय कोई ऐसा गहरा और स्पष्ट विभाजन नहीं था।
बाद में, जब केवल समाचार प्रधान पत्रकारिता प्रमुख हुई, उस समय यह विभाजन शुरू हुआ। उस समय स्थिति यह थी कि दो प्रकार के पत्रकार थे। एक तो समाचार आधारित थे, वे साहित्यकारों को एकदम उपेक्षित करते थे। वे साहित्यकार वर्ग में एकदम शामिल नहीं होना चाहते थे। साहित्य से उनका कोई ताल्लुक नहीं था। दूसरी तरफ वे लोग थे, जिनका साहित्यिक आधार था। लेकिन वे पत्रकार होने के लिए साहित्य को ही पत्रकार होने का यथेष्ट गुण मानते थे। इस प्रकार दोनों लोगों के कारण एक शून्य अवश्य पैदा हो गया था। एक ओर वे संपादक थे, जो बड़े घमंड से कहते थे कि साहित्य से हमारा मतलब नहीं है और ऐसे साहित्यकार भी थे जो पत्रकारिता को दोयम दर्जे की चीज समझते थे। फिर भी पत्रकारिता से जो यश मिलता है, उस यश का लाभ जरूर लेना चाहते थे। इस प्रकार दोनों तरह के पत्रकारों के कारण हिन्दी पत्रकारिता में एक शून्य जरूर पैदा हो रहा था, जिसको कि पाटने की कोशिश की गयी। बाद में जो लोग आये, विशेष रूप से सन् १९६० के बाद जो नये पत्रकार आये, जिन्होने कि बाद में अपने को सत्तर के दशक में स्थापित किया, उनमें से जो प्रमुख और सफल साहित्यकार या पत्रकार हैं, वे इस किस्म की कुंठाओं से काफी मुक्त थे। उनके सामने पत्रकारिता का स्वरूप ज्यादा स्पष्ट था। और पांचवें व छठे दशक का जो हैंग- ओवर था- कुछ साहित्यकारों के ऊपर पत्रकारिता का- उससे वे मुक्त थे। इसलिए वे कई नयी सफल परंपराएं, नयी प्रवृत्तियाँ, कई नयी पत्रकारीय परंपराएं डाल सके, जो कि आज हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रमुख रूप से स्थापित है।
इमरजेंसी लगने के बाद, चुनाव में कांग्रेस की पहली बार व्यापक हार होने के बाद केंद्र में नयी गैर- कांग्रेसी सरकार बनने के बाद घटनाक्रम इतनी तेजी से चलने लगा और इतनी तेजी से परिवर्तन आते रहे, जैसे कोई विस्फोट हो गया हो, ऐसा विस्फोट देश में हुआ। यह भी हुआ कि इमरजेंसी उठने के बाद अनेक जगह जो चीजें ढंकी- दबी थीं, वे सब प्रकट होने लगीं। उसके नाते यह बड़ा जरूरी हो गया कि देश में जो इतना बड़ा घटनाक्रम चल रहा है, उसे पूर्ण रूप से पाठक के सामने पेश किया जा सके। दूसरी बात यह भी हुई कि १९७०-७५ तक आते- आते जो बंधी- बंधायी चिन्तन- धाराएं थीं अपने देश की, जिनके आधार पर राजनीतिक पार्टियां बनी हुई थीं, वह चाहे साम्यवादी विचारधारा हो, चाहे गांधीवादी विचारधारा हो, चाहे वह हिन्दू उत्थानवादी विचारधारा हो, चाहे मुस्लिम पुनरुत्थानवादी विचारधारा हो, उन सभी विचारधाराओं का आश्रय लगभग उन सभी पार्टियों से छूट गया। आप सोचिए, फासिज्म के खिलाफ जो पार्टी अपने को अग्रणी मामती थी, वह कम्युनिस्ट पार्टी इमरजेंसी का समर्थन कप रही थी। जिस जनता पार्टी ने कांग्रेस कल्चर का विरोध किया था, उसी जनता पार्टी पर सत्ता में आते ही कांग्रेस कल्चर पूरी तरह हावी हो गयी। जिस जनसंघ ने हिन्दू पुनरुत्थान का नारा लगाया था, वही भारतीय जनता पार्टी इस बात को साबित करने में जुट गयी कि हमारे यहाँ तो मुस्लिम सदस्य भी हैं कि हमारे फलां आफिस में फलां व्यक्ति ने आकर नमाज़ भी पढी। एक प्रकार से सभी विचारधाराएँ गड्डमड्ड हो गयीं। किसी पार्टी की कोई धारा नहीं रही। जिस विचारधारा का जैसा भी घालमेल करके जो पार्टी चल सके, वह चले। तो विचारधाराओं पर चिन्तन और विवेचन उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया, सन् १९७७ के बाद से, जितना कि इससे पहले था। जब वैचारिकता की यह स्थिति थिराव नहीं लेती, तब तक हम किस चीज पर बात करें। वे सारी चिन्तन- धाराएं और विचारधाराएँ, जिनके लिए विविध राजनीतिक दलों द्वारा दावा किया जाता था कि वे उन पर आधारित हैं, वे सब की सब गड्डमड्ड हो चुकी हैं तो उन विचारधाराओं पर बात करने में कोई सार्थकता महसूस नहीं होती है।
आजकल सभी पत्रिकाओं पर राजनीति का प्रभाव और संपादक की भूमिका में जनसंपर्क का काम भी जुड गया है। अंग्रजोंं में यह पहले से ही था। यह बहुत दुखद है, लेकिन यह होता जा रहा है। हो यह रहा है कि एक समय पत्रकारिता और पत्रिकाएं सामाजिक चिन्तन, सामाजिक शिक्षण और सामाजिक मनोरंजन के प्रमुख माध्यम माने जाते थे। वे किसी प्रकार अपना खर्चा निकाल लें, इतना यथेष्ट माना जाता था। धीरे- धीरे बाजार ने ऐसा रूप लिया कि अब वे व्यावसायिक प्राडक्ट माने जाने लगे। उसके लिए जो आर्थिक ढांचा चारों तरफ बुना जाता था, वह भी बदला। उसी प्रकार उनका जो तात्कालिक राजनीतिक प्रभाव हो सकता है, वह बढा। फिर उस तात्कालिक राजनीतिक प्रभाव में विभिन्न प्रकार के संपर्क- सूत्र स्थापित करने से अनेक तात्कालिक लाभ कुछ लोगों को दिखे और वे पत्रकारिता धर्म छोड करके संपर्क- सूत्र वाला धर्म निभाने की तरफ ज्यादा ध्यान देने लगे। यह एक स्थिति है, जो पत्रकारिता के लिए शुभ नहीं है। पर सही बात है कि यह स्थिति आती जा रही है। इसको रोकना चाहिए। यदि नहीं रुकेगी तो इतिहास का स्वयं एक क्रम होता है। जो सामाजिक प्रभाव पत्र- पत्रिकाओं का है, जब यह मालूम होगा कि ये पत्र- पत्रिकाएं किसी सामाजिक उद्देश्य के बजाय केवल व्यावसायिक लाभ या कतिपय व्यक्तियों का स्वार्थ- साधन मात्र है, तो इस पत्रकारिता का वह प्रभाव नहीं रहेगा। अगर प्रभाव नहीं रहेगा, तो इस प्रभाव को जो भुनानेवाले, संपर्क- सूत्र साधने वाले लोग हैं, उनके हाख भी कमजोर हो जायेंगे।
(स्रोत : राजाराम भाडू की फेसबुक पोस्ट से )