बहु विवाह और मुस्लिम समाज

इसके मुस्लिम समाज के कुछ कामुक पुरूष ऐसे भी हैं जो केवल भोग विलास के लिए एक से अधिक पत्नियां कर लेते हैं परंतु उनके साथ समानता का व्यवहार नहीं करते है जो मुस्लिम धर्म की शिक्षाओं के विपरीत भी है और अमानवीय भी

Update: 2021-10-25 11:53 GMT

शारिक रब्बानी, वरिष्ठ उर्दू साहित्यकार

नानपारा, बहराईच ( उत्तर प्रदेश )

इतिहास का अध्ययन करने पर मालूम होता है कि विभिन्न धर्मों में अनेक लोगों ने एक से अधिक पत्नियां रखी हैं और अनेक राजाओं महाराजाओं के जीवन में भी यही स्थिति रही । परन्तु बहु विवाह प्रथा के ताल्लुक से मुस्लिम समाज बहुत बदनाम है और मुस्लिम राजाओं और बादशाहों के किससे भी अत्यंत शर्मनाक है।

जबकि इस्लाम धर्म में पुरूष को एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति केवल विशेष परिस्थितियों में चार बीवी तक रखने की देता है। बहु विवाह प्रथा न तो इस्लाम मेें अनिवार्य है और न ही मुस्लिम समाज का आम रिवाज। बहु विवाह प्रथा के संबंध में इस्लाम धर्म कहता हैै कि अगर तुमको इस बात का यकीन हो कि बेसहारा लड़कियों मे इंसाफ रख सकोगे तो अपनी इच्छा के अनुकूल दो-दो तीन-तीन, चार-चार औरतों से निकाह कर लो लेकिन अगर तुमको इस बात का शक हो कि बराबरी का मामला न कर सकोगे तो एक ही बीवी करना या जो तुम्हारे अधीन हो उसी पर सन्तोष करना ।

परन्तु मुस्लिम समाज के कुछ कामुक प्रवृत्ति के पुरूषों और अरब व मुस्लिम देशों के अमीरजादों  व रईस शेखो के द्वारा बहू विवाह की इजाज़त की आड़ में की जा रही अय्याशियों से जिसमें  वह अपनी कामुक्ता और व्यभिचार भरे जीवन पर बेशुमार दौलत लुटाते हैैं तथा कमसिनी व नौजवान मुस्लिम लड़कियों से मात्र अय्याशी के लिये पहले निकाह करते हैं और कुछ दिनो व समय तक सम्भोग व अय्याशी करने के बाद उन्हें महेर अदा करने के बाद तलाक दे देते हैं। जो एक प्रकार से वैध वैश्या वृत्ति है।

इसके मुस्लिम समाज के कुछ कामुक पुरूष ऐसे भी हैं जो केवल भोग विलास के लिए एक से अधिक पत्नियां कर लेते हैं परंतु उनके साथ समानता का व्यवहार नहीं करते है जो मुस्लिम धर्म की शिक्षाओं के विपरीत भी है और अमानवीय भी।

मुस्लिम समाज की अनेक महिला संगठनों और सनातन धर्म की समाज सेवी संस्थाओं द्वारा मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण के उद्देश्य से मुस्लिम समाज में प्रचलित बहु विवाह प्रथा के खिलाफ अकसर आवाजें उठती रही हैं। परन्तु इसका दुरुपयोग आज भी जारी है । आवश्यकता इस बात की है मुस्लिम महिलाएं खुद अपनी काम वासना पर नियंत्रण रखते हुए ऐसे मुस्लिम पुरूषों से निकाह करने के लिये राजी न हो जिसकी अन्य पत्नियां पहले से हों ।

साथ ही मुस्लिम समाज के पुरूष भी अपने समाज के उन पुरूषों को जो अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिये एक से अधिक महिलाओं से निकाह करते हैं और उनके साथ समानता व दयालुता व मानवता का मामला नहीं रखते है । 

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